शनिवार, 20 मई 2023

उर्मिला 24

 

उर्मिला 24

चारों भाई पुनः एक दूसरे से लिपट गए थे। देर तक बिलखते रहने के बाद राम शांत हुए और अनुजों को स्वयं से लिपटाये रख कर ही कहा, "तुम सब अनाथ कहाँ हुए भरत! तुम सब के लिए तो तुम्हारा बड़ा भाई राम है ही, अनाथ केवल मैं हुआ हूँ। दुखी मत होवो... नियति के आगे हम सब विवश हैं।"
     भरत ने बताया कि माताएं भी आई हैं, और जनकपुर से महाराज जनक का परिवार भी आया है। राम भाइयों को लेकर भीड़ के मध्य में घुसे और माता कैकई को देखते ही उनके चरणों मे अपना शीश रख दिया।
     राम समस्त कुल से मिले। माताओं से, मंत्रियों से, नगर जन से... ससुराल से आये राजा जनक और माता सुनयना से! सबसे मिल लेने के बाद मुड़े दूर खड़े निषादराज की ओर, और उन्हें कसकर गले लगा लिया। आँखों से अश्रु पोंछते निषाद ने कहा, "हमें तो लगा था कि हमारी ओर आपकी दृष्टि ही न फिरेगी प्रभु!"
     "तुम्हे तो सबसे पहले देखा था मित्र! जानता था कि भरत को राम तक पहुँचाने का काज तुम्ही ने किया होगा। घर से निकले राम ने अपनी डोर अयोध्या की सीमा पर खड़े निषादराज गुह के हाथों में ही तो सौंपी थी। पर मैं जानता था कि तुम्हारे पास सबके बाद आऊं तब भी तुम बुरा नहीं मानोगे मित्र! मित्रता इसी भरोसे का ही तो नाम है सखा!"
      "मैं तो बस आप सब का स्नेह देख कर तृप्त हो रहा था प्रभु! आज समझ में आया कि जिसके पास लक्ष्मण और भरत जैसे भइया हों, वही राम हो सकता है। आप सब धन्य हैं देवता..." निषादराज नतमस्तक थे।
       "और मैं धन्य हूँ कि मेरे पास तुम्हारे जैसा मित्र है। आओ मित्र, आगन्तुकों के लिए जल आदि की व्यवस्था करें। आज तो इस दरिद्र कुटीर में पूरी अयोध्या आ गयी है। अपने लोगों से कहो कि लक्ष्मण के साथियों का सहयोग करें। सबके लिए फल-जल का उद्योग करें।" राम ने याचना के स्वरों में कहा। मित्र धन्य हो गया, वह उछाह में दौड़ता हुआ अपने साथियों को ललकारने लगा।
     घण्टे भर बाद उस गहन वन में अयोध्या की सभा लगी। यह राजसभा नहीं थी, परिवार सभा थी। राजकुल के अतिरिक्त भी जो व्यक्ति आये थे, वे भी उस समय परिवारजन का भाव लिए हुए थे। राम सबके थे, राम पर सबका अधिकार था। इक्ष्वाकु वंश की अनन्त पीढ़ियों की तपस्या के फलस्वरूप अवतरित हुए भगवान विष्णु के सर्वश्रेष्ठ मानवीय स्वरूप "राम" की सबसे बड़ी विशेषता यही थी कि हर व्यक्ति उनपर अपना अधिकार समझता था। वे सबके थे, वे सबमें थे।
     यह संसार का एकमात्र विवाद था जिसमें दोनों पक्ष अपना अधिकार त्यागने के लिए लड़ रहे थे। भरत अडिग थे कि वे राम को वापस ले कर ही जायेंगे। राम अडिग थे कि वे पिता के वचन को भंग नहीं होने देंगे। जब राम बोलते तो प्रजा को लगता कि उन्ही की बात सही है, जब भरत बोलते तो लगता कि वही धर्म है। इस विवाद को देखने सुनने वाला हर व्यक्ति मुग्ध हो रहा था। हर व्यक्ति तृप्त हो रहा था, धन्य हो रहा था।
     अंत में राम ने कहा, "तुम्हारा ज्येष्ठ हूँ भरत! क्या बड़े भाई की याचना स्वीकार न करोगे? पिता की प्रतिष्ठा के लिए बनवास को निकले राम को उसकी यात्रा पूरी कर लेने दो अनुज! यह अब माता कैकई की नहीं, मेरी स्वयं की इच्छा है। मैं वचन देता हूँ कि चौदह वर्ष पूरे होते ही अयोध्या आ जाऊंगा।"
     भरत रुक गए। वे राम के मार्ग की बाधा नहीं बन सकते थे। हार कर कहा, "जो आज्ञा देव! पर इन चौदह वर्षों तक अयोध्या की गद्दी पर आपकी चरणपादुका विराजेगी। संसार देखेगा कि राम की पादुकाओं का शासन भी अन्य राजाओं के शासन से अधिक लोकहितकारी है। अयोध्या को रामराज्य के लिए अभी और प्रतीक्षा करनी है तो वही सही, पर आपकी पादुकाओं के शासन में भी प्रजा प्रसन्न रहेगी, यह वचन है मेरा।"
      राम क्या कहते! भरत को गले लगा लिया। बड़े भाई से लिपटे अयोध्या के संत ने कहा, "एक बात और स्मरण रहे भइया! चौदह वर्ष के बाद यदि आपके वापस लौटने में एक दिन की भी देर हुई, तो भरत आत्मदाह कर लेगा। स्मरण रहे, आपका भरत आत्मदाह कर लेगा..."
     राम बिलख पड़े। रोते हुए बोले, "ऐसा मत कह रे! प्रलय आ जाय तब भी तेरा ज्येष्ठ तेरे पास समय पर पहुँचेगा भरत!"
      भरत संतुष्ट हुए। समस्त जन ने मन ही मन कहा, "राम तो राम ही हैं, पर भरत सा होना भी असंभव है।"
क्रमशः
(पौराणिक पात्रों व कथानक लेखनी के धनी श्री सर्वेश तिवारी श्रीमुख द्वारा लिखित ये कथा इतनी प्यारी व आकर्षण भरी लगी, कि शेयर करने के लोभ को रोक न पाया )
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सोमवार, 15 मई 2023

