रविवार, 23 अक्टूबर 2022

भगवान धन्वंतरि

भगवान धन्वंतरि के प्रकटोत्सव पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं-------- 

कार्तिकास्यासिते पक्षे त्रयोदश्यां निशामुखे।
यमदीपं           वहिर्दद्यादपमृत्युर्विनश्यति।। 
   कार्तिक मास के कृष्णपक्ष की त्रयोदशी धनतेरस कहलाती है,   वस्तुतः यह यमराज से सम्बन्ध रखने वाला व्रत है। इस दिन सायंकाल घर के बाहर मुख्य दरवाजे पर यमराज के निमित्त दक्षिणाभिमुख दीपदान करना चाहिए।
इस दिन चाँदी का बर्तन खरीदना अत्यन्त शुभ माना गया है।        
  धन्वन्तरि विष्णु अंशावतार माने जाते हैं,वे आयुर्वेद प्रवर्तक हैं,इनका पृथ्वी लोक में अवतरण समुद्र मंथन के समय हुआ था।
  शरद पूर्णिमा को चंद्रमा, कार्तिक द्वादशी को कामधेनु गाय, त्रयोदशी को धन्वंतरी,चतुर्दशी को काली माता और अमावस्या को भगवती महालक्ष्मी जी का सागर से प्रादुर्भाव हुआ था। 
  इसीलिये दीपावली के दो दिन पूर्व धनतेरस को भगवान धन्वंतरी का जन्म धनतेरस के रूप में मनाया जाता है। इसी दिन इन्होंने आयुर्वेद का भी प्रादुर्भाव किया था।
इन्‍हें भगवान विष्णु का रूप कहते हैं जिनकी चार भुजायें हैं। उपर की दोंनों भुजाओं में शंख और चक्र धारण किये हुये हैं। जबकि दो अन्य भुजाओं मे से एक में जलूका और औषध तथा दूसरे मे अमृत कलश लिये हुये हैं। इनका प्रिय धातु पीतल माना जाता है। इसीलिये धनतेरस को पीतल आदि के बर्तन खरीदने की परंपरा भी है।
   भगवान धन्वन्तरि को आयुर्वेद के प्रणेता तथा वैद्यक शास्त्र के देवता के रूप में जाना जाता है। आदिकाल में आयुर्वेद की उत्पत्ति ब्रह्मा से ही मानते हैं।
    आदिकाल के ग्रंथों में 'रामायण'-'महाभारत' तथा विविध पुराणों की रचना हुई, जिसमें सभी ग्रंथों ने 'आयुर्वेदावतरण' के प्रसंग में भगवान धन्वन्तरि का उल्लेख किया है।
गरुड़पुराण' और 'मार्कण्डेयपुराण' के अनुसार वेद मंत्रों से अभिमंत्रित होने के कारण ही धन्वन्तरि वैद्य कहलाए थे। 
'विष्णुपुराण' के अनुसार धन्वन्तरि दीर्घतथा के पुत्र बताए गए हैं। इसमें बताया गया है वह धन्वन्तरि जरा विकारों से रहित देह और इंद्रियों वाला तथा सभी जन्मों में सर्वशास्त्र ज्ञाता है।
    भगवान नारायण ने उन्हें पूर्वजन्म में यह वरदान दिया था कि काशिराज के वंश में उत्पन्न होकर आयुर्वेद के आठ भाग करोगे और यज्ञ भाग के भोक्ता बनोग, इस प्रकार धन्वन्तरि का तीन रूपों में उल्लेख मिलता है-
         प्रथम  समुद्र मन्थन से उत्पन्न धन्वन्तरि। 
          द्वितीय  धन्व के पुत्र धन्वन्तरि।
         तृतीय  काशिराज दिवोदास धन्वन्तरि। 

