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रविवार, 24 अक्टूबर 2021

गरीब का झोपड़ा

 एक गरीब आदमी की झोपड़ी पर…रात को जोरों की वर्षा हो रही थी. सज्जन था, छोटी सी झोपड़ी थी . स्वयं और उसकी पत्नी, दोनों सोए थे. आधीरात किसी ने द्वार पर दस्तक दी।


उन सज्जन ने अपनी पत्नी से कहा - उठ! द्वार खोल दे. पत्नी द्वार के करीब सो रही थी . पत्नी ने कहा - इस आधी रात में जगह कहाँ है? कोई अगर शरण माँगेगा तो तुम मना न कर सकोगे?


वर्षा जोर की हो रही है. कोई शरण माँगने के लिए ही द्वार आया होगा न! जगह कहाँ है? उस सज्जन ने कहा - जगह? दो के सोने के लायक तो काफी है, तीन के बैठने के लायक काफी हो जाएगी.   तू दरवाजा खोल!


लेकिन द्वार आए आदमी को वापिस तो नहीं लौटाना है. दरवाजा खोला. कोई शरण ही माँग रहा था. भटक गया था और वर्षा मूसलाधार थी . वह अंदर आ गया . तीनों बैठकर गपशप करने लगे . सोने लायक तो जगह न थी .


थोड़ी देर बाद किसी और आदमी ने दस्तक दी. फिर फकीर ने अपनी पत्नी से कहा - खोल ! पत्नी ने कहा - अब करोगे क्या? जगह कहाँ है? अगर किसी ने शरण माँगी तो?


उस सज्जन ने कहा - अभी बैठने लायक जगह है फिर खड़े रहेंगे . मगर दरवाजा खोल! जरूर कोई मजबूर है . फिर दरवाजा खोला . वह अजनबी भी आ गया . अब वे खड़े होकर बातचीत करने लगे . इतना छोटा झोपड़ा ! और खड़े हुए चार लोग!


और तब अंततः एक कुत्ते ने आकर जोर से आवाज की . दरवाजे को हिलाया . फकीर ने कहा - दरवाजा खोलो . पत्नी ने दरवाजा खोलकर झाँका और कहा - अब तुम पागल हुए हो!


यह कुत्ता है . आदमी भी नहीं! सज्जन बोले - हमने पहले भी आदमियों के कारण दरवाजा नहीं खोला था, अपने हृदय के कारण खोला था!! हमारे लिए कुत्ते और आदमी दोनों जीवात्मा है, आत्मा में क्या फर्क?


हमने मदद के लिए दरवाजा खोला था . उसने भी आवाज दी है . उसने भी द्वार हिलाया है . उसने अपना काम पूरा कर दिया, अब हमें अपना काम करना है . दरवाजा खोलो!


उनकी पत्नी ने कहा - अब तो खड़े होने की भी जगह नहीं है! उसने कहा - अभी हम जरा आराम से खड़े हैं, फिर थोड़े सटकर खड़े होंगे . और एक बात याद रख ! यह कोई अमीर का महल नहीं है कि जिसमें जगह की कमी हो!


यह गरीब का झोपड़ा है, इसमें खूब जगह है!! जगह महलों में और झोपड़ों में नहीं होती, जगह दिलों में होती है!


अक्सर आप पाएँगे कि गरीब कभी कंजूस नहीं होता! उसका दिल बहुत बड़ा होता है!!


कंजूस होने योग्य उसके पास कुछ है ही नहीं . पकड़े तो पकड़े क्या? जैसे जैसे आदमी अमीर होता है, वैसे कंजूस होने लगता है, उसमें मोह बढ़ता है, लोभ बढ़ता है .


जरूरतमंद को अपनी क्षमता अनुसार शरण दीजिए . दिल बड़ा रखकर अपने दिल में औरों के लिए जगह जरूर रखिये .


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शनिवार, 23 अक्टूबर 2021

परीक्षा

 

एक नगर में रहने वाले एक पंडित जी की ख्याति दूर-दूर तक थी। पास ही के गाँव में स्थित मंदिर के पुजारी का आकस्मिक निधन होने की वजह से, उन्हें वहाँ का पुजारी नियुक्त किया गया था। एक बार वे अपने गंतव्य की और जाने के लिए बस में चढ़े, उन्होंने कंडक्टर को किराए के रुपये दिए और सीट पर जाकर बैठ गए। कंडक्टर ने जब किराया काटकर उन्हें रुपये वापस दिए तो पंडित जी ने पाया कि कंडक्टर ने दस रुपये ज्यादा दे दिए हैं। पंडित जी ने सोचा कि थोड़ी देर बाद कंडक्टर को रुपये वापस कर दूंगा। कुछ देर बाद मन में विचार आया कि बेवजह दस रुपये जैसी मामूली रकम को लेकर परेशान हो रहे है।

आखिर ये बस कंपनी वाले भी तो लाखों कमाते हैं, बेहतर है इन रूपयों को भगवान की भेंट समझकर अपने पास ही रख लिया जाए। वह इनका सदुपयोग ही करेंगे। मन में चल रहे विचारों के बीच उनका गंतव्य स्थल आ गया। बस से उतरते ही उनके कदम अचानक ठिठके, उन्होंने जेब मे हाथ डाला और दस का नोट निकाल कर कंडक्टर को देते हुए कहा, भाई तुमने मुझे किराया काटने के बाद भी दस रुपये ज्यादा दे दिए थे। कंडक्टर मुस्कराते हुए बोला, क्या आप ही गाँव के मंदिर के नए पुजारी है?

पंडित जी के हामी भरने पर कंडक्टर बोला, मेरे मन में कई दिनों से आपके प्रवचन सुनने की इच्छा थी, आपको बस में देखा तो ख्याल आया कि चलो देखते है कि मैं अगर ज्यादा पैसे दूँ तो आप क्या करते हो... अब मुझे विश्वास हो गया कि आपके प्रवचन जैसा ही आपका आचरण है। जिससे सभी को सीख लेनी चाहिए: बोलते हुए, कंडक्टर ने गाड़ी आगे बढ़ा दी। पंडितजी बस से उतरकर पसीना-पसीना थे।

उन्होंने हाथ जोड़कर भगवान का आभार व्यक्त किया कि हे प्रभु! आपका लाख-लाख शुक्र है, जो आपने मुझे बचा लिया, मैने तो दस रुपये के लालच में आपकी शिक्षाओं की बोली लगा दी थी। पर आपने सही समय पर मुझे सम्भलने का अवसर दे दिया।
*कभी कभी हम भी तुच्छ से प्रलोभन में, अपने जीवन भर की चरित्र पूँजी दाँव पर लगा देते हैं..!!*

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सोमवार, 18 अक्टूबर 2021

हिसाब

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          *चार प्रकार के पुत्र*

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        *पूर्व जन्मों के कर्मों से ही हमें इस जन्म में माता-पिता, भाई-बहन, पति-पत्नी, प्रेमी-प्रेमिका, मित्र-शत्रु , सगे-सम्बन्धी इत्यादि संसार के जितने भी रिश्ते नाते हैं, सब मिलते है। क्योंकि इन सबको हमें या तो कुछ देना होता है या इनसे कुछ लेना होता है । वैस ही सन्तान के रूप में हमारा कोई पूर्वजन्म का 'सम्बन्धी ही आकर जन्म लेता है। जिसे शास्त्रों में चार प्रकार से बताया गया है :-*

       . 1️⃣ *ऋणानुबंध पुत्रः- पूर्व जन्म का कोई ऐसा जीव जिससे आपने ऋण लिया हो या उसका किसी भी प्रकार से धन नष्ट किया हो, वह आपके घर में सन्तान बनकर जन्म लेगा और आपका धन बीमारी में या व्यर्थ के कार्यों में तब तक नष्ट करेगा, जब तक उसका हिसाब पूरा ना हो जाये।*

          2️⃣ *वैरानुबंध पुत्र :- पूर्व जन्म का कोई दुश्मन आपसे बदला लेने के लिये आपके घर में सन्तान बनकर आयेगा और बड़ा होने पर माता-पिता से मारपीट, झगड़ा या उन्हें सारी जिन्दगी किसी भी प्रकार से सताता ही रहेगा। हमेशा कड़वा बोलकर उनकी बेइज्जती करेगा व उन्हें दुःखी रखकर खुश होगा।*

             3️⃣ *उदासीन पुत्रः- इस प्रकार की सन्तान जो ना तो माता-पिता की सेवा करती है और ना ही कोई सुख देती है। बस, उनको उनके हाल पर मरने के लिए छोड़ देती है। विवाह होने पर यह माता पिता से अलग हो जाते हैं।*

          4️⃣ *सेवक पुत्रः- पूर्व जन्म में यदि आपने किसी की खूब सेवा की है तो वह अपनी की हुई सेवा का ऋण उतारने के लिए आपका पुत्र या पुत्री बनकर आता है और आपकी सेवा करता है। जो बोया है, वही तो काटोगे।*

        *आपने किसी निरपराध जीव को सताया है तो वह आपके जीवन में शत्रु बनकर आयेगा और आपसे बदला लेगा। इसलिये जीवन में कभी किसी का बुरा ना करें प्रकृति का नियम है कि आप जो भी करोगे, उसे वह आपको इस जन्म में या अगले जन्म में सौ गुना वापिस करके देगी। यदि आपने किसी को एक रुपया दिया है तो समझो आपके खाते में सौ रुपये जमा हो गये है। यदि आपने किसी का एक रुपया छीना है तो समझो आपकी जमा राशि से सौ रुपये निकल गये। मैं, मेरा, तेरा और सारा धन, यहीं का यहीं धरा रह जायेगा, कुछ भी साथ नहीं जायेगा। साथ यदि कुछ जायेगा तो सिर्फ आपके कर्म ही साथ जायेंगे। इसलिए जितना हो सके सत्कर्म करें।*

          (संकलित )

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शनिवार, 16 अक्टूबर 2021

अटल सत्य

 

एक राजा था। एक दिन वह बड़ा प्रसन्न मुद्रा में था,  सो वह अपने वज़ीर के पास गया और बोला कि *तुम्हारी जिंदगी की सबसे बड़ी ख़्वाहिश क्या हैं?*

वज़ीर शरमा गया और नज़रे नीचे करके बैठ गया। राजा ने कहा *तुम घबराओ मत , तुम अपनी सबसे बड़ी ख़्वाहिश बताओ।*

वज़ीर ने राजा से कहा *हुज़ूर आप इतनी बड़ी सल्लतनत के मालिक हैं,  और जब भी मैं यह देखता हूँ तो मेरे दिल में ये चाह जाग्रत होती हैं कि काश मेरे पास इस सल्लतनत का यदि दसवां हिस्सा भी होता तो मैं इस दुनिया का बड़ा खुशनसीब इंसान होता।*

ये कह कर वज़ीर खामोश हो गया। राजा ने कहा कि *यदि मैं तुम्हें अपनी आधी जायदाद दे दूँ तो।*

वज़ीर घबरा गया और नज़रे ऊपर करके राजा से कहा कि *हुज़ूर ये कैसे मुमकिन हो सकता है।  मैं इतना खुशनसीब इंसान कैसे हो सकता हूँ।*

राजा ने दरबार में आधी सल्लतनत के कागज तैयार करने का फरमान जारी करवाया और साथ के साथ वज़ीर की गर्दन धड़ से अलग करने का ऐलान भी करवाया। ये सुनकर वज़ीर बहुत घबरा गया।

राजा ने वज़ीर की आँखों में आँखे डालकर कहा *तुम्हारे पास तीस दिन का समय हैं,। इन तीस दिनों में तुम्हें मेरे तीन सवालों के जवाब पेश करना हैं। यदि तुम कामयाब हो जाओगे तो मेरी आधी सल्लतनत तुम्हारी हो जायेगी,  और यदि तुम मेरे तीन सवालों के जवाब तीस दिन के भीतर न दे पाये तो मेरे सिपाही तुम्हारा सिर धड़ से अलग कर देंगे।*

वज़ीर ओर ज्यादा परेशान हो गया। राजा ने कहा *मेरे तीन सवाल लिख लो,*

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वज़ीर ने लिखना शुरु किया। राजा ने कहा....।

1) *इंसान की जिंदगी की सबसे बड़ी सच्चाई क्या हैं*?