चिन्तन

 

चिन्तन की धारा

  अपने हिन्दू धर्म की मूल प्रकृति ये है कि वो अलग-अलग मत, वाद, संप्रदाय और पंथों को एक साथ एकात्मता के हिन्दू धागे में सहेज कर रखता है। किसी को उसकी मान्यता के लिए कभी बहिष्कृत नहीं करता, किसी से ये नहीं कहता कि तुम यही मानो या तुम ये नहीं मानो और न ही किसी को ये कहता है कि तुम जो मान रहे हो वो सही नहीं है।

हमारे यहाँ जब आप अतीत में जायेंगे तो कम से कम सोलह दर्शन प्रचलित रहें जिसमें वैदिक और अवैदिक दर्शन दोनों थे

मध्यकाल में अलग-अलग भक्ति-धाराएं जन्मी जिनमें कोई सगुण का उपासक था, कोई निर्गुण का, कोई राम और कृष्ण को अवतार मानते हुए उनकी बाल-लीलाओं पर न्योछावर होता था तो कोई कहता था कि ‘वो जिह्वा जल जाये जो ये कहती है कि ईश्वर अवतार लेता है।’ इसके बाद आर्य समाज जन्मा जो कहता था कि ईश्वर को मूर्ति और चित्र में तलाशना मूर्खता है तो लगभग उसी दौर में महान मूर्तिपूजक रामकृष्ण परमहंस की शिक्षाओं का भी प्रचार-प्रसार हो रहा था। हिन्दू समाज ने इनमें से किसी में भी विभेद नहीं किया।

यह हमारा राष्ट्रीय भाव था जो नीचे आते -आते इस तरह हो गया कि एक हिन्दू परिवार में भी एक व्यक्ति आर्यसमाजी हो सकता है, दूसरा सनातनी मूर्तिपूजक हो सकता है, तीसरा सिख हो सकता है तो हो सकता है कि चौथा नास्तिक हो। ये भी हो सकता है कि घर में जो मूर्तिपूजक हैं उनमें एक शक्ति का उपासक है तो दूसरा शैव या वैष्णव है। इसीलिए गदर पार्टी के क्रांतिकारी लाला हरदयाल कहते थे- “यदि एक हिन्दू सनातन धर्म छोड़कर आर्य समाजी बन जाए या देव समाज छोड़कर राधास्वामी पंथ में सम्मिलित हो जाए या सिख संप्रदाय में चला जाए तो राष्ट्रीय-राज-मर्मज्ञ की दृष्टि से कोई हानि नहीं।"

