शनिवार, 6 नवंबर 2021

आचरण

 

अगर आप श्रीराम के जीवन की घटनाओं पर गौर करें तो पाएंगे कि वह मुसीबतों का एक अंतहीन सिलसिला था। सबसे पहले उन्हें अपने जीवन में उस राजपाट को छोड़ना पड़ा, जिस पर उस समय की परंपराओं के अनुसार उनका एकाधिकार था। उसके बाद 14 साल वनवास झेलना पड़ा।

जंगल में उनकी पत्नी का अपहरण कर लिया गया। पत्नी को छुड़ाने के लिए उन्हें अपनी इच्छा के विरुद्ध एक भयानक युद्ध में उतरना पड़ा। उसके बाद जब वह पत्नी को ले कर अपने राज्य में वापस लौटे, तो उन्हें आलोचना सुनने को मिली। इस पर उन्हें अपनी पत्नी को जंगल में ले जा कर छोड़ना पड़ा, जो उस समय  मां बनने वाली थी। फिर उन्हें जाने-अनजाने अपने ही बच्चों के खिलाफ जंग लड़नी पड़ी। और अंत में वह हमेशा के लिए अपनी पत्नी से हाथ धो बैठे।

श्रीराम का पूरा जीवन ही त्रासदीपूर्ण रहा। इसके बावजूद लोग श्रीराम की पूजा करते हैं।

भारतीय मानस में  श्रीराम का महत्व इसलिए नहीं है, क्योंकि उन्होंने जीवन में इतनी मुश्किलें झेलीं; बल्कि उनका महत्व इसलिए है कि उन्होंने उन तमाम मुश्किलों का सामना बहुत ही शिष्टता पूर्वक किया।

अपने सबसे मुश्किल क्षणों में भी उन्होंने खुद को बेहद गरिमा पूर्ण रखा। उस दौरान वे एक बार भी न तो क्रोधित हुए, न उन्होंने किसी को कोसा और न ही घबराए या उत्तेजित हुए। हर स्थिति को उन्होंने बहुत ही मर्यादित तरीके से संभाला। इसलिए जो लोग मुक्ति और गरिमा पूर्ण जीवन की आकांक्षा रखते हैं, उन्हें राम की शरण लेनी चाहिए।

श्रीराम में यह देख पाने की क्षमता थी कि जीवन में बाहरी परिस्थितियां कभी भी बिगड़ सकती हैं। यहां तक कि अपने जीवन में तमाम व्यवस्था के बावजूद बाहरी परिस्थितियां विरोधी हो सकती हैं। जैसे घर में सब कुछ ठीक – ठाक हो, पर अगर तूफान आ जाए तो वह आपसे आपका सब कुछ छीन कर ले जा सकता है।

अगर आप सोचते है कि ‘मेरे साथ ये सब नहीं होगा’ तो यह मूर्खता है। जीने का विवेकपूर्ण तरीका तो यही होगा कि आप सोचें, ‘अगर मेरे साथ ऐसा होता है तो मैं इसे शिष्टता से ही निपटूंगा।’

लोगों ने श्रीराम को इसलिए पसंद किया, क्योंकि उन्होंने राम के आचरण में निहित सूझबूझ को समझा।
दरअसल, श्रीराम की पूजा इसलिए नहीं की जाती कि हमारी भौतिक इच्छाएं पूरी हो जाएं-मकान बन जाए, प्रमोशन हो जाए, सौदे में लाभ मिल जाए। बल्कि श्रीराम की पूजा हम उनसे यह प्रेरणा लेने के लिए करते हैं कि मुश्किल क्षणों का सामना कैसे धैर्य पूर्वक बिना विचलित हुए किया जाए।

इस लिए सवाल यह नहीं है कि आपके पास कितना है, आपने क्या किया, आपके साथ क्या हुआ और क्या नहीं। असली चीज यह है कि जो भी हुआ, उसके साथ आपने खुद को कैसे संचालित किया। श्रीराम ने अपने जीवन की परिस्थितियों को सहेजने की काफी कोशिश की, लेकिन वे हमेशा ऐसा कर नहीं सके। उन्होंने कठिन परिस्थतियों में ही अपना जीवन बिताया, जिसमें चीजें लगातार उनके नियंत्रण से बाहर निकलती रहीं, लेकिन इन सबके बीच सबसे महत्वपूर्ण यह था कि उन्होंने हमेशा खुद को संयमित और मर्यादित रखा। आध्यात्मिक बनने का यही सार है।

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बुधवार, 3 नवंबर 2021

सत्य सनातन

 

दो दिन पहले अमेरिका और युरोप ने हलोवीन मनायी । कई मिलियन टन कद्दू 🎃 बर्बाद कर दिए गए और कद्दू के अंदर लाइट्स भी लगायी गयीं । किसी ग्रेटा या अगीता का नॉर्थ पोल नहीं पिघला और किसी वोक वामपंथी ने उन बर्बाद होते कद्दू के समक्ष किसी भूखे की पेट नहीं दिखी ।