2) *इंसान की जिंदगी का सबसे बड़ा धोखा क्या हैं*?

3) *इंसान की जिंदगी की सबसे बड़ी कमजोरी क्या हैं*?

राजा ने तीनों सवाल समाप्त करके कहा *तुम्हारा समय अब शुरु होता हैं।*

वज़ीर अपने तीन सवालों वाला कागज लेकर दरबार से रवाना हुआ और हर संत-महात्माओं, साधु-फक़ीरों के पास जाकर उन सवालों के जवाब पूछने लगा। मगर किसी के भी जवाबों से वह संतुष्ट न हुआ।
धीरे-धीरे दिन गुजरते जा रहे थे। अब उसके दिन-रात उन तीन सवालों को लिए हुए ही गुजर रहे थे। हर एक-एक गाँवों में जाने से उसका पहना लिबास फट चुका था,  और जूतों के तलवे भी फटने के कारण उसके पैर में छाले पड़ गये थे।

अब अंत में शर्त का एक ही दिन शेष बचा था।  वजीर हार चुका था तथा वह जानता था कि कल दरबार में उसका सिर धड़ से कलम कर दिया जायेगा और ये सोचता-सोचता वह एक छोटे से गांव में जा पहुँचा। वहाँ एक छोटी सी कुटिया में एक फक़ीर अपनी मौज में बैठा हुआ था और उसका एक कुत्ता दूध के प्याले में रखा दूध बड़े ही चाव से जीभ से जोर-जोर से आवाज़ करके पी रहा था।

वज़ीर ने झोपड़ी के अंदर झाँका तो देखा कि एक फक़ीर अपनी मौज में बैठकर सुखी रोटी पानी में भिगोकर खा रहा है ।

जब फक़ीर की नजर वज़ीर की फटी हालत पर पड़ी तो वज़ीर से कहा,  कि *जनाबेआली आप सही जगह पहुँच गये हैं और मैं आपके तीनों सवालों के जवाब भी दे सकता हूँ।*

वज़ीर हैरान होकर पूछने  आपने कैसे अंदाजा लगाया कि मैं कौन हूँ,  और मेरे तीन सवाल हैं?  फक़ीर ने सूखी रोटी कटोरे में रखी और अपना बिस्तरा उठा कर खड़ा हुआ और वज़ीर से कहा साहिब अब आप समझ जायेंगे।

वजीर ने झुक कर देखा कि उस फकीर का लिबास हू ब हू वैसा ही था जैसा राजा उस को भेंट दिया करता था। वजीर सोच ही रहा था कि
फक़ीर ने वज़ीर से कहा *मैं भी उस दरबार का वज़ीर हुआ करता था और राजा से शर्त लगा कर गलती कर बैठा। अब इसका नतीजा तुम्हारे सामने हैं।*

फक़ीर फिर से बैठा और सूखी रोटी पानी में डूबो कर खाने लगा। वज़ीर निराश मन से फक़ीर से पूछने लगा *क्या आप भी राजा के सवालों के जवाब नहीं दे पाये थे ?*

फक़ीर ने कहा कि,  *नहीं मेरा केस तुम से अलग था।*

*मैने राजा के सवालों के जवाब भी दिये पर आधी सल्लतनत के कागज को वहीं फाड़कर इस कुटिया में मेरे कुत्ते के साथ रहने लगा।*

वज़ीर ओर ज्यादा हैरान हो गया और पूछा *क्या तुम मेरे सवाल के जवाब दे सकते हो?*

फक़ीर ने हाँ में सिर हिलाया और कहा *मैं आपके दो सवाल के जवाब मुफ्त में दूँगा मगर तीसरे सवाल के जवाब में आपको उसकी कीमत अदा करनी पड़ेगी।*

अब वजीर ने सोचा यदि बादशाह के सवालों के जवाब न दिये तो राजा मेरे सिर को धड़ से अलग करा देगा इसलिए उसने बिना कुछ सोचे समझे फक़ीर की शर्त मान ली।

1. फक़ीर ने कहा तुम्हारे पहले सवाल का जवाब हैं  *"मौत"*
इंसान की जिंदगी की सबसे बड़ी सच्चाई मौत हैं।
मौत अटल हैं और ये अमीर-गरीब, राजा-फक़ीर किसी को नहीं देखती हैं। मौत निश्चित हैं।

2. अब तुम्हारे *दूसरे सवाल* का जवाब हैं *"जिंदगी"*
इंसान की जिंदगी का सबसे बड़ा धोखा हैं जिंदगी ।  इंसान जिंदगी में झूठ-फरेब और बुरे कर्मं करके इसके धोखे में आ जाता हैं, इतना कह कर अब  फक़ीर चुप हो गया।

वज़ीर ने फक़ीर के वायदे के मुताबिक शर्त पूछी, कि *तीसरे सवाल के जवाब की क्या कीमत अदा करनी होगी ?*

तो फक़ीर ने वज़ीर से कहा कि *तुम्हें मेरे कुत्ते के प्याले का झूठा दूध पीना होगा।यह है तुम्हारे तीसरे सवाल की कीमत ।*

अब वज़ीर असमंजस में पड़ गया और उसने कुत्ते के प्याले का झूठा दूध पीने से इंकार कर दिया। मगर फिर राजा द्वारा रखी शर्त के अनुसार सिर धड़ से अलग करने का सोचकर बिना कुछ सोचे समझे कुत्ते के प्याले का झूठा दूध बिना रुके एक ही सांस में पी गया।

फक़ीर ने जवाब दिया कि

*यही तुम्हारे तीसरे सवाल का जवाब हैं*।

3. यानि *"गरज"* इंसान की जिंदगी की सबसे बड़ी कमजोरी हैं "गरज"। गरज इंसान को न चाहते हुए भी वह सब काम कराती हैं जो इंसान कभी नहीं करना चाहता हैं। जैसे कि तुम!

तुम भी अपनी मौत से बचने के लिए और तीसरे सवाल का जवाब जानने के लिए एक कुत्ते के प्याले का झूठा दूध पी गये, क्योंकि यह तुम्हारी गरज थी  गरज इंसान से सब कुछ करा देती हैं।

मगर अब वज़ीर बहुत प्रसन्न था क्योंकि उसके तीनों सवालों के जवाब उसे मिल गये थे।

वज़ीर ने फक़ीर का शुक्रिया अदा किया और महल की ओर रवाना हो गया।
जैसे ही वज़ीर महल के दरवाजे पर पहुँचा उसे एक हिचकी आई और उसने वहीं अपना शरीर त्याग दिया।
उसको मौत ने अपने आगोश में ले लिया।

*अब हम भी विचार करें कि क्या कहीं हम भी तो जिंदगी की सच्चाई को भूले तो नहीं बैठे हैं? जी हाँ,  जिंदगी की सच्चाई ये *मौत*  है।*

*ये मौत न छोटा देखती हैं न बड़ा, न सेठ साहूकार ।  ये तो न जाने कब किस को अपने आगोश में ले ले कुछ कहा नहीं जा सकता।*

*क्योंकि यही अटल सत्य हैं और ये  *मौत*  तो हर एक को आनी हैं।*

*और क्या हम जिंदगी के धोखे में तो नहीं आ पड़े हैं ?  जी हां बिल्कुल! हम धोखे में ही जी रहे हैं।*

*हम जिंदगी को ऐसे जीते हैं जैसे ये जिंदगी कभी खत्म ही नहीं होगी। हम जिंदगी में हर रोज नये-नये कर्मों का निर्माण करते हैं। इन कर्मों में कुछ अच्छे भी होते हैं,  तो कुछ बुरे।*

*हम जिंदगी के धोखे में ऐसे फंसे हुए हैं कि कभी भूल से भी मालिक का *शुक्रिया*  अदा नहीं करते हैं, कभी भी सच्चे दिल से मालिक का भजन सिमरन नहीं करते हैं।  बस जिंदगी को काटे जा रहे हैं। क्या हम भी तो जिंदगी की कमजोरी के शिकार तो नहीं बने बैठे हैं?*

*जी हाँ, हम सभी गरज के तले दबे हुए हैं। कोई अपने परिवार को पालने की गरज में झूठ-फरेब की राह पर चलने लगता हैं,  तो कोई चोरी और लूटपाट। हम सभी गरज की दलदल में ही फंसे हुए हैं।*

*जिंदगी की सच्चाई मौत को ध्यान में रखते हुए जियें, जिंदगी की झूठ में न फंसे। क्योंकि जितना हम जिंदगी की सच्चाई से मुख मोड़ेगें उतना ही हम धोखे का शिकार होते जायेंगे।*

*इसलिए समय रहते हुए ईश्वर का भजन सिमरन करते रहे और ईश्वर को याद करते हुए उनका शुक्रिया अदा करते रहें। क्योंकि न जाने कब ऊपर वाले का फरमान आ जाए।*

*यही जीवन का पहला* और
*यही जीवन का आखिरी सत्य है।*

सोमवार, 11 अक्टूबर 2021

धैर्य

 🍬 *"मार्श मेलो थ्योरी"* 🍬


*एक टीचर ने*

*क्लास के सभी बच्चों को एक-एक स्वादिष्ट टॉफ़ी दी और फिर एक अजीब बात कही* 

सुनो, बच्चो ! 

आप सभी को दस मिनट तक अपनी टॉफ़ी नहीं खानी है और यह कहकर वह क्लास रूम से बाहर चले गए। 


कुछ पल के लिए क्लास में सन्नाटा छाया रहा, 

हर बच्चा अपने सामने रखी टॉफ़ी को देख रहा था और हर गुज़रते पल के साथ खुद को रोकना मुश्किल पा रहा था। 


दस मिनट पूरे हुए और टीचर क्लास रूम में आ गए।

 

समीक्षा की तो पाया कि  

*पूरी क्लास में सात बच्चे ऐसे थे, जिनकी टॉफ़ियां ज्यों की त्यों थी,*

जबकि बाकी के सभी बच्चे टॉफ़ी खाकर उसके रंग और स्वाद पर बातें कर रहे थे। 


टीचर ने चुपके से इन सात बच्चों के नाम अपनी डायरी में लिख लिये। 


किसी को कुछ नहीं कहा और पढ़ाना शुरू कर दिया।

इस टीचर का नाम 

*वाल्टर मशाल* था।


कुछ वर्षों के बाद टीचर वाल्टर ने अपनी वही डायरी खोली और सातों बच्चों के नाम निकाल कर उनके बारे में जानकारी प्राप्त की। 


*उन्हें पता चला कि सातों बच्चों ने अपने जीवन में कई सफलताओं को हासिल किया है और अपनी-अपनी फील्ड के लोगों में सबसे सफल रहे हैं।*


टीचर वाल्टर ने अपनी उसी क्लास के शेष छात्रों की भी जानकारी प्राप्त की और यह पाया कि उनमें से ज्यादातर बच्चे साधारण जीवन जी रहे थे 

जबकि उनमें कुछ ऐसे भी थे जिन्हें कठिन आर्थिक और सामाजिक परिस्थितियों का सामना करना पड़ रहा है ।