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मैं हिन्दू हूँ तो वेदों को मानूँगा, पुराणों को मानूँगा पर कोई मुझसे ये नहीं कह सकता कि तुम त्रिपिटकों को या गुरुग्रंथ साहिब जी को छोड़ दो या उनको न मानो। इसी तरह जब हमारे यहाँ नए पंथ जन्में तो उनके प्रवर्तकों में से किसी ने भी ये नहीं कहा कि आगम, त्रिपिटक या आदिग्रंथ को स्वीकार करते हो तो रामायण और महाभारत को उठाकर फेंक दो। बंगाल में रामकृष्ण परमहंस को ठाकुर कहते हुए उनकी प्रतिमा का पूजन शुरू हुआ पर उनमें से किसी ने भी काली माँ की पूजा करनी बंद नहीं की। किसी सनातनी परिवार की बिटिया किसी बौद्ध, सिख या जैन के घर में गई तो किसी ने भी ये नहीं कहा कि उसका मतांतरण हुआ है। इसी तरह अगर कोई सिख लड़की या जैन लड़की हिन्दू परिवार में आती है तो कोई नहीं कहता कि उसने धर्म बदल लिया है। मैं हिन्दू हूँ और मंदिर में जाता हूँ पर अगर मुझे गुम्फा, गुरुद्वारे या जैन मंदिरों में भी जाना पड़ा तो भी कभी ये नहीं लगता कि ये पूजा और उपासना स्थल मेरे नहीं हैं।

मैं लगभग प्रतिदिन गुरुबाणी सुनता हूं तो उसे सुनते हुए कोई भी मेरे घर में नहीं कहता कि ये बाणी उसकी अपनी नहीं है और तुमको ये नहीं सुननी चाहिए।

इसका अर्थ ये है कि भारत भूमि के अंदर जन्मे विभिन्न मत-पंथ और संप्रदायों की मान्यताएं आपस में कितनी भी भिन्न क्यों न हो, उनके अंदर कुछ न कुछ तो सांझा अवश्य है जो सभी हिन्दू धर्म के सभी पंथों की धमनियों में समान रूप से प्रवाहित है। हमको ये पहचानना है कि ये योजक तत्व क्या है जो हिन्दू धर्म के अंदर के हरेक मत-मतान्तर में समान है और साँझा है।

सभी को एकात्मता के हिन्दू धागे में पिरोकर रखने वाला ये योजक तत्व है हम सबका ये विश्वास जो कहता है कि “प्रत्येक व्यक्ति अपने ढ़ंग से ईश्वर के किसी भी रूप की उपासना कर सकता है अथवा अगर ईश्वर को नहीं मानना चाहे तो उसकी मर्जी।” हम यानि हिन्दू धर्म के अंदर के तमाम मत-पंथ तो इतने उदार हैं कि हमें किसी की भी महत्ता और अस्तित्व को स्वीकार करने में कभी कोई समस्या ही नहीं होती। हम तो ये मानते हैं कि हरेक पंथ का जन्म किसी न किसी विशेष परिस्थिति और आवश्यकता के अनुरूप हुआ है और इसलिए वो अवांछित नहीं है। अगर किसी पंथ में कुछ अलग दिखता भी है तो उसका कारण केवल इतना है कि उस पंथ पर उन परिस्थितियों की छाप है जो उसके बनने के समय थी।

इसी सोच के चलते हिन्दू धर्म के अंदर का कोई भी मत-पंथ कट्टर नहीं हुआ। (अगर कोई हुआ भी तो उसे समग्र समाज ने कभी स्वीकार नहीं किया)। उन्होंने ये जरूर कहा होगा कि उनका रास्ता अच्छा है पर ये कभी नहीं कहा कि वो और केवल उसका रास्ता ही सही और श्रेष्ठ है और ईश्वर की अनुभूति और साक्षात्कार केवल उनके रास्ते चलकर ही हो सकता है।

