सोमवार, 4 अप्रैल 2022

समय की क़ीमत

 

कस्बे मे एक छोटी सी स्टैशनेरी की दुकान थी - दुकान के मालिक का नाम प्रेमू था। मेरे बचपन का सपना था एक दिन बहुत पैसे  कमाऊँगा और प्रेमू की दुकान से मन भर कर शॉपिंग करूंगा। हम सभी बच्चों ने अपनी विश लिस्ट भी बना रखी थी कि अंडा वाली बाल, चिड़िया, ढेर सारी पापीन्स, टंकी वाला निब पेन यह सब खरीद लेंगे।

जाहिर सी बात है जब बड़े हुवे, इस लायक हुवे कि यह सब खरीद सकें तो इनकी जरूरत नहीं रह गई।

जब छोटा घर था तो रहने वाले इतने लोग होते थे कि एक एक कमरे मे दस बारह लोग हों। जब घर बड़ा हुआ रहने वाले लोग उसी अनुपात मे कम होते गए।

जब खाने की इच्छाएं और सामर्थ्य होता है, तब पैसे नहीं होते हैं। जब पैसे आते हैं तब डाइबीटीज जैसी ढेरों बीमारियाँ या जाती हैं और अब खा  नहीं सकते हैं।

जब घूमने का वक्त था, तब समय नहीं था नौकरी और जिंदगी के जंजाल मे। जब वक्त हुआ तो शरीर जवाब दे चुका था।

जब चार हजार तनख्वाह होती है, तो लगता है अभी क्या दान दक्षिणा दें, चालीस हजार तनख्वाह हो जाए आधी तनख्वाह धर्म कर्म पर खर्च करूंगा। तनख्वाह चार लाख हो जाती है, तीन लाख ईएमआई मे चले जाते हैं, महीने के अंत तक उधारी हो जाती है।

जब रिश्ते निभाने की सामर्थ्य, इच्छा और शक्ति होती है तब रिश्ते नहीं होते हैं। बुढ़ापे तक आते आते सैंकड़ों रिश्ते बन चुके होते हैं पर अब वह अच्छे नहीं लगते, खुद से प्यार हो जाता है।

ईश्वर ने आक्सीजन मुफ़्त दी है। आजीवन उसका मुफ़्त उपभोग करते हैं। अंतिम समय पता लगता है यह तो अनमोल थी। कितनी भी कीमत दे लो अंत मे इसी की कमी से प्राण चले जाते हैं।

माँ का प्रेम, प्रेयसी / पत्नी का प्यार, सूर्य की किरणें, चंद्रमा की चाँदनी सब मुफ़्त है। तब इसकी कद्र नहीं होती। जब इसकी कद्र करना आता है तब तक यह हाथ से निकल चुके होते हैं।

जिंदगी का सच यही है। जब चीजें उपलब्ध होती हैं, तो उनकी उतनी वैल्यू नहीं होती है। जब वैल्यू पता लगती है तो चीजें गायब हो चुकी होती हैं।  जब जहां जिस क्षण पर हैं, उसे ही परफेक्ट मानते हुवे जिंदगी का हर क्षण जीते हुवे चलें। कल की प्रतीक्षा न करें।

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रविवार, 3 अप्रैल 2022

समय

 

आज भोर में एक प्रश्न दृष्टिगोचर हुआ- यदि आपको जीने के लिए एक ऐतिहासिक युग चुनना हो, तो आप कौन सा युग चुनेंगे और क्यों?

प्रश्न पढ़कर मेरा मन किया कि मैं भी इसका उत्तर दूँ...