    धन्वन्तरि प्रथम तथा द्वितीय का वर्णन पुराणों के अतिरिक्त आयुर्वेद ग्रंथों में भी  मिलता है, जिसमें आयुर्वेद के आदि ग्रंथों 'सुश्रुत्रसंहिता', 'चरकसंहिता', 'काश्यप संहिता' तथा 'अष्टांग हृदय' में उनका विभिन्न रूपों में उल्लेख मिलता है। 
    इसके अतिरिक्त अन्य आयुर्वेदिक ग्रंथों- 'भाव प्रकाश', 'शार्गधर' तथा उनके ही समकालीन अन्य ग्रंथों में 'आयुर्वेदावतरण' का प्रसंग उधृत है। इसमें भगवान धन्वन्तरि के संबंध में भी प्रकाश डाला गया है।
    महाकवि व्यास द्वारा रचित 'श्रीमद्भावत पुराण' के अनुसार धन्वन्तरि को भगवान विष्णु का अंश माना गया है तथा अवतारों में अवतार कहा गया है। 
'महाभारत', 'विष्णुपुराण', 'अग्निपुराण', 'श्रीमद्भागवत' महापुराणादि में यह उल्लेख मिलता है। 
    
    कहा जाता है कि देवता और असुर एक ही पिता कश्यप ऋषि के संतान थे, किंतु इनकी वंश वृद्धि बहुत अधिक हो गई थी। अतः ये अपने अधिकारों के लिए परस्पर आपस में लड़ा करते थे, वे तीनों ही लोकों पर राज्याधिकार प्राप्त करना चाहते थे। 
    राक्षसों के गुरु शुक्राचार्य थे, जो संजीवनी विद्या जानते थे और उसके बल से असुरों को पुन: जीवित कर सकते थे। इसके अतिरिक्त दैत्य, दानव आदि माँसाहारी होने के कारण हृष्ट-पुष्ट स्वस्थ तथा दिव्य शस्त्रों के ज्ञाता थे।
अतः युद्ध में असुरों की अपेक्षा देवताओं की मृत्यु अधिक होती थी---
    पुरादेवऽसुरायुद्धेहताश्चशतशोसुराः।
   हेन्यामान्यास्ततो देवाः शतशोऽथसहस्त्रशः।। 

देवता एवं दैत्यों के सम्मिलित प्रयास के श्रान्त हो जाने पर समुद्र मन्थन स्वयं क्षीर-सागरशायी कर रहे थे, हलाहल, कामधेनु, ऐरावत, उच्चै:श्रवा अश्व, अप्सराएँ, कौस्तुभमणि, वारुणी, महाशंख, कल्पवृक्ष, चन्द्रमा, लक्ष्मी और कदली वृक्ष उससे प्रकट हो चुके थे। 
    अन्त में हाथ में अमृतपूर्ण स्वर्ण कलश लिये श्याम वर्ण, चतुर्भुज भगवान धन्वन्तरि प्रकट हुए। 
अमृत-वितरण के पश्चात् देवराज इन्द्र की प्रार्थना पर भगवान धन्वन्तरि ने देव-वैद्य का पद स्वीकार कर लिया। 
अमरावती उनका निवास बनी,कालक्रम से पृथ्वी पर मनुष्य रोगों से अत्यन्त पीड़ित हो गये। प्रजापति इन्द्र ने धन्वन्तरि जी से प्रार्थना की, भगवान ने काशी के राजा दिवोदास के रूप में पृथ्वी पर अवतार धारण किया।
इनकी 'धन्वन्तरि-संहिता' आयुर्वेद का मूल ग्रन्थ है। आयुर्वेद के आदि आचार्य सुश्रुत मुनि ने धन्वन्तरि जी से ही इस शास्त्र का उपदेश प्राप्त किया था।
    इन्‍हे आयुर्वेद की चिकित्सा करनें वाले वैद्य आरोग्य का देवता कहते हैं। इन्होंने ही अमृतमय औषधियों की खोज की थी। इनके वंश में दिवोदास हुए जिन्होंने 'शल्य चिकित्सा' का विश्व का पहला विद्यालय काशी में स्थापित किया जिसके प्रधानाचार्य सुश्रुत बनाये गए थे।
सुश्रुत दिवोदास के ही शिष्य और ॠषि विश्वामित्र के पुत्र थे। 
   उन्होंने ही सुश्रुत संहिता लिखी थी, सुश्रुत विश्व के पहले सर्जन (शल्य चिकित्सक) थे।