इसी हलोवीन पर करोड़ों लोगों ने ( युरोप और अमेरिका मिलाकर ) प्लास्टिक के डरावने कपड़े पहने और फेंक दिए पर उस करोड़ों टन प्लास्टिक की बर्बादी पर किसी ने चूँ नहीं करी , किसी ने लेक्चर नहीं दिया ।

अभी पाँच नबंवर को “ गाय फ़ॉक्स डे “ इंग्लैंड में मनाया जाएगा और आतिशबाजी होगी । कोई कम्पनी लेक्चर नहीं देगी । इंग्लैंड के हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट के पास महत्वपूर्ण काम हैं वे भारत के मीलाटों के जैसे केवल अपने त्योहारों पर नहीं जगते ।

एक डेढ़ महीने में करोड़ों क्रिसमस ट्री बेचारे काट दिए जाएँगे । किसी को कोई अन्तर नहीं पड़ेगा ।

31 दिसंबर की रात हर देश के हर शहर में आधिकारिक आतिशबाजी होगी । न्यूज़ीलैंड से अमेरिका तक । किसी के कुत्ते को डर नहीं लगेगा ।

परन्तु जैसे ही सनातनी भारत में पर्व आएगा , और वह सनातनी भारत जो पृथिवि जल अग्नि वायु और अवकाश को पंचभूत और अपने शरीर को भी उन् पंचभूतों से बना हुआ मानता है उस अनादि परंपरा को अधकचरा ज्ञान देने आलिम पैदा हो जाएँगे ।

*सामुहिक रूप से , जो भी कंपनी और ब्रांड दीपावली पर नॉर्थ पोल पिघला रही हो और 31 दिसंबर को कोमा में चली जाती हो उसकी भरपूर उपेक्षा कर दें ।*
- अमेरिका प्रवासी राज शेखर जी तिवारी द्वारा लिखित ।
आप तो पूरे आनंद और हर्षोल्लास से पंचदिवसीय पर्व को उत्साह वाले वातावरण में मनाइए !! अशेष शुभकामनाएं !!

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मंगलवार, 2 नवंबर 2021

शुभ धनतेरस

 

आज दिन है धन तेरस का. माता लक्ष्मी का. माता लक्ष्मी जो माता सरस्वती और माता पार्वती के साथ आदि शक्ति की तीन  देवियों में आती हैं.

वर्तमान  समाज के ढांचे में रहते हुवे धन यश के सामर्थ्य को मन ही मन स्वीकार करते हुवे हमें परहेज़ रहा है इसकी महत्ता को सार्वजनिक स्वीकार करने हेतु ।
   हमने कहानियाँ गढ़ ली कि लक्ष्मी और सरस्वती का सदैव बैर रहा है (देवियों का नहीं बल्कि पैसे और बुद्धि का). लक्ष्मी जी के  वाहन उल्लू को हमने बेवक़ूफ़ी का प्रतीक बना दिया. Group of  owls अंग्रेज़ी में संसद को कहते हैं, जबकि यहाँ किसी सांसद को उल्लू कह दो तो भड़क जाता है. भारत ही नहीं दुनिया की हर प्राचीन संस्कृति में उल्लू को बुद्धि मत्ता का प्रतीक  माना गया है. ग्रीक संस्कृति में उल्लू को एथेना देवी का प्रतीक माना गया, रात्रि के अंधेरे को चीरने वाली दृष्टि रखने वाले उल्लू माहाराज को माना गया कि उन्हें दिव्य दृष्टि प्राप्त है और इसी रूप में इनकी पूजा की गई.
हमारी संस्कृति में भी उल्लू को बुद्धिमत्ता का प्रतीक माना गया है, पर समय के साथ सोसलिस्ट विचार धारा में हमने सामान्य जीवन में उल्लू को बेवक़ूफ़ घोषित कर दिया, अर्थात जो लक्ष्मी के वाहक हैं, धन सम्पदा रखते हैं  वह उल्लू हैं, मूर्ख हैं.

वैसे मन ही मन हम सब उपासक लक्ष्मी माता के हैं. धन सम्पत्ति, यश, वैभव किसे नहीं पसंद है, सार्वजनिक स्वीकारें या ना स्वीकारें. बातों में हम भले ही विद्या की देवी की बात करें, धन ऐश्वर्य की देवी के वाहन को उल्लू घोषित करें, मन ही मन सब चाहते हैं लक्ष्मी देवी की कृपा रहे. छात्र जीवन में भी भारतीय जीवन में सरस्वती माता की मूर्ति मुझे किसी विद्यार्थी के कमरे में न दिखी. हाँ गणेश जी के साथ लक्ष्मी माता की मूर्ति अवश्य होती थी. सबका लक्ष्य माता सरस्वती की साधना , माता पार्वती की आराधना के बाद माता लक्ष्मी के आशीर्वाद को पाना ही होता है। आपने शायद हाल ही में देखा हो नासा में दो अमेरिकन भारतीय लड़कियों को स्कालर्शिप मिली उनके हॉस्टल की फ़ोटो में बड़ी सी सरस्वती माता की फ़ोटो थी तो भारत का सेक्युलरिज़म ख़तरे में आ गया था.