आज से कुछ पैंतीस वर्ष पूर्व की बात है। रात का समय था, हम लोग भोजन कर चुके थे। 'हम लोग' मने मम्मी, पापा, भाई और मैं। भोजन के उपरांत भाई टहलने की कहकर घर से बाहर चला गया। मैं मम्मी पापा के संग बैठी बातें कर रही थी। तभी भाई वापस लौट आया, वह हमारे लिए कसाटा आइसक्रीम लेकर आया था। हम चारों ने बैठकर बातें करते हुए सुकून से आइसक्रीम खाई। उस समय ऐसी कोई 'प्रसन्नता का अतिरेक' जैसी भावना मन में नहीं आयी, परन्तु मन में सहजता व सुकून की भावना अवश्य थी।

जानते हैं, उस दिन के पश्चात ईश्वर ने बड़े से बड़े रेस्टोरेंट में खाने का अवसर प्रदान किया, परन्तु उस दिन वाली कसाटा जैसा स्वाद फिर कभी नहीं मिल पाया...
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मुझे आज एक प्रश्न का उत्तर देना है, फिर क्यों मैं इस 'कसाटा आइसक्रीम' का किस्सा ले बैठी?!

चलिये, अब उपरोक्त प्रश्न का उत्तर देने का प्रयास करती हूं, शायद कसाटा आइसक्रीम का अपने प्रिय युग से सम्बंध स्पष्ट कर पाऊं...

ऐतिहासिक युग का तो पता नहीं, परन्तु मैं आज से करीब पैंतीस वर्ष पीछे जाना चाहूंगी। उस समय हमारे पास बहुत अधिक मात्रा में संसाधन नहीं होते थे, सिर्फ़ जरूरतभर की वस्तुएं हुआ करती थीं। फिर भी मन में एक सुकून अवश्य स्थायी रूप से वास करता था।

आज के समय में कोई हमारे मैसेज या फ़ोन कॉल का रिप्लाई दस सेकेंड में न करे तो मन बैचेन होने लगता है, रिश्ते टूटते से प्रतीत होते हैं। कुछ वर्ष पहले किसी भी मित्र या रिश्तेदार को पत्र लिखकर, उसके प्रत्युत्तर की प्रतीक्षा महीनों किया करते थे, फिर भी मन में रिश्तों के होने की निश्चिंतता बनी रहती थी।

घर में एक बाथरूम होने के पश्चात भी घर का कोई सदस्य काम पर जाने में लेट नहीं होता था तब। हर सदस्य स्नान करके ही घर से बाहर कदम रखता था आज हर रूम के साथ अटैच्ड बाथरूम होने के पश्चात भी हर कोई लेट होकर दौड़ता नज़र आता है।

उस समय रसोईघर में रस बरसता था, घर का सादा खाना भी अमृत लगता था, और अगर कभी कोई घर का बड़ा खाने के बाद आम या कसाटा आइसक्रीम ले आता तो बैठे बिठाए पार्टी हो जाया करती थी। आज फाइव स्टार के भोजन में भी वो बात नहीं। आजकल पार्टियों में ढेरों प्रकार के व्यंजन होने पर भी वह कसाटा वाली पार्टी जैसा स्वाद नहीं।

तब अच्छे पैसे वाले लोग भी पब्लिक ट्रांसपोर्ट इस्तेमाल किया करते थे। डीटीसी की बस में कब हँसते बोलते रास्ता कट जाता था, अहसास ही नहीं होता था। बस में बैठे बैठे ही एक से एक लेटेस्ट न्यूज़ सुनने को मिल जाती थीं सो अलग। आज पैसे वालों की बात छोड़िए, मध्यम वर्ग भी रीस में आकर पब्लिक ट्रांसपोर्ट इस्तेमाल करना नहीं चाहता। घर में जितने सदस्य हैं, उतनी ही गाड़ियां हैं।