    दीपावली के अवसर पर कार्तिक त्रयोदशी-धनतेरस को भगवान धन्वंतरि की पूजा करते हैं। 
    त्रिलोकी के व्योम रूपी समुद्र के मंथन से उत्पन्न विष का महारूद्र भगवान शंकर ने विषपान किया, धन्वंतरि ने अमृत प्रदान किया और इस प्रकार काशी कालजयी नगरी बन गयी।
    वैदिक काल में जो महत्व और स्थान अश्विनी को प्राप्त था वही पौराणिक काल में धन्वंतरि को प्राप्त हुआ। जहाँ अश्विनी के हाथ में मधुकलश था वहाँ धन्वंतरि को अमृत कलश मिला, क्योंकि विष्णु संसार की रक्षा करते हैं अत: रोगों से रक्षा करने वाले धन्वंतरि को विष्णु का अंश माना गया।
विषविद्या के संबंध में कश्यप और तक्षक का जो संवाद महाभारत में आया है, वैसा ही धन्वंतरि और नागदेवी मनसा का ब्रह्मवैवर्त पुराण में आया है।
उन्हें गरुड़ का शिष्य कहा गया है ----
          सर्ववेदेषु   निष्णातो   मन्त्रतन्त्र   विशारद:।
           शिष्यो हि वैनतेयस्य शंकरोस्योपशिष्यक:।। 

भगवाण धन्वंतरि की साधना के लिये एक साधारण मंत्र है-----
                   "ॐ धन्वंतरये नम:"
इसके अलावा उनका एक और मंत्र भी है----
"ॐ नमो भगवते महासुदर्शनाय वासुदेवाय धन्वंतरये
अमृतकलशहस्ताय सर्वभयविनाशाय सर्वरोगनिवारणाय
त्रिलोकपथाय त्रिलोकनाथाय श्री महाविष्णुस्वरूपाय
श्रीधन्वंतरीस्वरूपाय श्रीश्रीश्री औषधचक्राय नारायणाय नम:।।" 
ॐ नमो भगवते धन्वन्तरये अमृतकलशहस्ताय सर्व आमय विनाशनाय त्रिलोकनाथाय श्रीमहाविष्णवे नम:।।
अर्थात
परम भगवान् को, जिन्हें सुदर्शन वासुदेव धन्वंतरि कहते हैं, जो अमृत कलश लिये हैं, सर्वभय नाशक हैं, सररोग नाश करते हैं, तीनों लोकों के स्वामी हैं और उनका निर्वाह करने वाले हैं, उन विष्णु स्वरूप धन्वंतरी को नमन है। 

ॐ शंखं चक्रं जलौकां दधदमृतघटं चारुदोर्भिश्चतुर्मिः।
सूक्ष्मस्वच्छातिहृद्यांशुक परिविलसन्मौलिमंभोजनेत्रम्॥
कालाम्भोदोज्ज्वलांगं कटितटविलसच्चारूपीतांबराढ्यम्।
वन्दे धन्वंतरिं तं निखिलगदवनप्रौढदावाग्निलीलम्॥ 
 
   *भगवान धन्वन्तरि आयुर्वेद जगत् के प्रणेता तथा वैद्यक शास्त्र के देवता माने जाते हैं। भारतीय पौराणिक दृष्टि से 'धनतेरस' को स्वास्थ्य के देवता धन्वन्तरि का दिवस माना जाता है। धन्वन्तरि आरोग्य, सेहत, आयु और तेज के आराध्य देवता हैं, धनतेरस के दिन उनसे प्रार्थना की जाती है कि वे समस्त जगत को निरोग कर मानव समाज को दीर्घायु प्रदान करें---*
"नमामि   धन्वन्तरिमादिदेवं,   सुरासुरैर्वन्दितपादपद्मम्।
लोके जरारूग्भयमृत्युनाशंधातारमींश विविधौषधीनाम्।।"
पं शिवप्रसाद त्रिपाठी आचार्य का आलेख ज्ञानवर्धन लगा ।