इस शोध का परिणाम टीचर वाल्टर ने एक वाक्य में यह निकाला कि - 

*"जो व्यक्ति केवल दस मिनट धैर्य नहीं रख सकता, वह जीवन में कभी आगे नहीं बढ़ सकता।"*


इस शोध को दुनिया भर में शोहरत मिली और इसका नाम 

*"मार्श मेलो थ्योरी"*

रखा गया था 

क्योंकि टीचर वाल्टर ने बच्चों को जो टॉफ़ी दी थी 

उसका नाम "मार्श मेलो" था।


 *इस थ्योरी के अनुसार दुनिया के सबसे सफल लोगों में कई गुणों के साथ एक गुण 'धैर्य' अवश्य पाया जाता है क्योंकि यह गुण इंसान में बर्दाश्त करने की ताक़त को बढ़ाता है, जिसकी बदौलत आदमी कठिन परिस्थितियों में भी निराश नहीं होता और वह एक सफल व्यक्ति बन जाता है इसलिए सफल जीवन और सुखद भविष्य के लिए धैर्य के गुण का विकास करें।*


इस  प्रेरणा दायक  कहानी को बार-बार पढते रहिये।


मुश्किलें हमेशा सवाल करती हैं

और 

धैर्य ही हमेशा जवाब देता है


*सफलता वक्त और बलिदान मांगती है,*

वो कभी भी प्लेट में  परोसी हुई नहीं मिलती है, 

*किसी कार्य को शुरूआत करना आसान है ,  लेकिन उसमें निरंतरता वनाये रखना कठिन है,*


हर कोशिश में शायद सफलता  नहीं मिल पाती , 

लेकिन 

*हर सफलता का कारण  कोशिश ही होता है*


अगर आप  रिस्क नहीं लेते हो 

तो आप हमेशा उन लोगो के लिए काम करोगे जो रिस्क  लेते हैं


*"दुनियां" की हर "चीज़"*

*"ठोकर" लगने से "टूट" जाती हैं*

    *एक "कामयाबी" ही है*

*जो "ठोकर" खाकर ही मिलती हैं.....*


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रविवार, 10 अक्टूबर 2021

लीला राम की

 

राम धनुष टूटने की सत्य घटना
       
     बात 1880 के अक्टूबर नवम्बर की है। बनारस की एक रामलीला मण्डली रामलीला खेलने तुलसी गांव आयी हुई थी। मण्डली में 22-24 कलाकार थे, जो गांव के ही एक आदमी के यहाँ रुके थे, वहीं सभी कलाकार रिहर्सल करते और खाना बनाते खाते थे।
          पण्डित कृपाराम दूबे उस रामलीला मण्डली के निर्देशक थे, वे हारमोनियम पर बैठ के मंच संचालन करते थे और फौजदार शर्मा साज-सज्जा और राम लीला से जुड़ी अन्य व्यवस्था देखते थे...। एक दिन पूरी मण्डली बैठी थी और रिहर्सल चल रहा था! तभी पण्डित कृपाराम दूबे ने फौजदार से कहा... इस बार वो शिव धनुष हल्की और नरम लकड़ी की बनवाएं, ताकि राम का पात्र निभा रहे 17 साल के युवक को परेशानी न हो.. पिछली बार धनुष तोड़ने में समय लग गया था...!

    इस बात पर फौजदार कुपित हो गया, क्योंकि लीला की साज-सज्जा और अन्य व्यवस्था वही देखता था.. और पिछला धनुष भी वही बनवाया था...! इस बात को लेकर पण्डित जी और फौजदार में से कहा सुनी हो गई..। फौजदार पण्डित जी से काफी नाराज था और पंडित जी से बदला लेने को सोच लिया था...। संयोग से अगले दिन सीता स्वयंवर और शिव धनुष भंग का मंचन होना था...। फौजदार, मण्डली जिसके घर रुकी थी उनके घर गया और कहा, रामलीला में लोहे के एक छड़ की जरूरत आन पड़ी है, दे दीजिए.....? गृहस्वामी ने उसे एक बड़ा और मोटा लोहे का छड़ दे दिया ! छड़ लेके फौजदार दूसरे गांव के लोहार के पास गया और उसे धनुष का आकार दिलवा लाया। रास्ते मे उसने धनुष पर कपड़ा लपेटकर और रंगीन कागज से सजा के गांव के एक आदमी के घर रख आया...!

         रात में रामलीला शुरू हुआ तो फौजदार ने चुपके से धनुष बदल दिया और लोहे वाला धनुष ले जा के मंच के आगे रख दिया और खुद पर्दे के पीछे जाके तमाशा देखने के लिए खड़ा हो गया...। रामलीला शुरू हुआ पण्डित जी हारमोनियम पर राम-चरणों मे भाव विभोर होकर रामचरित मानस के दोहे का पाठ कर रहे थे... हजारों की संख्या में दर्शक शिव-धनुष भंग देखने के लिए मूर्तिवत बैठे थे... रामलीला धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थी..! सारे राजाओं के बाद राम जी गुरु से आज्ञा ले के धनुष भंग को आगे बढ़े...। पास जाके उन्होंने जब धनुष हो हाथ लगाया तो धनुष उससे उठी ही नही..। कलाकार को सत्यता का आभास हो गया.. उस 17 वर्षीय कलाकार ने पंडित कृपाराम दूबे की तरफ कातर दृष्टि से देखा तो पण्डित जी समझ गए कि दाल में कुछ काला है...! उन्होंने सोचा कि आज इज्जत चली जायेगी.. हजारों लोगों के सामने.. और ये कलाकार की नहीं, स्वयं प्रभु राम की इज्जत दांव पर लगने वाली है..! पंडित जी ने कलाकार को आंखों से रुकने और धनुष की प्रदक्षिणा करने का संकेत किया और स्वयं को मर्यादा पुरुषोत्तम के चरणों में समर्पित करते हुए आंखे बंद करके उंगलियां हारमोनियम पर रख दी और राम जी की स्तुति करनी शुरू....
.
जिन लोगों ने ये लीला अपनी आँखों से देखी थी बाद में उन्होंने बताया कि, इस इशारे के बाद जैसे ही पंडित जी ने आँखें बंद करके हारमोनियम पर हाथ रखा.. हारमोनियम से उसी पल दिव्य सुर निकलने लगे... वैसा वादन करते हुए किसी ने पंडित जी को कभी नहीं देखा था...सारे दर्शक मूर्तिवत हो गए... नगाडे से निकलने वाली परम्परागत आवाज भीषण दुंदभी में बदल गयी.. पेट्रोमेक्स की धीमी रोशनी बढ़ने लगी और पूरा पंडाल अद्भुत आकाशीय प्रकाश से रह रह के प्रकाशमान हो रहा था... दर्शकों के कुछ समझ में नही आ रहा था कि क्या हो रहा है... और क्यों हो रहा.... पण्डित जी खुद को राम चरणों मे आत्मार्पित कर चुके थे और जैसे ही उन्होंने चौपाई कहा---

लेत चढ़ावत खैंचत गाढ़ें। काहुँ न लखा देख सबु ठाढ़ें॥
तेहि छन राम मध्य धनु तोरा।भरे भुवन धुनि घोर कठोरा।।
.
पण्डित जी के चौपाई पढ़ते ही आसमान में भीषण बिजली कड़की और मंच पर रखे लोहे के धनुष को कलाकार ने दो भागों में तोड़ दिया...🙏
.
लोग बताते हैं हैं कि, ये सब कैसे हुआ.. और कब हुआ..
किसी ने कुछ नही देखा, सब एक पल में हो गया...
धनुष टूटने के बाद सब स्थिति अगले ही पल सामान्य हो गयी! पण्डित जी मंच के बीच गए, और टूटे धनुष और कलाकार के सन्मुख दण्डवत हो गए.... लोग शिव धनुष भंग पर जय श्री राम का उद्घोष कर रहे थे.. और पण्डित जी की आंखों से श्रद्धा के आँसू निकल रहे थे...

राम "सबके" हैं... एक बार "राम का" होकर तो देखिए....

      🙏🙏   जय श्री राम 🙏🙏

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शनिवार, 9 अक्टूबर 2021

लक्ष्य पर नज़र

 

एक किसान के घर एक दिन उसका कोई परिचित मिलने आया। उस समय वह घर पर नहीं था।

उसकी पत्नी ने कहा: वह खेत पर गए हैं। मैं बच्चे को बुलाने के लिए भेजती हूं। तब तक आप इंतजार करें।

कुछ ही देर में किसान खेत से अपने घर आ पहुंचा। उसके साथ-साथ उसका पालतू कुत्ता भी आया।

कुत्ता जोरों से हांफ रहा था। उसकी यह हालत देख, मिलने आए व्यक्ति ने किसान से पूछा... क्या तुम्हारा खेत बहुत दूर है ?

किसान ने कहा: नहीं, पास ही है। लेकिन आप ऐसा क्यों पूछ रहे हैं ?

उस व्यक्ति ने कहा: मुझे यह देखकर आश्चर्य हो रहा है कि तुम और तुम्हारा कुत्ता दोनों साथ-साथ आए...
लेकिन तुम्हारे चेहरे पर रंच मात्र थकान नहीं जबकि कुत्ता बुरी तरह से हांफ रहा है।

किसान ने कहा: मैं और कुत्ता एक ही रास्ते से घर आए हैं। मेरा खेत भी कोई खास दूर नहीं है। मैं थका नहीं हूं। मेरा कुत्ता थक गया है।  इसका कारण यह है कि मैं सीधे रास्ते से चलकर घर आया हूं, मगर कुत्ता अपनी आदत से मजबूर है।

वह आसपास दूसरे कुत्ते देखकर उनको भगाने के लिए उसके पीछे दौड़ता था और भौंकता हुआ वापस मेरे पास आ जाता था।

फिर जैसे ही उसे और कोई कुत्ता नजर आता, वह उसके पीछे दौड़ने लगता।

अपनी आदत के अनुसार उसका यह क्रम रास्ते भर जारी रहा। इसलिए वह थक गया है।

देखा जाए तो यही स्थिति आज के इंसान की भी है।

जीवन के लक्ष्य तक पहुंचना यूं तो कठिन नहीं है, लेकिन राह में मिलने वाले कुत्ते, व्यक्ति को उसके जीवन की सीधी और सरल राह से भटका रहे हैं।

इंसान अपने लक्ष्य से भटक रहा है और यह भटकाव ही इंसान को थका रहा है।

यह लक्ष्य प्राप्ति में सबसे बड़ी बाधा है। आपकी ऊर्जा को रास्ते में मिलने वाले कुत्ते बर्बाद करते है।

भौंकने दो कुत्तो को और लक्ष्य प्राप्ति की दिशा में सीधे बढ़ते रहो.. फिर एक ना एक दिन मंजिल मिल ही जाएगी।