लाला हरदयाल ने कहा था- “हिन्दू धर्म में बहुत से पंथ और संप्रदाय हैं और उनके अलग-अलग प्रकार हैं। कोई अद्वैत को मानता है, कोई द्वैत को ही स्तुत्य समझता है। कोई आत्मा को सर्वव्यापी मानता है तो कोई इसका विरोधी है। परंतु हमारे राष्ट्र में सदियों से पूरी धार्मिक स्वतंत्रता और सहिष्णुता रही है। इसी कारण इतने विभिन्न धार्मिक विचार प्रचलित हैं। मानव मस्तिष्क को किसी सिद्धांत के पिंजरे में कानून की सहायता से बंद नहीं किया जा सकता। जिन राष्ट्रों ने धार्मिक सहिष्णुता का उच्च सिद्धांत नहीं सीखा है, वे जरा-जरा से मतभेद के कारण सदाचारी और नेक आदमियों को जीवित जला देते हैं या पत्थरों से मार डालते हैं परन्तु हमारी हिन्दू सभ्यता ऐसे पापों से मुक्त रही है।”

हिंदू भारत की एकसूत्रता, एकबद्धता, एकात्मता और आपसी स्नेह के मूल में यही योजक साँझा तत्व है; जिसने अलग-अलग मत-पंथों यहाँ तक कि नास्तिक विचार वाले को भी सदियों से आपस में हिन्दू धर्म के अंदर जोड़ रखा है।

गर्व करिए इस पर  ।।
(अभिजीत सिंह जी की  पुस्तक  - इनसाइड_द_हिंदू_मॉल का एक अंश)

रविवार, 14 मई 2023

पांव के निशान

 

कहानी

    कुछ दिन पहले एक परिचित के घर गया था। जिस वक्त घर में मैं बैठा था, उनकी मेड घर की सफाई कर रही थी। मैं ड्राइंग रूम में बैठा था, मेरे परिचित फोन पर किसी से बात कर रहे थे। उनकी पत्नी चाय बना रही थीं। मेरी नज़र सामने वाले कमरे तक गई, जहां मेड  फर्श पर पोछा लगा रही थी।

अचानक मेरे कानों में आवाज़ आई।

“बुढ़िया अभी ज़मीन पर पोछा लगा है, नीचे पांव मत उतारना। मैं बार-बार यही नहीं करती रहूंगी।”

मैंने अपने परिचित से पूछा, “मां कमरे में हैं क्या?

“हां।”

“जब तक चाय बन रही है, मैं मां से मिल लेता हूं।”

“हां, हां। लेकिन रुकिए, अभी-अभी शायद पोछा लगा है, सूख जाए फिर जाइएगा।”

"क्यों? गीला है तो मेड दुबारा लगाएगी। नहीं लगाएगी तो थोड़े निशान रह जाएंगे फर्श पर। क्या फर्क पड़ेगा?"

परिचित थोड़ा हैरान हुए । भैया ऐसा क्यों कह रहे हैं?

तब तक मैं कमरे में चला गया था। गीले पर्श पर पांव के खूब निशान उकेरता हुआ।

मैं मां के पास गया। मैंने उनके पांव छुए और फिर उनसे कहा कि चलिए आप भी ड्राइंग रूम में, वहां साथ बैठ कर चाय पीते हैं। चाय बन रही है। भाभी रसोई में चाय बना रही हैं।

मैंने इतना ही कहा था। मां एकदम घबरा गईं।

“अरे नहीं , अभी फर्श पर पांव नहीं रखना है। फर्श गीला है न, मेरे पांव के निशान पड़ जाएंगे।”

“पांव के निशान पड़ जाएंगे? वाह! फिर तो मैं उनकी तस्वीर उतार कर बड़ा करवा कर फ्रेम में लगाऊंगा। आप चलिए तो सही।”

पर मां बिस्तर से नीचे नहीं उतर रही थीं। उन्होंने कहा कि तुम चाय पी लो बेटा।

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तब तक मेरे परिचित भी मां के कमरे तक आ गए थे।

उन्होंने मुझसे कहा कि मां सुबह चाय पी चुकी है। आप आइए भैया ।

"नहीं। मां के साथ मैं यहीं कमरे में चाय लूंगा।"

चमकते हुए टाइल्स पर मेरे जूते के निशान बयां कर रहे थे कि मैंने जानबूझ कर कुछ निशान छोड़े हैं। वो समझ नहीं पा रहे थे कि आखिर मैंने ऐसा किया ही क्यों?