शनिवार, 22 अक्टूबर 2022

कथा उर्मिला की

उर्मिला

"उर्मिला! माय वाटिका से पुष्प लाने के लिए कह रही हैं। चलो! अपनी सखियों को भी ले लो।"
     "चलिये सिया दाय! पर पुष्प लेने के लिए दासियों को भी भेजा जा सकता है, आपके जाने का क्या काम?"
     "ऐसा नहीं कहते रे! पूजा के काम स्वयं करने चाहिये। यदि ईश्वर के समक्ष भी हम बड़े होने का अभिमान नहीं त्याग पाएं, तो फिर कैसी पूजा? फिर वे भी हमारी नहीं सुनते। उनके लिए तो राजा रंक सभी बराबर हैं।"
      "ठीक कहा दाय!" मुस्कुराती उर्मिला ने प्रेम से सीता की उंगली पकड़ ली और वाटिका की ओर चली। माण्डवी और श्रुतिकीर्ति भी उनके साथ थीं। राह में सबसे छोटी बहन श्रुतिकीर्ति ने बड़ी बहन से परिहास किया- "लगता है ज्येष्ठ पिताश्री से भूल हो गयी। यह शिव धनुष तो टूटता हुआ नहीं दिख रहा। संसार के समस्त योद्धा हार कर लौट गए। बेचारी सिया दाय! अब उनका विवाह कैसे होगा?"
     सिया ने हँस कर उसके माथे पर चपत लगाई और कहा, "जो कार्य जिसके लिए रचा गया है उसे वही करता है। जबतक वह न आये, वह कार्य अधूरा ही रहता है। शिव धनुष भी टूटेगा और सीता का लग्न भी होगा, बस वह योग्य पुरुष जनकपुर तक पहुँच जाये। तनिक प्रतीक्षा करो..."
    "पर अब कब आएगा दाय! इतने दिनों से स्वयम्बर चल रहा है, अबतक क्यों नहीं आया?"
     "अच्छा एक बात बताओ! अबतक आये राजाओं राजकुमारों में तुम्हे ऐसा कोई दिखा, जिसे देखते ही तुम्हारे मन ने कहा हो, हाँ यही है दाय के योग्य वर! इससे ही दाय का लग्न होना चाहिये! बोलो?"
     "नहीं दाय ! ऐसा तो कोई नहीं आया। सब जाने कैसे कैसे आते रहे।" उर्मिला से उदास से स्वर में कहा।
      "तो प्रतीक्षा करो, वे जब आएंगे तब तुम्हारा मन ही चीखने लगेगा कि यही हैं... और देखना, जो तुम्हे पसन्द आएगा वही धनुष तोड़ भी देगा।" सीता के मुख पर दैविक आत्मविश्वास की झलक थी।
      चारों बहने वाटिका पहुँच चुकी थीं। अचानक उर्मिला ने किसी को देखा और चीखती हुई सीता के पास आई। कहा- सिया दाय! आज ही आपने कहा और आज ही वे दिख गए। वाटिका के उस ओर दो कुमार पुष्प ले रहे हैं। उस साँवले को देख कर लगा कि वे ही तुम्हारे योग्य हैं। उनके जैसा कुमार तो कभी न देखा, कहीं न देखा!"
      सारी बहनें पास आ गईं। सिया मुस्कुराईं और कहा- पक्का?
--अरे पक्का जीजी! चल के देख लो, उनसे अधिक सुघर तो संसार में कोई न होगा...
--फिर तो धनुष वही तोड़ेंगे, देख लेना।
-- यह आप बिना देखे कैसे कह सकती हैं दाय! देख तो लीजिये...
-- सिया मैं हूँ कि तुम हो? निश्चिन्त रहो, वे ही होंगे तुम्हारे पाहुन!
-- अच्छा चलो पहले देख तो लो।
--चल!
      चारों बहनें वाटिका की दूसरी ओर गईं जिधर अयोध्या के भावी नरेश, जगत के पालनहार, मर्यादापुरुषोत्तम श्रीराम अपने अनुज के साथ फूल ले रहे थे। जिस क्षण सिया ने उन्हें देखा, ठीक उसी क्षण उन्होंने भी दृष्टि ऊपर उठाई और इस तरह भगवान श्रीहरि और माता लक्ष्मी के मानवीय स्वरूपों ने पहली बार एक दूसरे को देखा। उन्होंने एक दूसरे को देखा और देखते रह गए। जड़ हो कर देखती रह गईं उर्मिला, माण्डवी और श्रुतिकीर्ति भी, उनके समक्ष राम जो थे। किसकी दृष्टि हटती उस साँवले से...
      वाटिका की रक्षा सुरक्षा में लगे मालियों, सैनिकों ने देखा, जैसे संसार की सारी शोभा इसी वाटिका में उतर आई हो। वे वाटिका में एकाएक खिल उठे संसार के सबसे सुंदर पुष्पों को एकटक निहारते रह गए!
     हवा का एक झोंका आया और वाटिका के बृक्षों पर लगे सारे पुष्प एक साथ झड़ गए। जैसे जगतपिता के चरणों पर चढ़ जाने की होड़ लग गयी हो...
     पूरी प्रकृति मुस्कुरा उठी। संसार का सबसे सुंदर जोड़ा एक दूसरे को अपलक निहार रहा था।
क्रमशः
(पौराणिक पात्रों व कथानक के सुख्यात लेखनी के धनी, गोपालगंज, बिहार से सर्वेश तिवारी श्रीमुख द्वारा लिखित ये इतनी प्यारी व आकर्षण भरी लगी, कि शेयर करने के लोभ को रोक न पाया )