लेकिन इनके चक्कर में पड़ोगे तो थक ही जाओगे। अब ये आपको सोचना है कि किसान की तरह सीधी राह चलना है या उसके कुत्ते की तरह।
~~~
सफलता के लिए सही समय की नहीं, सही निर्णय की जरूरत होती है।
प्रेम दुर्लभ है उसे पकड़ कर रखें, क्रोध बहुत खराब है, उसे दबाकर रखें।
भय बहुत भयानक है, उसका सामना करें, स्मृतियाँ बहुत सुखद है उन्हें संजोकर रखें।

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सोमवार, 4 अक्टूबर 2021

बदलाव

 

*सोमवारिय चिंतन...*

क्या आपने देखा है कि अगर आप गलत मोड़ लेते हैं ,तो Google मानचित्र कभी भी चिल्लाता नहीं है, निंदा करता है या आपको डांटता नहीं है।

यह कभी अपनी आवाज नहीं उठाता और न ही ये कहता है, "आपको आखिरी क्रॉसिंग पर बाएं जाना था, बेवकूफ! अब आपको लंबा रास्ता तय करना होगा और इसमें आपको बहुत अधिक समय लगने वाला है और आपको अपनी बैठक के लिए देर होने वाली है!

ध्यान देना सीखो और मेरे निर्देशों को सुनो, ठीक है???

" अगर उसने ऐसा किया, तो संभावना काफी है कि हम में से बहुत से लोग इसका इस्तेमाल करना बंद कर सकते हैं । लेकिन Google केवल री-रूट करता है , और आपको वहां पहुंचने का अगला सबसे अच्छा तरीका दिखाता है। इसकी प्राथमिक रुचि आपको अपने लक्ष्य तक पहुँचाने में है, न कि आपको गलती करने के लिए बुरा महसूस कराने में।

एक बहुत अच्छा सबक है ... अपनी निराशा और क्रोध को उन लोगों पर उतारना आसान है , जिन्होंने गलती की है।विशेष रूप से उन लोगों पर जो हमारे करीबी और परिचित हैं।

लेकिन सबसे अच्छा विकल्प समस्या को ठीक करने में मदद करना है, दोष देना नहीं।

क्या आपके पास हाल ही में री-रूटिंग क्षण थे ? औरों के साथ भी और अपनों के साथ भी ?

अपने बच्चों, जीवनसाथी, टीम के साथी और उन सभी लोगों के लिए Google मानचित्र बनें, जो आपके लिए मायने रखते हैं और जिनकी आपको परवाह है !!!

आइये हम स्वयं को re-routing मोड पर रखे ,चीजों को सृजनात्मक सकारात्मक सुंदर बनाये !

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रविवार, 3 अक्टूबर 2021

वास्तु दोष

 

सम्पत सिंह ने व्यापार में अच्छे पैसे कमाने के बाद फनवर्ल्ड के पास एक पाँच बीघा जमीन खरीदी, जिस पर एक दोमंजिला सुन्दर सा घर और चारों तरफ पेड़, पौधे और हरियाली रहने दी। उसमें सम्पत ने एक छोटा सा स्विमिंग पूल बनाया। स्विमिंग पूल के पास एक पचास साठ साल पुराना आम का पेड़ था उसको सम्पत्त ने जैसा था, वैसे ही रहने दिया। दरअसल सम्पत्त सिंह ने ये पाँच बीघे का फार्महाऊस इस आम के पेड़ के कारण ही खरीदा था, क्योंकि उसकी बीवी को आम बहुत पसंद थे।

जब सम्पत्त ने इस फार्महाउस को खरीदा और उसका रैनोवेशन करवा रहा था तो उसके बहुत से मित्रों ने उसे किसी वास्तू शास्त्र वाले से सलाह लेने को कहा। हालांकि सम्पत्त सिंह को वास्तू शास्त्र पर बिल्कुल भी भरोसा नहीं था, लेकिन दोस्तों का आग्रह था तो उसने शहर के जाने माने वास्तू शास्त्री मनु शर्मा को अपने फार्महाउस ले जाना तय किया।

मनु शर्मा विश्व प्रसिद्ध चालीस साल के तजुर्बा वाला वास्तूशास्त्री था। श्रीराम एक्सिलैंसी में खाना खाने के बाद सम्पत्त और मनु शर्मा फनवर्ल्ड की तरफ अपनी कार में जाने लगे। सम्पत्त सिंह बहुत आराम से गाडी़ चला रहे थे। हल्का हल्का संगीत गाडी़ में चल रहा था।

पीछे से कोई गाडी़ आती और हॉर्न बजाती, तो सम्पत्त सिंह बहुत आसानी से उसे साईड दे देते। मनु शर्मा को लगा कि सम्पत्त सिंह को बिल्कुल भी जल्दी नहीं है और पूरी दुनिया का वक्त सम्पत्त के पास है।

सम्पत्त की ड्राइविंग देखकर मनु शर्मा ने कहा, "भाई, तुम्हारी ड्राईविंग बिल्कुल सेफ है"। सम्पत्त हलका सा मुस्कुरा कर बोला, “सामान्यतया जो लोग ओवरटेक करते हैं, उनको कोई अर्जैन्ट काम होता होगा। तो हमें उसको साईड देनी चाहिये ना"।

जैसे ही वो फनवर्ल्ड के पास अपने फार्म हाऊस के नज़दीक पहुँचने लगे तो सड़क थोडी़ संकरी होने लगी। सम्पत्त ने अपनी गाडी़ की गति को और धीमी कर दिया।

अचानक बाँई गली से आठ नौ साल का एक बच्चा खिलखिलाता हुआ तेजी से दौड़ कर सम्पत्त वाली सड़क पर गाडी़ के सामने आते हूए दिखा, सम्पत्त की गाडी़ वैसे भी धीरे चल रही थी, उसने गाडी़ की स्पीड और धीरे कर ली। मनु ने पूछा, "अब तो वो बच्चा सड़क पार कर चुका है, अब इतनी धीरे क्यों चला रहे हो यार सम्पत्त" ?

सम्पत्त ने उत्तर दिया, "वो बच्चा दौड़ता दौड़ता गाडी़ के सामने आया, तो जा़हिर है उसके पीछे कोई और बच्चा दौड़ रहा होगा, इसलिए सम्पत्त गाडी़ को लगभग रोके हूए उस गली की तरफ देख रहा था जिधर से वो पहला बच्चा भाग कर आया था"।

मनु शर्मा ने सम्पत्त का कन्धा थपथपाया और कहा, "कमाल है यार, कितनी समझ, कितना धैर्य"। जैसे ही सम्पत्त अपने फार्महाउस में घुसा तो उसके कॉटेज के पीछे आम के पेड़ से 15-20 पक्षी पंख फड़फड़ाते हूए उडे़। सम्पत्त ने गाडी़ वहीं रोक दी और मनु शर्मा को कहा,  "कुछ देर यहीं रुको, मुझे लगता है कि मौहल्ले पडौस का कोई बच्चा आम के पेड़ से आम चुरा रहा है, तभी पक्षी एकदम उडे़।

अगर हम एकदम गाडी़ ले कर पेड़ के पास पहुँच गये तो पकडे़ जाने की हड़बडाहट में वो बच्चा आम के पेड़ से गिर जायेगा और उसको चोट लगेगी"।

सम्पत्त का यह उत्तर सुनकर दुनिया का मशहूर वास्तु शास्त्री मनु शर्मा सन्न रह गया। मनु शर्मा ने थोडी़ देर रुक कर कहा, "सम्पत्त, दोस्त तुम्हारे फार्महाउस को वास्तू शास्त्र की ज़रूरत ही नहीं है"। सम्पत्त ने मनु को पूछा, "ऐसा क्यों" ?

तो मनु ने कहा, *“कोई भी जगह जो तुम जैसे शाँत, धैर्यशील व्यक्ति की उपस्थिति से नवाज़ दी जाए वो जगह अपने आप ही वास्तू शास्त्र के हिसाब से शुभ हो जायेगी। सुकून और शाँति के एतबार से जब हमारा मन अपनी प्राथमिकता को छोड़कर दूसरे की प्राथमिकता को तरजीह देता है तो उससे दूसरे आदमी से ज़्यादा सुकून और खुशी स्वयं को मिलती है!!*

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शनिवार, 2 अक्टूबर 2021

सबक

 एक बुजुर्ग  आदमी से एक  युवक  मिलता है जो पूछता है:


"क्या मैं आपको याद हूँ?"


और बुजुर्ग  कहता है नहीं। तब युवक ने उसे बताया कि वह उसका छात्र था, 

तब शिक्षक पूछता है:


"आप  जीवन में क्या करते हैं?"


युवक उत्तर देता है:


", मैं एक शिक्षक बन गया।"


"अच्छा, मेरी तरह?" बूढ़े शिक्षक ने युवा से पुछा  .


"जी  वास्तव में, मैं एक शिक्षक बन गया क्योंकि आपने मुझे अपने जैसा बनने के लिए प्रेरित किया।"


जिज्ञासु बूढ़ा, युवक से पूछता है कि उसने किस समय शिक्षक बनने का फैसला किया। और युवक उसे निम्नलिखित कहानी बताता है:


"एक दिन, मेरा एक दोस्त, , एक अच्छी नई घड़ी लेकर आया, और मैंने फैसला किया कि मुझे यह चाहिए।


मैंने उसे चुरा लिया, मैंने उसकी जेब से निकाल लिया।


कुछ ही समय बाद, मेरे दोस्त ने देखा कि उसकी घड़ी गायब थी और उसने तुरंत हमारे शिक्षक से शिकायत की, जो आप थे।


फिर आपने कक्षा को संबोधित करते हुए कहा, 'आज कक्षा के दौरान इस छात्र की घड़ी चोरी हो गई। जिस किसी ने चुराया है, कृपया उसे लौटा दें।'


मैंने इसे वापस नहीं दिया क्योंकि मैं नहीं चाहता था।


आपने दरवाजा बंद कर दिया और हम सभी को खड़े होकर एक घेरा बनाने के लिए कहा।


आप एक-एक करके हमारी जेबों में तलाशी लेने जा रहे थे जब तक कि घड़ी नहीं मिल गई।


हालाँकि, आपने हमें अपनी आँखें बंद करने के लिए कहा था, क्योंकि आप उसकी घड़ी की तलाश तभी करेंगे जब हम सब अपनी आँखें बंद कर लें।


हमने निर्देशानुसार किया।


आप एक एक करके सबकी जेब तलाश करते रहे और जब आप  मेरी जेब में गए, तो आप ने घड़ी ढूंढी और ले ली। फिर  भी आप सबकी जेब ढूढ़ते रहे, और जब काम हो गया तो आपने कहा 'आंखें खोलो। हमारे पास घड़ी है।'


आपने किसी को ये  नहीं बताया की  ये  घडी मेरे  पास  थी  और आपने कभी इस प्रकरण का उल्लेख नहीं किया। आपने कभी यह नहीं बताया कि घड़ी किसने चुराई है। उस दिन आपने  मेरी मर्यादा को सदा के लिए बचा लिया। वह मेरे जीवन का सबसे शर्मनाक दिन था।


लेकिन यह वह दिन भी है जब मैंने चोरी  नहीं करने  का फैसला किया। आपने कभी कुछ नहीं कहा, न ही आपने मुझे डांटा या मुझे एक नैतिक सबक देने के लिए एक तरफ ले गए।


मुझे आपका संदेश स्पष्ट रूप से प्राप्त हुआ।


आपके लिए धन्यवाद, मैं समझ गया कि एक वास्तविक शिक्षक को क्या करना चाहिए।


क्या आपको यह प्रसंग याद है, प्रोफेसर?


बूढ़े प्रोफेसर ने जवाब दिया, 'हां, मुझे चोरी की घड़ी की घटना  याद है, मैं हर किसी की जेब में ढूंढ रहा था।  पर मुझे  यह  पता नहीं  की घडी  तुम्हारे  पास  से  मिली  क्योंकि मैंने भी देखते-देखते अपनी आँखें बंद कर लीं।'