उन्होंने मुझसे तो कुछ नहीं कहा, लेकिन मेड को उन्होंने आवाज़ दी। "बबिता, जरा इधर आना। इधर भैया के पांव के निशान पड़ गए हैं, उन्हें साफ कर देना।"

बबीता ने गीला पोछा फर्श पर लगाया। जैसे ही फर्श की दुबारा सफाई हुई मैं फिर खड़ा होकर उस पर चल पड़ा। दुबारा निशान पड़ गए।

अब बबिता हैरान थी। मेरे परिचित भी। तब तक उनकी पत्नी भी कमरे में आ चुकी थीं।

उन्होंने कहा, " भैया, आइए चाय रखी है।"

मैंने परिचित की पत्नी से कहा कि ‘बुढ़िया’ के लिए चाय यहीं दे दीजिए।

मेरे परिचित ने मेरी ओर देखा।

मैंने कहा कि हैरान मत होइए।

वो चुप थे।

मैंने कहा कि मुझे ऐसा लगता है कि आप लोग मां को प्यार से बुढ़िया बुलाते हैं।

मेड वहीं खड़ी थी। सन्न। परिचित की पत्नी वहीं खड़ी थी, सन्न।

परिचित ने पूछा, "क्या हुआ भैया ?"

हुआ कुछ नहीं। मैंने खुद सुना है कि आपकी बबिता आपकी मां को बुढ़िया कह कर बुला रही थी। उसने मां को बिस्तर से उतरने से धमकाया भी था। यकीनन काम वाली ने मां को बुढ़िया पहली बार नहीं कहा होगा। बल्कि वो कह भी नहीं सकती उन्हें बुढ़िया। उसने सुना होगा। बेटे के मुंह से। बहू के मुंह से। बिना सुने वो नहीं कह सकती थी।

जाहिर है आप लोग प्यार से मां को इसी नाम से बुलाते होगे, तभी तो उनसे कहा।

पल भर के लिए धरती हिलने लगी थी। गीले फर्श पर हज़ारों निशान उभर आए थे।

मेरे परिचित के छोटे-छोटे पांव के निशान वहां उभरे हुए हैं। बच्चा भाग रहा है। मां खेल रही है बच्चे के साथ-साथ। एक निशान, दो निशान, निशान ही निशान। मां खुश रही है। बेटे के पांव देख कर कह रही है, देखो तो इसके पांव के निशान। बेटा इधर से उधर दौड़ रहा था। दौड़ता जा रहा था, पूरे घर में।

बुढ़िया रो रही थी। बहू की आंखें झुकी हुई थीं। बबिता चुप थी।

“भैया, गलती हो गई। अब नहीं होगा ऐसा। भैया बहुत बड़ी भूल थी मेरी।”

मेरे परिचित अपनी आंखें पोंछ रहे थे।

मैं चल पड़ा । सिर्फ इतना कह कर कि आखें ही पोंछनी चाहिए। उस फर्श को तो चूम लेना चाहिए जहां मां के पांव के निशान पड़े हों।
साभार

शनिवार, 13 मई 2023

उर्मिला 23

 