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रविवार, 16 अक्टूबर 2022

मुश्किलें

एक व्यक्ति बहुत दिनों से तनावग्रस्त चल रहा था जिसके कारण वह काफी चिड़चिड़ा तथा क्रोध में रहने लगा था।

वह हमेशा इस बात से परेशान रहता था कि घर के सारे खर्चे उसे ही उठाने पड़ते हैं, पूरे परिवार की जिम्मेदारी उसी के ऊपर है, किसी ना किसी रिश्तेदार का उसके यहाँ रोज आना जाना लगा ही रहता है, उसे बहुत ज्यादा ख़र्च करना पड़ता है , आदि - आदि।

इन्ही बातों को सोच सोच कर वह अक़्सर काफी परेशान रहता था , अपने बच्चों को अक्सर डांट देता था तथा अपनी पत्नी से भी ज्यादातर उसका किसी न किसी बात पर झगड़ा होता रहता था।

इसी तरह समय गुजरता गया ।

एक दिन उसका बेटा उसके पास आया और बोला...... पिताजी मेरा स्कूल का होमवर्क करा दीजिये प्लीज ।

वह व्यक्ति पहले से ही तनाव में था ,इसलिए उसने बेटे को जोर से डांट कर भगा दिया , लेकिन जब थोड़ी देर बाद उसका गुस्सा शांत हुआ तो वह बेटे के पास गया ।उसने  देखा कि बेटा गहरी नींद में सोया हुआ है और उसके हाथ में उसके होमवर्क की कॉपी है।

उसने धीरे से जब कॉपी लेकर जैसे ही नीचे रखनी चाही, उसकी नजर होमवर्क के टाइटल पर पड़ी।

होमवर्क का टाइटल था.....वे चीजें जो हमें शुरू में अच्छी नहीं लगतीं , लेकिन बाद में वे अच्छी ही होती हैं।

इस टाइटल पर बच्चे को एक पैराग्राफ लिखना था जो उसने लिख लिया था। उत्सुकतावश उसने बच्चे का लिखा पढना शुरू किया बच्चे ने लिखा था.......