यही है शिक्षा का सार : सिखाने के लिए किसी को अपमानित करने की जरूरत नहीं।



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सोमवार, 27 सितंबर 2021

आँखो देखी और कानों सुनी

 एक बार समुद्र के बीच में एक बड़े जहाज पर बड़ी दुर्घटना हो गयी। कप्तान ने जहाज खाली करने का आदेश दिया।जहाज पर एक युवा दम्पति थे।


जब लाइफबोट पर चढ़ने का उनका नम्बर आया तो देखा गया नाव पर केवल एक व्यक्ति के लिए ही जगह है।इस मौके पर आदमी ने अपनी पत्नी को अपने आगे से हटाया और नाव पर कूद गया।जहाज डूबने लगा।


डूबते हुए जहाज पर खड़ी औरत ने जाते हुए अपने पति से चिल्लाकर एक वाक्य कहा।


अब प्रोफेसर ने रुककर स्टूडेंट्स से पूछा – तुम लोगों को क्या लगता है, उस स्त्री ने अपने पति से क्या कहा होगा ?


ज्यादातर विद्यार्थी फ़ौरन चिल्लाये – स्त्री ने कहा – मैं तुमसे नफरत करती हूँ ! I hate you !


प्रोफेसर ने देखा एक स्टूडेंट एकदम शांत बैठा हुआ था, प्रोफेसर ने उससे पूछा कि तुम बताओ तुम्हे क्या लगता है ?


वो लड़का बोला – मुझे लगता है, औरत ने कहा होगा – हमारे बच्चे का ख्याल रखना !


प्रोफेसर को आश्चर्य हुआ, उन्होंने लडके से पूछा – क्या तुमने यह कहानी पहले सुन रखी थी ?


लड़का बोला- जी नहीं,लेकिन यही बात बीमारी से मरती हुई मेरी माँ ने मेरे पिता से कही थी।


प्रोफेसर ने दुखपूर्वक कहा – तुम्हारा उत्तर सही है !


प्रोफेसर ने कहानी आगे बढ़ाई – जहाज डूब गया,स्त्री मर गयी,पति किनारे पहुंचा और उसने अपना बाकी जीवन अपनी एकमात्र पुत्री,जो नानी के पास थी,उसके समुचित लालन-पालन में लगा दिया।कई सालों बाद जब वो व्यक्ति मर गया तो एक दिन सफाई करते हुए उसकी लड़की को अपने पिता की एक डायरी मिली।


डायरी से उसे पता चला कि जिस समय उसके माता-पिता उस जहाज पर सफर कर रहे थे तो उसकी माँ एक जानलेवा बीमारी से ग्रस्त थी और उनके जीवन के कुछ दिन ही शेष थे।


ऐसे कठिन मौके पर उसके पिता ने एक कड़ा निर्णय लिया और लाइफबोट पर कूद गया।उसके पिता ने डायरी में लिखा था – तुम्हारे बिना मेरे जीवन का कोई मतलब नहीं, मैं तो तुम्हारे साथ ही समंदर में समा जाना चाहता था. लेकिन अपनी संतान का ख्याल आने पर मुझे तुमको अकेले छोड़कर जाना पड़ा।


जब प्रोफेसर ने कहानी समाप्त की तो, पूरी क्लास में शांति थी।


इस संसार में कई सही गलत बातें और कई जटिलतायें हैं,जिन्हें समझना आसान नहीं।इसीलिए ऊपरी सतह से देखकर बिना गहराई को जाने-समझे हर परिस्थिति का एकदम सही आकलन नहीं किया जा सकता।


●कलह होने पर जो पहले माफ़ी मांगे,जरुरी नहीं उसी की गलती हो। हो सकता है वो रिश्ते को बनाये रखना ज्यादा महत्वपूर्ण समझता हो।


●दोस्तों के साथ खाते-पीते,पार्टी करते समय जो दोस्त बिल अदा करता है,जरुरी नहीं उसकी जेब नोटों से ठसाठस भरी हो।हो सकता है उसके लिए दोस्ती के सामने पैसों की अहमियत कम हो।


●जो लोग आपकी मदद करते हैं,जरुरी नहीं वो आपके एहसानों के बोझ तले दबे हों।वो आपकी मदद करते हैं क्योंकि उनके दिलों में दयालुता और करुणा का निवास है।


●आजकल जीवन कठिन इसीलिए हो गया है क्योंकि हमने लोगो को समझना कम कर दिया और ऊपरी तौर पर judge करना शुरू कर दिया है।थोड़ी सी समझ और थोड़ी सी मानवता ही आपको सही रास्ता दिखा सकती है।


जीवन में निर्णय लेने के कई ऐसे पल आयेंगे,सो अगली बार किसी पर भी अपने #पूर्वाग्रह का ठप्पा लगाने से पहले विचार अवश्य करे। 


क्योंकि :"हर आँखो देखी और कानों सुनी बात सच्ची नहीं होती।"


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शनिवार, 25 सितंबर 2021

ख़ुद की संतुष्टि

 

एक महिला की जुबानी-

मैं ऑफिस बस से ही आती जाती हूँ । ये मेरी दिनचर्या का हिस्सा हैं । उस दिन भी बस काफ़ी देर से आई, लगभग आधे-पौन घंटे बाद । खड़े-खड़े पैर दुखने लगे थे । पर चलो शुक्र था कि बस मिल गई । देर से आने के कारण भी और पहले से ही बस काफी भरी हुई थी ।

बस में चढ़ कर मैंनें चारों तरफ नज़र दौडाई तो पाया कि सभी सीटें भर चुकी थी । उम्मीद की कोई किरण नज़र नही आई ।

तभी एक मजदूरन ने मुझे आवाज़ लगाकर अपनी सीट देते हुए कहा, "मैडम आप यहां बैठ जाये ।" मैंनें उसे धन्यवाद देते हुए उस सीट पर बैठकर राहत को सांस ली । वो महिला मेरे साथ बस स्टांप पर खड़ी थी तब मैंने उस पर ध्यान नही दिया था ।

कुछ देर बाद मेरे पास वाली सीट खाली हुई, तो मैंने उसे बैठने का इशारा किया । तब उसने एक महिला को उस सीट पर बिठा दिया जिसकी गोद में एक छोटा बच्चा था ।

वो मजदूरन भीड़ की धक्का-मुक्की सहते हुए एक पोल को पकड़कर खड़ी थी । थोड़ी देर बाद बच्चे वाली औरत अपने गन्तव्य पर उतर गई ।

इस बार वही सीट एक बुजुर्ग को दे दी, जो लम्बे समय से बस में खड़े थे । मुझे आश्चर्य हुआ कि हम दिन-रात बस की सीट के लिये लड़ते है और ये सीट मिलती है और दूसरे को दे देती हैं ।

कुछ देर बाद वो बुजुर्ग भी अपने स्टांप पर उतर गए, तब वो सीट पर बैठी । मुझसे रहा नही गया, तो उससे पूछ बैठी,

"तुम्हें तो सीट मिल गई थी एक या दो बार नही, बल्कि तीन बार, फिर भी तुमने सीट क्यों छोड़ी ? तुम दिन भर ईट-गारा ढोती हो, आराम की जरूरत तो तुम्हें भी होगी, फिर क्यो नही बैठी ?

मेरी इस बात का जवाब उसने दिया उसकी उम्मीद मैंने कभी नही की थी । उसने कहा, *"मैं भी थकती हूँ । आप से पहले से स्टांप पर खड़ी थी, मेरे भी पैरों में दर्द होने लगा था । जब मैं बस में चढ़ी थी तब यही सीट खाली थी । मैंने देखा आपके पैरों में तकलीफ होने के कारण आप धीरे-धीरे बस में चढ़ी । ऐसे में आप कैसे खड़ी रहती इसलिये मैंने आपको सीट दी । उस बच्चे वाली महिला को सीट इसलिये दी उसकी गोद में छोटा बच्चा था जो बहुत देर से रो रहा था । उसने सीट पर बैठते ही सुकून महसूस किया । बुजुर्ग के खड़े रहते मैं कैसे बैठती, सो उन्हें दे दी । मैंने उन्हें सीट देकर ढेरों आशर्वाद पाए । कुछ देर का सफर है मैडम जी, सीट के लिये क्या लड़ना । वैसे भी सीट को बस में ही छोड़ कर जाना हैं, घर तो नहीं ले जाना ना । मैं ठहरी ईट-गारा ढोने वाली, मेरे पास क्या हैं, न दान करने लायक धन हैं, न कोई पुण्य कमाने लायक करने को कुछ । रास्ते से कचरा हटा देती हूं, रास्ते के पत्थर बटोर देती हूं, कभी कोई पौधा लगा देती हूं । यहां बस में अपनी सीट दे देती हूं । यही है मेंरे पास, यही करना मुझे आता है ।"* वो तो मुस्करा कर चली गई पर मुझे आत्ममंथन करने को मजबूर कर गई ।

मुझे उसकी बातों से एक सीख मिली कि *हम बड़ा कुछ नही कर सकते  तो समाज में एक छोटा सा, नगण्य दिखने वाला कार्य तो कर सकते हैं ।*

मुझे लगा ये मज़दूर महिला उन लोगों के लिये सबक हैं जो आयकर बचाने के लिए अपनी काली कमाई को दान के नाम पर खपाते हैं, या फिर वो लोग जिनके पास पर्याप्त पैसा होते हुए भी गरीबी का रोना रोते हैं । इस समाजसेवा के नाम पर बड़ी-बड़ी बातें करते हैं परन्तु इन छोटी-छोटी बातों पर कभी ध्यान नहीं देते ।

मैंने मन ही मन उस महिला को नमन किया तथा उससे सीख ली *यदि हमें समाज के लिए कुछ करना हो, तो वो दिखावे के लिए न किया जाए बल्कि खुद की संतुष्टि के लिए हो ।*

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सोमवार, 20 सितंबर 2021

नजरअंदाज

 एक महात्मा एक गांव से थोड़ी दूर, एक शांत इलाके में अपनी कुटिया में अपने एक शिष्य के साथ रहते थे।


दो शहरी नौजवान उनके पास अपनी समस्या लेकर आये “महात्मा जी, हमने सुना है,आप हर समस्या का समाधान जानते हैं


“तुम निश्चिन्त होकर मुझे अपनी समस्या बताओ,”


“बात ऐसी है,हम लोग इस शहर में नए आये है,यहाँ दहशत का माहौल है, यहाँ आवारा लोगों का बसेरा है। सड़कों पर गुज़रते हुए लोगों  से बदतमीज़ी की जाती है, आते जाते लोगों को गालियाँ दी जाती है। कुछ दबंग लोग शराब पीकर सड़क किनारे खड़े हो जाते हैं और सामने से गुज़रते हुए लोगों के साथ बदसुलूकी करते हैं, उन्हें गालियाँ देते हैं, हाथापाई पर उतर आते हैं !


पहला नौजवान बोला, “हम परेशान हो गए, भला ऐसे समाज में कौन रहना चाहेगा, आप ही बताएं..??


दोनों नौजवान की बात सुनकर महात्मा जी चारपाई से उठे और यह बडबडाते हुए कि “यह समस्या बहुत गंभीर है,” कुटिया के बाहर चल दिए | नौजवान ने बाहर जाकर देखा, वो शांत खड़े अपने कुटिया के सामने वाली सड़क को देख रहे थे।


अगले ही पल वो मुड़कर दोनों नौजवाओं से बोले, “बेटा एक काम करोगे,” महात्मा दूर इशारा करते हुए बोले, “ये सड़क देखो.. जहां ये सड़क मुड़ती है, वही सामने एक नीम का बड़ा पेड़ है, ज़रा मेरे लिए वहाँ से कुछ नीम के पत्ते तोड़ लाओगे |”