उर्मिला 23

भरत ने जब राम को देखा तो उन्हें लगा, जैसे सबकुछ पा लिया हो। वे दौड़ते हुए आगे बढ़े और भइया भइया चिल्लाते हुए बड़े भाई के चरणों में गिर गए।
     संसार में भाई से अधिक प्यारा कोई नाता नहीं होता। इस एक नाते में जाने कितने नाते समाए होते हैं। साथ खेलने का नाता, साथ पढ़ने लिखने का नाता, एक ही थाली में खाने का नाता, एक ही बिछावन पर सोने का नाता...
      बचपन के झगड़ो में भले एक दूसरे से रूठे गुस्साते हों, पर एक के रोने पर दूसरा भाई झटपट पिता की तरह मनाने और चुप कराने लग जाता है। एक नाता बार बार आंसू पोछने का भी होता है। एक दूसरे के कंधे पर चढ़ कर खेलने का नाता, तो एक दूसरे के कंधे पर सर रख कर रोने का नाता...
      किसी विशेष कारण से एक दूसरे के प्रति मन में मैल बैठ भी गया हो, पर भाई को उदास देख कर दूसरे के हृदय का बांध टूट जाता है। भरत के चेहरे पर पसरी इसी उदासी ने क्षण भर में ही लक्ष्मण जैसे कठोर योद्धा को पिघला दिया था और उनके हाथ से लकड़ी गिर पड़ी थी। अब वही उदास मुख लेकर भरत राम के सामने थे।
      राम! करुणा के सागर राम! तीन छोटे भाइयों का बड़ा भाई होने का भाव जिसे बचपन से ही अत्यंत संवेदनशील बना गया था, वे कोमल हृदय के स्वामी राम! पत्थर बनी अनजान स्त्री की पीड़ा से द्रवित को कर उसे मुक्ति दिलाने वाले राम जब अनुज भरत का अश्रुओं से भरा मुख देखे तो बिलख पड़े। चरणों में पड़े भाई को उठा कर हृदय से लगाया और चीख कर रो पड़े...
     जो जगत के पालनहार थे, स्वयं लीलाधर थे, सृष्टि की हर लीला के सर्जक थे, वे अपने राज्य की आम प्रजा के सामने बच्चों की तरह बिलख कर रो रहे थे। रोते रोते रुकते, भरत से कुछ समाचार पूछने के लिए उनके मुख की ओर देखते, पर उनका मुख देख कर पुनः फफक कर रो पड़ते।
     कुछ समय तक दूर खड़े लक्ष्मण और शत्रुघ्न दोनों बड़े भाइयों को लिपट कर रोते देखते रहे, फिर अनायास ही आगे बढ़ कर वे दोनों भी लिपट गए...
      चार भाइयों को यूँ प्रेम से लिपट कर रोते देख कौन न रो पड़ता? उस गहन वन में एकत्र हुए अयोध्या के नगर जन की आंखे बहने लगीं। कौसल्या के साथ खड़ी कैकई का मन एकाएक हल्का हो गया, वह लपक कर कैकई से लिपट गयीं। कौसल्या कुछ न बोलीं, चुपचाप कैकई में माथे पर स्नेह से भरा हाथ फेरती रहीं।
      जिस कुल के भाइयों में स्नेह हो, उनके समस्त पितर यूँ ही तृप्त हो जाते हैं। स्वर्ग में बैठे इक्ष्वाकु वंश के समस्त पितर आनन्दित हो अपने बच्चों पर आशीष की वर्षा करने लगे थे। उसी क्षण सिसकते राम ने पूछा- कैसा है रे? इतना उदास क्यों है भरत?
      भरत ने सिसकते हुए ही उत्तर दिया- आपने हमें त्याग दिया भइया! अब जीवन में खुश होने का कोई कारण बचा है क्या?
      "छी!" राम ने डपट कर कहा, "कैसी बात करते हो भरत? भाइयों को त्यागना पड़े तो राम उसी के साथ संसार को त्याग देगा। मैं तो बस कुछ दिनों के लिए तुम सब से दूर आया हूँ अनुज! शायद नियति परीक्षा ले रही है कि राम अपने भाइयों से अलग हो कर भी जी रहा है या नहीं! वह तो लखन है मेरे साथ, नहीं तो इस परीक्षा में हम हार ही जाते।"
      भरत फिर लिपट गए। वे कुछ बोल ही नहीं पा रहे थे। राम ने उन्हें गले लगाए हुए ही कहा, "अयोध्या में सबकुछ ठीक तो है भरत? सारी प्रजा को साथ लाने का क्या प्रयोजन है भाई?"
      "अयोध्या में कुछ भी ठीक नहीं है भइया! पिताश्री...." भरत फफक पड़े। राम ने घबड़ा कर पूछा- क्या हुआ पिताश्री को? भरत? बोल भाई, क्या हुआ पिताश्री को?"
     भरत ने लिपटे लिपटे ही कहा, "आपके वियोग में पिताश्री ने प्राण त्याग दिया भइया। हम सब अनाथ हो गए..."
      राम पुनः चीख पड़े। चारों भाई पुनः एक दूसरे से लिपट गए थे। देर तक बिलखते रहने के बाद राम शांत हुए और अनुजों को स्वयं से लिपटाये रख कर ही कहा, "तुम सब अनाथ कहाँ हुए भरत! तुम सब के लिए तो तुम्हारा बड़ा भाई राम है ही, अनाथ केवल मैं हुआ हूँ। दुखी मत होवो... नियति के आगे हम सब विवश हैं।"
     भरत ने बताया कि माताएं भी आई हैं, और जनकपुर से महाराज जनक का परिवार भी आया है। राम भाइयों को लेकर भीड़ के मध्य में घुसे और माता कैकई को देखते ही उनके चरणों मे अपना शीश रख दिया।
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क्रमशः
(पौराणिक पात्रों व कथानक लेखनी के धनी श्री सर्वेश तिवारी श्रीमुख द्वारा लिखित ये कथा इतनी प्यारी व आकर्षण भरी लगी, कि शेयर करने के लोभ को रोक न पाया )

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