उस समय शादी ब्याह में रेखा वशिष्ठ  { स्वयं} जैसे कुछ लोग स्कूल की सफ़ेद स्कर्ट पहनकर खुशी खुशी चले जाया करते थे। यही सोचकर मन खुश हो जाता था कि मेरे मम्मी पापा मुझे अंग्रेज़ी स्कूल में पढ़ा रहे हैं। हर महीने केंद्रीय विद्यालय की साढ़े बारह रुपये फीस भर रहे हैं। आज का हिसाब बिल्कुल उल्टा है। जो जितने महंगे अंग्रेज़ी माध्यम के स्कूल में पढ़ रहा है, वह उतना ही असंतुष्ट है। उन्हें रोज नए नए खिलौने, महंगे वस्त्र, लेटेस्ट इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स चाहियें।

उस समय और अबके समय की तुलना में गिनवाने को बहुत कुछ है। क्या क्या गिनवाऊं व क्या क्या छोड़ दूँ...
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बीता हुआ समय कभी लौटकर वापस नहीं आता। हमें वो पहले वाली सहजता फिर से शायद न मिले। परन्तु, इसका यह अर्थ नहीं कि हम प्रयास ही न करें। जीवन को सहज बनाये रखने के लिए हमसे जो बन पड़े हमें करते रहना चाहिए।

स्वयं सहज बने रहने के लिए व बच्चों को सहजता सिखाने के लिए घर में कुछ न कुछ प्रयास हम लोग करते रहते हैं। उनमें से कुछ आप भी जानिए, कदाचित आपको भी कुछ लाभ पहुँचे-

★हमारे घर में एक अनकहा नियम है। हम दोनों बच्चों के साथ दिन में एक या दो बार वॉक करने जरूर जाते हैं। अगर हम में से कोई एक फ्री है तो एक ही चला जाता है। कभी कभी ऐसा भी होता है कि मुझे दिन में तीन चार बार कभी बेटी के साथ तो कभी बेटे के साथ वॉक करने जाना पड़ता है। वॉक के समय बच्चों को प्राथमिकता दी जाती है। वे अपने मन में चल रहे विभिन्न द्वंदों को प्रकट करते हैं, और हम धैर्यपूर्वक सुनते हैं। फिर हम बात बातों में अपना मत भी प्रकट कर देते हैं। बच्चे उस समय चाहे हमारे बताए उपाय से संतुष्ट न हों, परन्तु बाद में वे वही कार्य करते दृष्टिगोचर होते हैं। याद रखिये, आप बच्चों के नाम कितना कुछ छोड़कर जाते हैं, वह उन्हें याद नहीं रहेगा। परन्तु उन्हें सदैव स्मरण रहेगा कि आपने उनके साथ कितना समय व्यतीत किया, क्या क्या बात की व उन्हें क्या क्या परामर्श दिए।

★आज भी हमारे घर में बच्चों को पब्लिक ट्रांसपोर्ट इस्तेमाल करने को प्रेरित किया जाता है। अपना कोई वाहन नहीं है उनके पास। सिर्फ पतिदेव के पास एक गाड़ी है, जिसमें बैठकर हम सब कभी कभार इकट्ठे घूमने चले जाया करते हैं।

★मेरे बच्चे बहुत कुछ आज के बच्चों जैसे हैं, खूब शॉपिंग करते हैं व खूब बाहर से भी खाते हैं। पर जब वे अपने माता पिता को देखते हैं कि वे स्कूल दफ्तर घर से टिफिन लेकर जाते हैं, वहाँ एक भी पैसा खाने पर खर्च नहीं करते, वे यह भी देखते हैं कि उनके माता पिता शादी ब्याह व पार्टियों में वही पुराने कपड़े रिपीट करने में जरा भी गुरेज नहीं करते; तब वे भी कहीं न कहीं सीखते हैं कम में सुकून से रहना। वे सीखते हैं घर के भोजन का स्वाद, वे सीखते हैं सहजता व बेफिक्री। उस 'कसाटा आइसक्रीम' की तरह वे भी दुनिया की बेस्ट पार्टी का आनन्द लेते हैं अपनी माँ के हाथ से बने गाजर के हलवे में।

यहाँ भी कहने को बहुत कुछ है। समझ नहीं पाती क्या कहूँ व क्या जाने दूँ!