“ज़रूर महात्मा जी, जैसा आप कहे,” कहकर दोनों नौजवान ने कदम बढ़ा दिए, परन्तु महात्मा उन्हें रोकते हुए बोले, “ठहरो बेटा….जाने से पहले मैं तुम्हें बता दूँ, रास्ते में कई आवारा कुत्ते हैं, जो तुम्हें अपना शिकार बना सकते हैं, वो बहुत खूंखार हैं, तुम्हारी जान भी जा सकती है, क्या तुम वो पत्ते ला पाओगे..??”


नौजवानों ने एक दूसरे को देखा, और उनके चेहरे के हाव भाव देखकर महात्मा समझ गए कि वे डरे हुए तो थे, परन्तु वहाँ जाने के लिए तैयार थे | दोनों नौजवान उस सड़क पर चल दिए, वो सड़क पर से गुज़रे | रास्ते में उन्हें काफी आवारा कुत्ते सड़क किनारे बैठे मिले |


उन्होंने कोशिश कि वो उन्हें पार कर जायें, परन्तु यह करना आसान नहीं था | जैसे ही वो एक कुत्ते के करीब से गुज़रे, कुत्ते ने उन्हें काट खाने वाली भूखी निगाहों से घूरा| वो कोशिश करते उन्हें पार करने की, परन्तु यह करना जान जोखिम में डालने के बराबर था |


काफी देर इंतज़ार करने के बाद जब वे लौटे तब महात्मा ने देखा, उनके हाथ खाली थे, और वो काफी डरे हुए थे|


वो महात्मा के करीब आये और बोले – “हमे माफ़ कर दीजिये,” पहला नौजवान बोला, “ये रास्ता बहुत खतरनाक है, रास्ते में बहुत खूंखार कुत्ते थे, हम ये काम नहीं कर पाए |”


दूसरा नौजवान बोला, “हमने दो चार कुत्तों को झेल लिया परन्तु आगे जाने पर कुत्तों ने हम पर हमला कर दिया, हम जैसे तैसे करके अपनी जान बचाकर वापिस आये हैं|”


महात्मा बिना कुछ बोले कुटिया के अन्दर चलते गए, और अपने शिष्य को साथ लेकर बाहर आये | उन्होंने शिष्य से वो पत्ते तोड़ने के लिए कहा | नौकर उसी सड़क से गया | वह कुत्तों के बीच से गुज़रा | परन्तु जब काफी देर बाद, दोनों नौजवानों ने उस शिष्य  को सड़क से वापिस अपनी ओर आते देखा, तब देखा उसके हाथ नीम के पत्तों से भरे थे |


ये देखकर दोनों नौजवान भौचक्के रह गए | महात्मा बोले, “बेटा ये मेरा शिष्य है, ये अँधा है… हालांकि ये देख नहीं सकता, परन्तु कौन सी चीज़ कहाँ पर है,इसे पूरा ज्ञान है। ये रोज़ मुझे नीम के पत्ते लाकर देता है.. और जानते हो क्यों इसे आवारा कुत्ते नहीं काटते,   क्योंकि ये उनकी तरफ ज़रा भी ध्यान नहीं देता !”


महात्मा आगे बोले, “जीवन में एक बात हमेशा याद रखना बेटा, जिस व्यर्थ की चीज़ पर तुम सबसे ज्यादा ध्यान दोगे, वह चीज़ तुम्हें उतनी ही काटेगी। इसलिए अच्छा होगा, तुम अपना ध्यान अपने लक्ष्य पर रखो !!


इन दो नौजवानों की तरह हम भी अपने जीवन में कुछ ऐसा ही अनुभव करते हैं | हमारा जीवन भी खूंखार मोड़ो से भरा होता है |


नकरात्मक वातावरण में अनेको रोते हुए,बहाने बनाते हुए तथा दूसरों को कोस कोस के कामचोर बने रहने वाले आसपास के सभी नकारात्मक लोगो को आप नजरअंदाज करके आत्मनिर्भर बनने के लिए लक्ष्य की दिशा में निरन्तर बढ़ते रहियेगा🙏



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शनिवार, 18 सितंबर 2021

सेवा भावना

 



एक संत ने एक विश्व- विद्यालय का आरंभ किया, इस विद्यालय का प्रमुख उद्देश्य था ऐसे संस्कारी युवक-युवतियों का निर्माण करना था जो समाज के विकास में सहभागी बन सकें।

एक दिन उन्होंने अपने विद्यालय में एक वाद-विवाद प्रतियोगिता का आयोजन किया, जिसका विषय था - "जीवों पर दया एवं प्राणिमात्र की सेवा।"

निर्धारित तिथि को तयशुदा वक्त पर विद्यालय के कॉन्फ्रेंस हॉल में प्रतियोगिता आरंभ हुई।

किसी छात्र ने सेवा के लिए संसाधनों की महत्ता पर बल देते हुए कहा कि- हम दूसरों की तभी सेवा कर सकते हैं, जब हमारे पास उसके लिए पर्याप्त संसाधन हों।

वहीं कुछ छात्रों की यह भी राय थी कि सेवा के लिए संसाधन नहीं, भावना का होना जरूरी है।

इस तरह तमाम प्रतिभागियों ने सेवा के विषय में शानदार भाषण दिए।

आखिर में जब पुरस्कार देने का समय आया तो संत ने एक ऐसे विद्यार्थी को चुना, जो मंच पर बोलने के लिए ही नहीं आया था।

यह देखकर अन्य विद्यार्थियों और कुछ शैक्षिक सदस्यों में रोष के स्वर उठने लगे।

संत ने सबको शांत कराते हुए बोले:- 'प्यारे मित्रो व विद्यार्थियो, आप सबको शिकायत है कि मैंने ऐसे विद्यार्थी को क्यों चुना, जो प्रतियोगिता में सम्मिलित ही नहीं हुआ था।
दरअसल, मैं जानना चाहता था कि हमारे विद्यार्थियों में कौन सेवाभाव को सबसे बेहतर ढंग से समझता है।

इसीलिए मैंने प्रतियोगिता स्थल के द्वार पर एक घायल बिल्ली को रख दिया था।
आप सब उसी द्वार से अंदर आए, पर किसी ने भी उस बिल्ली की ओर आंख उठाकर नहीं देखा।

यह अकेला प्रतिभागी था, जिसने वहां रुक कर उसका उपचार किया और उसे सुरक्षित स्थान पर छोड़ आया।

सेवा-सहायता डिबेट का विषय नहीं, जीवन जीने की कला है।
जो अपने आचरण से शिक्षा देने का साहस न रखता हो, उसके वक्तव्य कितने भी प्रभावी क्यों न हों, वह पुरस्कार पाने के योग्य नहीं है।'

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सोमवार, 13 सितंबर 2021

स्टीकर

 

मेरे आगे वाली कार कछुए की तरह चल रही थी और मेरे बार-बार हॉर्न देने पर भी रास्ता नहीं दे रही थी .

मैं अपना आपा खो कर चिल्लाने ही वाला था कि मैंने कार के पीछे लगा एक छोटा सा स्टिकर देखा जिस पर लिखा था _"शारीरिक विकलांग ; कृपया धैर्य रखें" ! और यह पढ़ते ही जैसे सब-कुछ बदल गया !!

मैं तुरंत ही शांत हो गया और कार को धीमा कर लिया . यहाँ तक की मैं उस कार और उसके ड्राईवर का विशेष खयाल रखते हुए चलने लगा कि कहीं उसे कोई तक़लीफ न हो . मैं ऑफिस कुछ मिनट देर से ज़रुर पहुँचा मगर मन में एक संतोष था।

इस घटना ने दिमाग को हिला दिया . क्या मुझे हर बार शांत करने और धैर्य रखने के लिए किसी स्टिकर की ही ज़रुरत पड़ेगी ? हमें लोगों के साथ धैर्यपूर्वक व्यवहार करने के लिए हर बार किसी स्टिकर की ज़रुरत क्यों पड़ती है ?

क्या हम लोगों से धैर्यपूर्वक अच्छा व्यवहार सिर्फ तब ही करेंगे जब वे अपने माथे पर कुछ ऐसे स्टिकर्स चिपकाए घूम रहे होंगे कि.......

“मेरी नौकरी छूट गई है",
“मैं कैंसर से संघर्ष कर रहा हूँ",
“मेरी शादी टूट गई है",
“मैं भावनात्मक रुप से टूट गया हूँ",
“मुझे प्यार में धोखा मिला है",
“मेरे प्यारे दोस्त की अचानक ही मौत हो गई",
“लगता है इस दुनिया को मेरी ज़रुरत ही नहीं",
“मुझे व्यापार में बहुत घाटा हो गया है"......आदि !

दोस्तों , हर इंसान अपनी ज़िंदगी में कोई न कोई ऐसी जंग लड़ रहा है जिसके बारे में हम कुछ नहीं जानते . बस हम यही कर सकते हैं कि लोगों से धैर्य और प्रेम से बात करें .

आइए हम इन अदृश्य स्टिकर्स को सम्मान दें ।
🙏

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रविवार, 12 सितंबर 2021

ज्यादा इंसान

 

एक फ्रीजर की प्लांट में काम करने वाले इंजिनियर का किस्सा है। होता यूँ है की जब भी कभी कोई पुर्जा ख़राब होता है तभी इंजिनियर का काम शुरू होता है। ऐसे में मैकेनिकल इंजिनियर का काम अक्सर शाम में ही शुरू होता है। करीब पचास लोग इस प्लांट में काम करते थे और शाम के वक्त एक दिन कुछ ख़राब हो गया। इंजिनियर ठीक करने में जुटा, थोड़ी ही देर में बता दिया की जो पुर्जा टूटा है वो कोई दो तीन घंटे में ठीक होगा। इंजिनियर पुर्जे को ठीक करने मशीनों के बीच कहीं जा घुसा।

लोगों को पता था की शाम हो चुकी है और काफी वक्त लगने वाला है मरम्मत में, एक एक करके लोग घर की तरफ निकलने लगे। गार्ड अन्दर झाँका, फैक्ट्री बंद करने का समय हो चुका था और कोई भी अन्दर नजर नहीं आया तो वो भी ताला बंद कर के अपनी रात की ड्यूटी पर जा बैठा। इधर अन्दर घुसे हुए इंजिनियर को जैसे ही बाहर आना पड़ा तो उसने देखा की सब लोग तो उसे बंद करके जा चुके है !

रात भर बर्फ़ बनाने की फैक्ट्री में बंद रहने का एक ही मतलब था। निश्चित मौत ! इंजिनियर अक्सर ऐसी स्थिति के लिए प्रशिक्षित होते हैं। इंजिनियर को पता था की शोर मचाने और दौड़ भाग करने पर उसके शरीर की गर्मी ख़त्म होती जाएगी और उस हाल में मौत जल्दी होगी। इंजिनियर चुप चाप बैठकर आने वाली मौत का इंतज़ार करने लगा। उधर दस बजे सिक्यूरिटी गार्ड की ड्यूटी बदलने का वक्त हुआ तो दूसरा गार्ड दिन वाले की जगह आया। जैसे ही उसे चाभी देकर दिन का गार्ड जाने वाला था अचानक उसे कुछ याद आया।