पार्वती माता प्रतीक रही हैं, ताक़त, पराक्रम और शिव की पत्नी के रूप में. समय के साथ उनकी उपासना शिव की पत्नी के रूप में सीमित होती जा रही है. जबकि देखा जाए तो पार्वती माता वह शक्ति थी जिन्होंने शृष्टि के संहारक शिव को भी बस में कर रखा था.

*न सरस्वती के बग़ैर लक्ष्मी सम्भव हैं और ना ही सरस्वती और लक्ष्मी के बिना पार्वती. बुद्धि, यश, वैभव, सम्पदा, पराक्रम और प्रेम यह सब एक ही शक्ति के विभिन्न पहलू हैं, एक के बग़ैर दूसरा सम्भव नहीं.*

माता सरस्वती आपको बुद्धि, माता पार्वती आपको पराक्रम और माता लक्ष्मी आपको वैभव प्रदान करें.

धन तेरस की अशेष शुभ कामनाएँ.

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सोमवार, 1 नवंबर 2021

प्यास

 

गर्मियों की एक दोपहर, प्यास से बेहाल एक लड़का, सड़क किनारे लगे एक नलके को देख कर, पानी पीने के लिए, नलके का हैण्डल चलाने लगा।
पर बहुत प्रयास करने पर भी पानी नहीं आया। हार कर, उस लड़के ने पास के ही एक घर से पानी माँगा।
उस घर से, एक आदमी एक लोटा पानी लेकर बाहर आया। लड़के ने पानी के लिए हाथ बढ़ाया, तो वह आदमी बोला- ठहरो बेटा! यह पानी तुम्हारे लिए नहीं है। यह तो इस नलके के लिए है। असल में मेरे पास अधिक पानी नहीं है, बस यही पानी बचा हुआ है। एक बार यह पानी नलके में डाल दूँ, फिर तुम्हें पानी पिलाऊँगा।
लड़के ने कहा- आप क्या बात कर रहे हैं? आप कहते हैं कि बस इतना ही पानी है। यदि यह भी नलके में डाल दिया जाएगा तो मैं पीऊँगा क्या?
आदमी बोला- चिंता मत करो! बस यह पानी नलके में डाल कर नलके का हैण्डल चलाने भर की देर है, फिर तो पानी ही पानी हो जाएगा। तब तुम कितना ही पानी पी लेना।
विचार करें! भूमि में पानी तो है, पर बहुत समय से उस नलके का उपयोग नहीं होने के कारण वह पानी ऊपर नहीं आ रहा है। अब नलके में ऊपर से जो पानी डाला जा रहा है, वह इस नलके का अपना पानी निकालने के लिए है।
यों प्यास तो उस डाले गए पानी से भी बुझ सकती थी, तो उसे ही क्यों न पी लिया? प्यास तो बुझ जाती। पर वह नलके में न जाता तो नलका वापसी में अनन्त पानी कैसे देता?
बस ऐसा ही ज्ञान के लिए भी समझना चाहिए। यह जो ज्ञान आपके भीतर डाला जा रहा है, वह यदि आप भीतर उतरने दें तो इससे आपका स्वयं का ज्ञान, आत्मिक ज्ञान जाग जाएगा, तब अज्ञान का सर्वथा नाश हो जाएगा।
पर पानी डालने मात्र से ही पानी नहीं आएगा, हैण्डल भी चलाना पड़ेगा। तो इस ज्ञान को बुद्धि तक सीमित मत रखना। नलके का हैण्डल भी चलाना, इस ज्ञान पर मनन भी करना, इसे भीतर उतार लेना।
जैसे पौधा बीज के भीतर ही प्रतीक्षारत रहता है और जरा सी अनुकूलता मिलते ही फूट पड़ता है। न केवल स्वयं टूटता है, चट्टान को भी तोड़ डालता है। छोटा सा बीज, पहाड़ को फाड़ कर, चीर कर, हरा कर, अंकुर के कोमल पत्ते बाहर निकाल देता है।
ऐसे ही आपके भीतर भी संपूर्ण ज्ञान का बीज प्रतीक्षारत है। उसे पाने के लिए अधिक कुछ करने की आवश्यकता नहीं है, बस इस बाहर से मिल रहे ज्ञान को भीतर उतार कर, मनन करने से वह ज्ञान उपलब्ध हो जाता है। असंभव लगता है पर संभव हो जाता है।
ज्ञानी कहते हैं कि फिर आप कहीं भी खड़े रहना, न केवल आपकी प्यास बुझ जाएगी, जो आपके पास से गुजरेगा वह भी प्यासा न रहेगा।

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