*मैं अपने फाइनल एग्जाम को बहुंत धन्यवाद् देता हूँ क्योंकि शुरू में तो ये बिलकुल अच्छे नहीं लगते लेकिन इनके बाद स्कूल की छुट्टियाँ पड़ जाती हैं।*

*मैं ख़राब स्वाद वाली कड़वी दवाइयों को बहुत धन्यवाद् देता हूँ क्योंकि शुरू में तो ये कड़वी लगती हैं लेकिन ये मुझे बीमारी से ठीक करती हैं।*

*मैं सुबह - सुबह जगाने वाली उस अलार्म घड़ी को बहुत धन्यवाद् देता हूँ जो मुझे हर सुबह बताती है कि मैं जीवित हूँ।*

*मैं ईश्वर को भी बहुत धन्यवाद देता हूँ जिसने मुझे इतने अच्छे पिता दिए क्योंकि उनकी डांट मुझे शुरू में तो बहुत बुरी लगती है लेकिन वो मेरे लिए खिलौने लाते हैं, मुझे घुमाने ले जाते हैं और मुझे अच्छी अच्छी चीजें खिलाते हैं और मुझे इस बात की ख़ुशी है कि मेरे पास पिता हैं क्योंकि मेरे दोस्त राजू के तो पिता ही इस दुनिया में नहीं हैं।*

बच्चे का होमवर्क पढने के बाद वह व्यक्ति जैसे अचानक नींद से जाग गया हो। उसकी सोच बदल सी गयी। बच्चे की लिखी बातें उसके दिमाग में बार बार घूम रही थी। खासकर वह अंतिम वाली लाइन। उसकी नींद उड़ गयी थी। फिर वह व्यक्ति थोडा शांत होकर बैठा और उसने अपनी परेशानियों के बारे में सोचना शुरू किया.......

*मुझे घर के सारे खर्चे उठाने पड़ते हैं, इसका मतलब है कि मेरे पास घर है और ईश्वर की कृपा से मैं उन लोगों से बेहतर स्थिति में हूँ जिनके पास घर नहीं है।*

*मुझे पूरे परिवार की जिम्मेदारी उठानी पड़ती है, इसका मतलब है कि मेरा परिवार है, पत्नी बच्चे हैं और ईश्वर की कृपा से मैं उन लोगों से ज्यादा खुशनसीब हूँ जिनके पास परिवार नहीं हैं और वो दुनियाँ में बिल्कुल अकेले हैं।*

*मेरे यहाँ कोई ना कोई मित्र या रिश्तेदार आता जाता रहता है, इसका मतलब है कि मेरी एक सामाजिक हैसियत है और मेरे पास मेरे सुख दुःख में साथ देने वाले लोग हैं।*

*मैं बहुत ज्यादा ख़र्च करता हूँ, इसका मतलब है कि मेरे पास अच्छी नौकरी है और मैं उन लोगों से बेहतर हूँ जो बेरोजगार हैं या पैसों की वजह से बहुत सी चीजों और सुविधाओं से वंचित हैं।*

हे ! मेरे भगवान् ! तेरा बहुंत बहुंत शुक्रिया मुझे माफ़ करना, मैं तेरी कृपा को पहचान नहीं पाया।

इसके बाद उसकी सोच एकदम से बदल गयी, उसकी सारी परेशानी, सारी चिंता एक दम से जैसे ख़त्म हो गयी। वह एकदम से बदल सा गया। वह भागकर अपने बेटे के पास गया और सोते हुए बेटे को गोद में उठाकर उसके माथे को चूमने लगा और अपने बेटे को तथा ईश्वर को धन्यवाद देने लगा।

मित्रों........हमारे सामने जो भी परेशानियाँ हैं, हम जब तक उनको नकारात्मक नज़रिये से देखते रहेंगे , तब तक हम गंभीर परेशानियों से घिरे रहेंगे , लेकिन जैसे ही हम उन्हीं चीजों को, उन्ही परिस्थितियों को सकारात्मक नज़रिये से देखेंगे, हमारी सोच एकदम से बदल जाएगी, हमारी सारी चिंताएं, सारी परेशानियाँ, सारे तनाव एक दम से ख़त्म हो जायेंगे और हमें मुश्किलों से निकलने के नए - नए रास्ते दिखाई देने लगेंगे।

मुश्किलें मुझ पर पड़ी इनती, कि आसां हो गई !!