उसने भागकर फैक्ट्री का दरवाजा खोला और जल्दी फ्रीजिंग मशीन की तरफ भागा। टॉर्च जलाते ही वहां बैठा इंजिनियर नजर आ गया। दोनों कर्मचारियों ने मिलकर काफी कमज़ोर हो चुके इंजिनियर को खींचकर बाहर निकाला। थोड़ी देर में जब इंजिनियर की हालत कुछ बेहतर हुई तो उसने पुछा, तुम्हें अंदाजा कैसे हुआ की मैं अन्दर फंसा हूँ ? किसने तुम्हें ढूँढने भेजा ? दिन वाला गार्ड बोला, किसी ने नहीं भेजा साहब ! आप हर रोज़ आते जाते मुझे भी गुड मॉर्निंग, गुड नाईट कहते जाते हो। आज आपने गुड नाईट कहा नहीं था। मैंने रात वाले गार्ड को गुड नाईट कहा तो मुझे याद आया की हर रोज़ गुड नाईट कहने वाले साहब आज निकले नहीं क्या ?

मैंने पता किया,  आये थे? पता चला आये हो ! , तो मैं ढूँढने चला आया।

कुछ साल पहले एक स्पेशल बत्ती वाली कार में बैठे कमिश्नर की गाड़ी से जाते जब उनको हर सिपाही को वापिस सलाम करते देखा था तो उनसे पुछा था। जवाब आया था की वो हम जैसों की सुविधा के लिए सारे दिन धूप में खड़ा है मैं सल्यूट का जवाब भी ना दूं ? फिर उन्होंने ये किस्सा सुनाया था। 

आम तौर पर ऐसे कैब-टैक्सी या एम्बुलेंस के ड्राईवर हों, फल सब्जी बेचने के ठेले लगाने वाले हों, दूध-अख़बार पहुँचाने वाले हों, उन सब पर कोई ध्यान नहीं देता। कम पहचाने जाने वाले लोगों को नमस्ते कर देने में उतना कुछ जाता नहीं। हाँ, आप थोड़े ज्यादा इंसान हो जायेंगे, ऐसा हो सकता है।

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शनिवार, 11 सितंबर 2021

क्षमा

 

*💕💖   "क्षमा"   💖💕*
  
एक सेठ जी ने अपने दामाद को तीन लाख रूपये व्यापार के लिये दिये। उसका व्यापार बहुत अच्छा जम गया, लेकिन उसने रूपये ससुर जी को वापस नहीं लौटाये।
आखिर दोनों में झगड़ा हो गया, झगड़ा भी इस सीमा तक बढ़ गया कि दोनों का एक दूसरे के यहाँ आना जाना बिल्कुल बंद हो गया। घृणा व द्वेष का आंतरिक संबंध अत्यंत गहरा हो गया। सेठ जी, हर समय हर संबंधी के सामने अपने दामाद की निंदा-निरादर व आलोचना करने लगे।
        सेठ जी अच्छे साधक भी थे, लेकिन इस कारण उनकी साधना लड़खड़ाने लगी। भजन पूजन के समय भी उन्हें दामाद का चिंतन होने लगा। मानसिक व्यथा का प्रभाव तन पर भी पड़ने लगा। बेचैनी बढ़ गयी। समाधान नहीं मिल रहा था। आखिर वे एक संत के पास गये और अपनी व्यथा सुनायी।

संतश्री ने कहाः- 'बेटा ! तू चिंता मत कर। ईश्वरकृपा से सब ठीक हो जायेगा। तुम कुछ फल व मिठाइयाँ लेकर दामाद के यहाँ जाना और मिलते ही उससे केवल इतना कहना, 'बेटा ! सारी भूल मुझसे हुई है, मुझे "क्षमा" कर दो।'
सेठ जी ने कहाः- "महाराज ! मैंने ही उनकी मदद की है और "क्षमा" भी मैं ही माँगू !"

संतश्री ने उत्तर दियाः- "परिवार में ऐसा कोई भी संघर्ष नहीं हो सकता, जिसमें दोनों पक्षों की गलती न हो। चाहे एक पक्ष की भूल एक प्रतिशत हो दूसरे पक्ष की निन्यानवे प्रतिशत, पर भूल दोनों तरफ से होगी।"

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सेठ जी की समझ में कुछ नहीं आ रहा था। उसने कहाः- "महाराज ! मुझसे क्या भूल हुई ?
"बेटा ! तुमने मन ही मन अपने दामाद को बुरा समझा– यही है तुम्हारी पहली भूल
   तुमने उसकी निंदा, आलोचना व तिरस्कार किया– यह है तुम्हारी दूसरी भूल।
   क्रोध पूर्ण आँखों से उसके दोषों को देखा– यह है तुम्हारी तीसरी भूल।
   अपने कानों से उसकी निंदा सुनी– यह है तुम्हारी चौथी भूल।
    तुम्हारे हृदय में दामाद के प्रति क्रोध व घृणा है– यह है तुम्हारी आखिरी भूल।
     *अपनी इन भूलों से तुमने अपने दामाद को दुःख दिया है। तुम्हारा दिया दुःख ही कई गुना हो तुम्हारे पास लौटा है। जाओ, अपनी भूलों के लिए "क्षमा" माँगों। नहीं तो तुम न चैन से जी सकोगे, न चैन से मर सकोगे। क्षमा माँगना बहुत बड़ी साधना है। ओर तुम तो एक बहुत अच्छे साधक हो।"*
     *सेठ जी की आँखें खुल गयीं। संतश्री को प्रणाम करके वे दामाद के घर पहुँचे। सब लोग भोजन की तैयारी में थे। उन्होंने दरवाजा खटखटाया। दरवाजा उनके दोहीते ने खोला। सामने नानाजी को देखकर वह अवाक् सा रह गया और खुशी से झूमकर जोर-जोर से चिल्लाने लगाः "मम्मी ! पापा !! देखो कौन आये ! नानाजी आये हैं, नानाजी आये हैं....।"*
     *माता-पिता ने दरवाजे की तरफ देखा। सोचा, 'कहीं हम सपना तो नहीं देख रहे !' बेटी हर्ष से पुलकित हो उठी, 'अहा ! पन्द्रह वर्ष के बाद आज पिताजी घर पर आये हैं।' प्रेम से गला रूँध गया, कुछ बोल न सकी। सेठ जी ने फल व मिठाइयाँ टेबल पर रखीं और दोनों हाथ जोड़कर दामाद को कहाः- "बेटा ! सारी भूल मुझसे हुई है, मुझे क्षमा करो ।"*
     *"क्षमा" शब्द निकलते ही उनके हृदय का प्रेम अश्रु बनकर बहने लगा। दामाद उनके चरणों में गिर गये और अपनी भूल के लिए रो-रोकर क्षमा याचना करने लगे। ससुरजी के प्रेमाश्रु दामाद की पीठ पर और दामाद के पश्चाताप व प्रेममिश्रित अश्रु ससुरजी के चरणों में गिरने लगे।*
    *पिता-पुत्री से और पुत्री अपने वृद्ध पिता से क्षमा माँगने लगी। क्षमा व प्रेम का अथाह सागर फूट पड़ा। सब शांत, चुप, सबकी आँखों से अविरल अश्रुधारा बहने लगी। दामाद उठे और रूपये लाकर ससुरजी के सामने रख दिये। ससुरजी कहने लगेः "बेटा ! आज मैं इन कौड़ियों को लेने के लिए नहीं आया हूँ। मैं अपनी भूल मिटाने, अपनी साधना को सजीव बनाने और द्वेष का नाश करके प्रेम की गंगा बहाने आया हूँ ।*
     *मेरा आना सफल हो गया, मेरा दुःख मिट गया। अब मुझे आनंद का एहसास हो रहा है।"*
    *दामाद ने कहाः- "पिताजी ! जब तक आप ये रूपये नहीं लेंगे तब तक मेरे हृदय की तपन नहीं मिटेगी। कृपा करके आप ये रूपये ले लें।*
     *सेठ जी ने दामाद से रूपये लिये और अपनी इच्छानुसार बेटी व नातियों में बाँट दिये । सब कार में बैठे, घर पहुँचे।*
      *पन्द्रह वर्ष बाद उस अर्धरात्रि में जब माँ-बेटी, भाई-बहन, ननद-भाभी व बालकों का मिलन हुआ तो ऐसा लग रहा था कि मानो साक्षात् प्रेम ही शरीर धारण किये वहाँ पहुँच गया हो।*
    *सारा परिवार प्रेम के अथाह सागर में मस्त हो रहा था। "क्षमा" माँगने के बाद उस सेठ जी के दुःख, चिंता, तनाव, भय, निराशारूपी मानसिक रोग जड़ से ही मिट गये और साधना सजीव हो उठी।*
     *हमें भी अपने दिल में "क्षमा" रखनी चाहिए अपने सामने छोटा हो या बडा अपनी गलती हो या ना हो क्षमा मांग लेने से सब झगडे समाप्त हो जाते है।*
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रविवार, 5 सितंबर 2021

निरर्थक कुछ भी नहीं

 

एक बार एक शिष्य ने विनम्रतापूर्वक अपने गुरु जी से पूछा- ‘गुरु जी, कुछ लोग कहते हैं कि जीवन एक संघर्ष है, कुछ अन्य कहते हैं कि जीवन एक खेल है और कुछ जीवन को एक उत्सव की संज्ञा देते हैं। इनमें कौन सही है?’

गुरु जी ने तत्काल बड़े ही धैर्यपूर्वक उत्तर दिया- ‘पुत्र,जिन्हें गुरु नहीं मिला उनके लिए जीवन एक संघर्ष है; जिन्हें गुरु मिल गया उनका जीवन एक खेल है और जो लोग गुरु द्वारा बताये गए मार्ग पर चलने लगते हैं, मात्र वे ही जीवन को एक उत्सव का नाम देने का साहस जुटा पाते हैं।’

यह उत्तर सुनने के बाद भी शिष्य पूरी तरह से संतुष्ट न था। गुरु जी को इसका आभास हो गया।वे कहने लगे- ‘लो,तुम्हें इसी सन्दर्भ में एक कहानी सुनाता हूँ। ध्यान से सुनोगे तो स्वयं ही अपने प्रश्न का उत्तर पा सकोगे।’

उन्होंने जो कहानी सुनाई, वह इस प्रकार थी-

एक बार की बात है कि किसी गुरुकुल में तीन शिष्यों नें अपना अध्ययन सम्पूर्ण करने पर अपने गुरु जी से यह बताने के लिए विनती की कि उन्हें गुरुदाक्षिणा में, उनसे क्या चाहिए।गुरु जी पहले तो मंद-मंद मुस्कराये और फिर बड़े स्नेहपूर्वक कहने लगे- ‘मुझे तुमसे गुरुदक्षिणा में एक थैला भर के सूखी पत्तियां चाहिए, ला सकोगे?’

वे तीनों मन ही मन बहुत प्रसन्न हुए क्योंकि उन्हें लगा कि वे बड़ी आसानी से अपने गुरु जी की इच्छा पूरी कर सकेंगे। सूखी पत्तियाँ तो जंगल में सर्वत्र बिखरी ही रहती हैं| वे उत्साहपूर्वक एक ही स्वर में बोले- "जी गुरु जी, जैसी आपकी आज्ञा।’'

अब वे तीनों शिष्य चलते-चलते एक समीपस्थ जंगल में पहूंच चुके थे।लेकिन यह देखकर कि वहाँ पर तो सूखी पत्तियाँ केवल एक मुट्ठी भर ही थीं, उनके आश्चर्य का ठिकाना न रहा। वे सोच में पड़ गये कि आखिर जंगल से कौन सूखी पत्तियां उठा कर ले गया होगा? इतने में ही उन्हें दूर से आता हुआ कोई किसान दिखाई दिया।वे उसके पास पहुँच कर, उससे विनम्रतापूर्वक याचना करने लगे कि वह उन्हें केवल एक थैला भर सूखी पत्तियां दे दे। अब उस किसान ने उनसे क्षमायाचना करते हुए, उन्हें यह बताया कि वह उनकी मदद नहीं कर सकता क्योंकि उसने सूखी पत्तियों का ईंधन के रूप में पहले ही उपयोग कर लिया था। अब, वे तीनों, पास में ही बसे एक गाँव की ओर इस आशा से बढ़ने लगे थे कि हो सकता है वहाँ उस गाँव में उनकी कोई सहायता कर सके। वहाँ पहूंच कर उन्होंने जब एक व्यापारी को देखा तो बड़ी उम्मीद से उससे एक थैला भर सूखी पत्तियां देने के लिए प्रार्थना करने लगे लेकिन उन्हें फिर से एकबार निराशा ही हाथ आई क्योंकि उस व्यापारी ने तो, पहले ही, कुछ पैसे कमाने के लिए सूखी पत्तियों के दोने बनाकर बेच दिए थे लेकिन उस व्यापारी ने उदारता दिखाते हुए उन्हें एक बूढी माँ का पता बताया जो सूखी पत्तियां एकत्रित किया करती थी। पर भाग्य ने यहाँ पर भी उनका साथ नहीं दिया क्योंकि वह बूढी माँ तो उन पत्तियों को अलग-अलग करके कई प्रकार की ओषधियाँ बनाया करती थी।।अब निराश होकर वे तीनों खाली हाथ ही गुरुकुल लौट गये।