खैर, इतना अवश्य कहूँगी कि समय लौटकर आये या न आये परन्तु इस विश्व को रहने लायक स्थान बनाने के लिए, मनुष्यों की बेचैनी को सहजता में परिवर्तित करने के लिए हमें निरंतर प्रयासरत रहना चाहिए... ✍️रेखा वशिष्ठ मल्होत्रा

शनिवार, 2 अप्रैल 2022

मुफ्त की सामग्री

 

राजा साहब राजा थे तो विचित्र निर्णय लेने से उन्हें रोकता कौन? इसलिए जब उन्होंने निर्णय लिया कि उनकी राजधानी के बाजारों में जो भी बिकने आये, वो सूर्यास्त तक न बिके तो वो स्वयं खरीदेंगे, या कहिये राज्य क्रय कर लेगा, तो किसी ने उन्हें नहीं टोका। वैसे भी राज्य की व्यवस्था अच्छी चल रही थी। आय अधिक था, खर्चे कम थे। तो शुरू में तो इस निर्णय से कोई दिक्कत नहीं हुई, लेकिन थोड़े ही दिन में देवताओं का ध्यान इस व्यवस्था पर चला गया। उन्होंने सोचा ऐसा कैसे? कोई राजा इतने पुण्य करे तो लोग कष्टों से बच जायेंगे और हमपर तो कोई ध्यान ही नहीं देगा। कष्ट हों, तब तो लोग सहायता के लिए देवताओं को पुकारते!

चुनांचे देवताओं ने राजा की जांच करने की ठानी। धर्म ने स्वयं एक ब्राह्मण का वेश धारण किया, एक संदूक में कबाड़ भरा और राजा की राजधानी में उसे बेचने पहुँच गए। हाट में बैठकर उन्होंने कबाड़ की कीमत हजार अशर्फियाँ बतानी शुरू की। कोई हजार अशर्फियों में कबाड़ क्यों खरीदता? जैसा कि होना था, सूर्यास्त हुआ और वो बिना अपना सौदा बेचे बैठे थे। राज्य के कर्मचारी जांच के लिए आये तो देखा कि उनका सौदा बिका नहीं। मूल्य पूछा गया, और जब देखा गया कि हजार अशर्फियों में वो क्या बेचने बैठे हैं, तो सबने उनकी मूर्खता का मजाक उड़ाया। नियम था ये सभी को पता था, इसलिए जब कबाड़ बेचने बैठा ब्राह्मण नहीं माना तो उच्चाधिकारियों को इस विषय में बताया गया।

थोड़ी देर और मामले की जांच हुई क्योंकि पहले कभी ऐसा हुआ नहीं था। अंततः राजा तक बात पहुंची। राजा बोले नियम तो मैंने ही बनाया है, अब अपनी बात से कैसे फिरूं? खरीद लो जो कुछ भी है। रात में राजा भोजन इत्यादि करके एक बाहर के ओसारे सी जगह में बैठे थे जब कुछ नौकर-चाकर कबाड़ भरा संदूक उनके पास रख गए। देर रात तक राजा इसी सोच में बैठे थे कि कहीं राज्य के और लोग भी देखा-देखी ऐसा ही करने लगे तो? गुप्तचरों को उन्होंने पहले ही ब्राह्मण का पीछा करने भी भेज दिया था। आधी रात बीत चुकी थी कि महल के अन्दर की ओर से पायलों-चूड़ियों के खनकने की सी आवाज आई।