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शनिवार, 15 अक्टूबर 2022

अपना अपना भाग्य

चंद्रवती मेरे घर करीब बीस साल रही। बीस साल से अधिक समय तक वो हमारे घर के काम करती रही। बर्तन धोने से लेकर झाड़ू-पोछा और कपड़ों की धुलाई तक का ज़िम्मा उसी पर था। शुरू में करीब दो सौ रूपए महीने उसकी सैलरी तय हुई थी, जो धीरे-धीरे बढ़ कर कई हज़ार रूपए होती चली गई। जैसे-जैस मेरी सैलरी बढ़ती गई, उसकी सैलरी भी बढ़ाता गया।
चंद्रवती क्योंकि सिर्फ हमारे घर काम करती थी इसलिए जब मैं कुछ सालों के लिए अमेरिका चला गया, तब भी हमने चंद्रवती को नौकरी से नहीं हटाया। हमने उसे घर की एक चाबी दे दी थी कि तुम हफ्ते में एक दिन घर की सफाई करती रहना, तुम्हारे पैसे एकाउंट में ट्रांसफर होते रहेंगे। ऐसा ही हुआ। हम अमेरिका में रहे, चंद्रवती यहां हमारे पीछे भी घर की देखभाल करती रही और जब हम वहां से वापस आए तो फिर वो पूरी तरह काम पर लग गई।
पिछले साल जब हमने पुराना मुहल्ला छोड़ा तो चंद्रवती का साथ भी छूट गया।
हम नए घर में आए तो मन में यही था कि चंद्रवती को जो सैलरी हम दे रहे थे, वो पैसे अब बच जाएंगे, क्योंकि नए मुहल्ले में हम जिसे भी काम पर रखेंगे, उसे उतने पैसे नहीं देने होंगे। चंद्रवती तो बीस साल से अधिक हमारे साथ रही, मेरा बेटा उसकी गोद में खेला और उसने हमारे घर की देखभाल घर के सदस्य के रूप में की, तो उसे हम जितने पैसे देते थे, वो आम काम वाली की सैलरी से दुगुना-तिगुना अधिक था। ऐसे में हमारे पास काम वाली के हिस्से के आधे से अधिक पैसे बचने थे।
पर नहीं बचे।
ऐसा मत सोचिएगा कि   पैसों के बचने से बहुत खुश हो रहे थे, दरअसल मैं आपको जिस सच्ची घटना के बारे में बता रहा हूं, उसका आधार एक छोटी सी कहानी है। वो कहानी भी आपको सुनाऊंगा, हो सकता है आपने पढ़ी भी हो, पर पहले आप मेरी आपबीती सुनिए। हमने जब नया घर लिया तो सभी खर्च जोड़ लिए। सबका हिसाब बना लिया। हमने ये भी जोड़ लिया कि चंद्रवती की सैलरी के इतने पैसे जो हमें कामवाली पर नहीं खर्च करने, वो बच जाएंगे।
पर हम तब ये जोड़ना भूल गए कि घर के पीछे लॉन की देखभाल कौन करेगा। नए मकान में शिफ्ट हुए हो गया तब अचानक याद आया कि इतने बड़े लॉन की देखभाल के लिए तो एक माली चाहिए। माली ढूंढा गया। उसने बताया कि वो इतने पैसे महीने में बतौर सैलरी लेगा, इतने पैसे खाद-पानी पर खर्च होंगे, इतने पैसे पौधे लाने पर।
पूरा हिसाब जोड़ा गया तो वो चंद्रवती की सैलरी से ऊपर चला गया।
कोई बात नहीं। हमें कोई नुकसान नहीं हो रहा था।