गुरु जी ने उन्हें देखते ही स्नेह पूर्वक पूछा- ‘पुत्रो, ले आये गुरुदक्षिणा?’ 

तीनों ने सर झुका लिया।

गुरू जी द्वारा दोबारा पूछे जाने पर उनमें से एक शिष्य कहने लगा-  ‘गुरुदेव, हम आपकी इच्छा पूरी नहीं कर पाये। हमने सोचा था कि सूखी पत्तियां तो जंगल में सर्वत्र बिखरी ही रहती होंगी लेकिन बड़े ही आश्चर्य की बात है कि लोग उनका भी कितनी तरह से उपयोग करते हैं।"  

गुरु जी फिर पहले ही की तरह मुस्कराते हुए प्रेमपूर्वक बोले- ‘निराश क्यों होते हो? प्रसन्न हो जाओ और यही ज्ञान कि सूखी पत्तियां भी व्यर्थ नहीं हुआ करतीं, बल्कि उनके भी अनेक उपयोग हुआ करते हैं; मुझे गुरुदक्षिणा के रूप में दे दो।’

तीनों शिष्य गुरु जी को प्रणाम करके खुशी-खुशी अपने-अपने घर की ओर चले गये।
      
वह शिष्य जो गुरु जी की कहानी एकाग्रचित्त हो कर सुन रहा था, अचानक बड़े उत्साह से बोला- ‘गुरु जी,अब मुझे अच्छी तरह से ज्ञात हो गया है कि आप क्या कहना चाहते हैं।आप का संकेत, वस्तुतः इसी ओर है न कि जब सर्वत्र सुलभ सूखी पत्तियां भी निरर्थक या बेकार नहीं होती हैं तो फिर हम कैसे, किसी भी वस्तु या व्यक्ति को छोटा और महत्त्वहीन मान कर उसका तिरस्कार कर सकते हैं? चींटी से लेकर हाथी तक और सुई से लेकर तलवार तक-सभी का अपना-अपना महत्त्व होता है।’

गुरु जी भी तुरंत ही बोले- ‘हाँ, पुत्र, मेरे कहने का भी यही तात्पर्य है कि हम जब भी किसी से मिलें तो उसे यथायोग्य मान देने का भरसक प्रयास करें ताकि आपस में स्नेह, सद्भावना, सहानुभूति एवं सहिष्णुता का विस्तार होता रहे और हमारा जीवन संघर्ष के बजाय उत्सव बन सके। दूसरे, यदि जीवन को एक खेल ही माना जाए तो बेहतर यही होगा कि हम निर्विक्षेप, स्वस्थ एवं शांत प्रतियोगिता में ही भाग लें और अपने निष्पादन तथा निर्माण को ऊंचाई के शिखर पर ले जाने का अथक प्रयास करें।

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शनिवार, 4 सितंबर 2021

निमित्त मात्र


आज हमने गरीबों को भोजन करवाया। आज हमने ये बांटा, आज हमने वो दान किया...

हम अक्सर ऐसा कहते और मानते हैं। इसी से सम्बंधित एक अविस्मरणीय कथा सुनिए...

एक लकड़हारा रात-दिन लकड़ियां काटता, मगर कठोर परिश्रम के बावजूद उसे आधा पेट भोजन ही मिल पाता था।

एक दिन उसकी मुलाकात एक साधु से हुई। लकड़हारे ने साधु से कहा कि जब भी आपकी प्रभु से मुलाकात हो जाए, मेरी एक फरियाद उनके सामने रखना और मेरे कष्ट का कारण पूछना।

कुछ दिनों बाद उसे वह साधु फिर मिला।
लकड़हारे ने उसे अपनी फरियाद की याद दिलाई तो साधु ने कहा कि- "प्रभु ने बताया हैं कि लकड़हारे की आयु 60 वर्ष हैं और उसके भाग्य में पूरे जीवन के लिए सिर्फ पाँच बोरी अनाज हैं। इसलिए प्रभु उसे थोड़ा अनाज ही देते हैं ताकि वह 60 वर्ष तक जीवित रह सके।"

समय बीता। साधु उस लकड़हारे को फिर मिला तो लकड़हारे ने कहा---
"ऋषिवर...!! अब जब भी आपकी प्रभु से बात हो तो मेरी यह फरियाद उन तक पहुँचा देना कि वह मेरे जीवन का सारा अनाज एक साथ दे दें, ताकि कम से कम एक दिन तो मैं भरपेट भोजन कर सकूं।"

अगले दिन साधु ने कुछ ऐसा किया कि लकड़हारे के घर ढ़ेर सारा अनाज पहुँच गया।

लकड़हारे ने समझा कि प्रभु ने उसकी फरियाद कबूल कर उसे उसका सारा हिस्सा भेज दिया हैं।
उसने बिना कल की चिंता किए, सारे अनाज का भोजन बनाकर फकीरों और भूखों को खिला दिया और खुद भी भरपेट खाया।

लेकिन अगली सुबह उठने पर उसने देखा कि उतना ही अनाज उसके घर फिर पहुंच गया हैं। उसने फिर गरीबों को खिला दिया। फिर उसका भंडार भर गया।
यह सिलसिला रोज-रोज चल पड़ा और लकड़हारा लकड़ियां काटने की जगह गरीबों को खाना खिलाने में व्यस्त रहने लगा।

कुछ दिन बाद वह साधु फिर लकड़हारे को मिला तो लकड़हारे ने कहा---"ऋषिवर ! आप तो कहते थे कि मेरे जीवन में सिर्फ पाँच बोरी अनाज हैं, लेकिन अब तो हर दिन मेरे घर पाँच बोरी अनाज आ जाता हैं।"

साधु ने समझाया, "तुमने अपने जीवन की परवाह ना करते हुए अपने हिस्से का अनाज गरीब व भूखों को खिला दिया।
इसीलिए प्रभु अब उन गरीबों के हिस्से का अनाज तुम्हें दे रहे हैं।"

कथासार- किसी को भी कुछ भी देने की शक्ति हम में है ही नहीं, हम देते वक्त ये सोचते हैं, की जिसको कुछ दिया तो  ये मैंने दिया !
दान, वस्तु, ज्ञान, यहाँ तक की अपने बच्चों को भी कुछ देते दिलाते हैं, तो कहते हैं मैंने दिलाया ।
वास्तविकता ये है कि वो उनका अपना है आप को सिर्फ परमात्मा ने निमित्त मात्र बनाया हैं। ताकी उन तक उनकी जरूरते पहुचाने के लिये। तो निमित्त होने का घमंड कैसा ??

दान किए से जाए दुःख,दूर होएं सब पाप,
नाथ आकर द्वार पे, दूर करें संताप..!!
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रविवार, 29 अगस्त 2021

दान या सौदा

एक बार की बात है कि श्री कृष्ण और अर्जुन कहीं जा रहे थे। रास्ते में अर्जुन ने श्री कृष्ण से पूछा कि प्रभु- एक जिज्ञासा है  मेरे मन में, अगर आज्ञा हो तो पूछूँ ? श्री कृष्ण ने कहा- अर्जुन , तुम मुझसे बिना किसी हिचक, कुछ भी पूछ सकते हो। तब अर्जुन ने कहा कि मुझे आज तक यह बात समझ नहीं आई है कि दान तो मैं भी बहुत करता हूँ परन्तु सभी लोग कर्ण को ही सबसे बड़ा दानी क्यों कहते हैं ? यह प्रश्न सुन श्री कृष्ण मुस्कुराये और बोले कि आज मैं तुम्हारी यह जिज्ञासा अवश्य शांत करूँगा। श्री कृष्ण ने पास में ही स्थित दो पहाड़ियों को सोने का बना दिया। इसके बाद वह अर्जुन से बोले कि हे अर्जुन इन दोनों सोने की पहाड़ियों को तुम आस पास के गाँव वालों में बाँट दो।

        अर्जुन प्रभु से आज्ञा ले कर तुरन्त ही यह काम करने के लिए चल दिया। उसने सभी गाँव वालों को बुलाया और उनसे कहा कि वह लोग पंक्ति बना लें अब मैं आपको सोना बाटूँगा और सोना बाँटना शुरू कर दिया। गाँव वालों ने अर्जुन की खूब जय जयकार करनी शुरू कर दी। अर्जुन सोना पहाड़ी में से तोड़ते गए और गाँव वालों को देते गए।
         लगातार दो दिन और दो रातों तक अर्जुन सोना बाँटते रहे। उनमे अब तक अहंकार आ चुका था। गाँव के लोग वापस आ कर दोबारा से लाईन में लगने लगे थे। इतने समय पश्चात अर्जुन काफी थक चुके थे। जिन सोने की पहाड़ियों से अर्जुन सोना तोड़ रहे थे, उन दोनों पहाड़ियों के आकार में जरा भी कमी नहीं आई थी। उन्होंने श्री कृष्ण जी से कहा कि अब  मुझसे यह काम और न हो सकेगा। मुझे थोड़ा विश्राम चाहिए। प्रभु ने कहा कि ठीक है तुम अब विश्राम करो और उन्होंने कर्ण बुला लिया। उन्होंने कर्ण से कहा कि इन दोनों पहाड़ियों का सोना इन गांव वालों में बाँट दो।
        कर्ण तुरन्त सोना बाँटने चल दिये। उन्होंने गाँव वालों को बुलाया और उनसे कहा- यह सोना आप लोगों का है, जिसको जितना सोना चाहिए वह यहाँ से ले जाये। ऐसा कह कर कर्ण वहाँ से चले गए। यह देख कर अर्जुन ने कहा कि ऐसा करने का विचार मेरे मन में क्यों नही आया ?
        इस पर श्री कृष्ण ने जवाब दिया कि तुम्हे सोने से मोह हो गया था। तुम खुद यह निर्णय कर रहे थे कि किस गाँव वाले की कितनी जरूरत है। उतना ही सोना तुम पहाड़ी में से खोद कर उन्हे दे रहे थे। तुम में दाता होने का भाव आ गया था। दूसरी तरफ कर्ण ने ऐसा नहीं किया। वह सारा सोना गाँव वालों को देकर वहाँ से चले गए। वह नहीं चाहते थे कि उनके सामने कोई उनकी जय जयकार करे या प्रशंसा करे। उनके पीठ पीछे भी लोग क्या कहते हैं उस से उनको कोई फर्क नहीं पड़ता। यह उस आदमी की निशानी है जिसे आत्मज्ञान मिल हो चुका है। इस तरह श्री कृष्ण ने खूबसूरत तरीके से अर्जुन के प्रश्न का उत्तर दिया, अर्जुन को भी अब अपने प्रश्न का उत्तर मिल चुका था।
          *दान देने के बदले में धन्यवाद या बधाई की उम्मीद करना भी उपहार नहीं सौदा कहलाता है। यदि हम किसी को कुछ दान या सहयोग करना चाहते हैं तो हमें यह बिना किसी उम्मीद या आशा के करना चाहिए। ताकि यह हमारा सत्कर्म हो,न कि हमारा अहंकार..!!*

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