अब सुनिए आगे की कहानी। मेरे पास वर्षों से एक ड्राइवर थ जिसका नाम था आशु। पिछले दिनों आशु ने अपना खुद का काम करने की इच्छा जताई। आशु के बिना मुझे मुश्किल तो होने वाली थी, पर पल भर को हमारे मन में आया कि चलो बीस हज़ार रुपए महीने के बचेंगे।
आशु चला गया। जिस दिन आशु गया, मेरे पास एक छोटा सा फ्लैट है, जो किराए पर लगा था, उसका किराएदार उसे खाली करके चला गया। अब तक वो छोटा सा फ्लैट किराए पर नहीं लगा है। इस तरह बीस हज़ार रुपए ड्राइवर की सैलरी के बचे, किराए वाले मिलने बंद हो गए।
मतलब फिर न फायदा था, न नुकसान हुआ।
अब सुनिए वो कहानी जिसे किसी ने मुझसे साझा किया है।
एक आदमी ने भगवान से पूछा कि ज़िंदगी में उसके हिस्से में कितना धन लिखा है? भगवान ने कहा कि तुम रोज़ एक रूपए कमा सकते हो। आदमी खुश हो गया। वो रोज़ एक रूपए कमाने लगा। उसी में जीने लगा। फिर जिस दिन उसकी शादी हुई अचानक उसे एक रूपए की जगह ग्यारह रुपए का काम मिल गया। आदमी ने फिर भगवान से पूछा कि प्रभु आपने तो एक ही रुपए कमाने की बात कही थी, यहां तो ग्यारह रूपए मिल गए। भगवान ने कहा कि इसका मतलब तुम्हारी शादी हो गई है। वो दस रूपए तुम्हारी पत्नी के भाग्य के हैं। जब  इस कहानी को व्हाट्सऐप पर पढ़ रहे थे, तो चंद्रवती की सैलरी उनकी आंखों के आगे घूमने लगी। मतलब माली जो पैसे मुझसे ले रहा है, वो चंद्रवती के हिस्से की कमाई थी।
उस आदमी की शादी के साल भर बीत गए। उसका एक बेटा हो गया। जिस दिन बेटा हुआ, उस दिन आदमी को किसी काम के बदले 41 रूपए मिले। आदमी खुशी में झूमता हुआ फिर भगवान के मिलने पहुंच गया। प्रभु अब आप क्या कहेंगे? मेरी कमाई तो ग्यारह से बढ़ कर 41 रूपए हो गई।
भगवान ने मुस्कुराते हुए कहा, “बेटा, वो तीस रूपए तुम्हारे बेटे के भाग्य के हैं।”
आशु जिस महीने गया, उसी महीने मेरा एक छोटा फ्लैट, जो किराए पऱ था, खाली हो गया। पूरे बीस हज़ार रुपए जो  बचे थे, वो उधर से कम हो गए। जानते हैं क्यों?
क्योंकि वो किराया मेरे पास ड्राइवर के हिस्से का आ रहा था।
हम सोचते हैं कि कमाने वाले हम हैं। पर ये सच नहीं है। हमें पता नहीं होता कि हम किसके-किसके भाग्य से कमाई कर रहे हैं। इसलिए जिस पर जितना पैसा खर्च हो रहा है, आप उसके लिए शोक मत कीजिए। यही समझिए कि माध्यम भले आप हैं, पर भाग्य उसका है, जिस पर आपका पैसा खर्च हो रहा है।
मैंने इस सच को कई बार महसूस किया है। आप भी करते ही होंगे।
संसार में जो भी हो रहा है, उसे करने वाला कोई और है। इस छोटे से सत्य को जो समझ गया, वो खुशहाल है। जो नहीं समझ पाता वो रात-दिन खुद की किस्मत को कोसता रहता है।

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