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राजा चौंके, इतनी रात में भला कौन स्त्री महल से बाहर जा रही है? उन्होंने स्त्री को जाते देख आवाज लगाई तो वो ठहरी। राजा ने पास जाकर देखा तो स्वर्ण-आभूषणों से लदी कोई सुन्दर स्त्री थी जिसे उन्होंने कभी देखा नहीं था। स्त्री ने स्वयं अपना परिचय देते हुए कहा कि वो राज्य-लक्ष्मी है। संदूक में भरे कबाड़ के साथ महल में दरिद्रता का प्रवेश हो गया है, इसलिए वो जा रही है। राजा ने हाथ जोड़े और उन्हें विदा किया। वो वापस आकर बैठे ही थे कि श्वेत वस्त्रों में एक युवक निकलता दिखा। राजा ने उसे भी टोका तो उसने कहा कि वो दान है, जहाँ लक्ष्मी ही नहीं वहाँ दान कहाँ होगा? राजा ने उसकी बात से सहमती जताई और उसे भी जाने दिया।

थोड़ी देर और बीतने के बाद एक और सुदर्शन युवक निकला। राजा कुछ पूछते, इससे पहले ही उसने स्वयं बताया। वो धर्म थे। उनका कहना था लक्ष्मी और दान के बिना धर्म का पालन नहीं हो सकता, इसलिए उन्हें भी विदा दी जाए। राजा ने सोचा, बात तो सही है और धर्म को भी जाने दिया। उसके पीछे पीछे एक और युगल निकले जिन्होंने बताया कि वो यश और कीर्ति हैं। लक्ष्मी, दान और धर्म के बिना यश-कीर्ति कहाँ हो? इसलिए वो भी जा रहे थे। ब्रह्म मुहूर्त होने में अभी कुछ ही देर बाकी था कि चेहरा ढकने का प्रयास करते एक और युवक निकलने लगा। राजा ने उसे भी नहीं पहचाना और परिचय पूछा। युवक ने बताया कि वो सत्य है। जहाँ लक्ष्मी, दान और धर्म नहीं, वहाँ उसकी जरुरत भी नहीं होगी, लेकिन राजा ने बड़ी निष्ठा से उसका पालन किया था, इसलिए वो मुंह छुपाता हुआ जा रहा था।

इस बार राजा ने कड़क कर कहा, आप जा नहीं सकते। सत्य के पालन की खातिर ही मैंने हजार अशर्फियों में इस कबाड़ रुपी दरिद्रता को लाना स्वीकार किया। आपके पालन की लिए ही लक्ष्मी जाने पर चुप रहा, दान-धर्म को जाने दिया, आप कैसे जा सकते हैं? सत्य सोच में पड़ गया। राजा की बात सही थी। सत्य ने आपनी भूल स्वीकार की और महल में वापस लौट गया। राजा वापस बैठे ही थे कि भागे-भागे यश-कीर्ति वापस आ गए। राजा ने उन्हें देखकर हाथ जोड़े तो यश ने कहा, महाराज, सिर्फ सत्य पर टिके रहे तो यश और कीर्ति तो उससे मिलेगी ही। सत्य के बिना यश-कीर्ति मिल भी जाएँ तो ठहरते नहीं। सत्य आपके पास ही है, इसलिए हम जा नहीं पाए। वो अन्दर गए ही थे कि पीछे-पीछे धर्म लौटे।

धर्म ने कहा धर्म का पालन अवश्य लक्ष्मी और दान से होता है, लेकिन धर्म का मूल स्वरुप तो सत्य ही है। इसलिए सत्य के पास वो भी लौट आये थे। थोड़ी देर में दान लौटे। उन्होंने कहा कि जहाँ सत्य न हो वहाँ दान की बातें चाहे जितनी हों, दान तो होगा नहीं। इसलिए वो भी सत्य के पास लौट आये हैं। थोड़ी देर और हुई, तो ब्रह्म मुहूर्त होते-होते लक्ष्मी लौट आयीं। उन्होंने कहा मैं तो दान-धर्म, यश-कीर्ति और सत्य का प्रतिफल हूँ। जैसे मेरे द्वारा इनका पालन होता है, वैसे ही इनके माध्यम से मैं आती हूँ। इसलिए राजन मैं भी तुम्हें छोड़कर नहीं जा सकती!

सिर्फ एक सत्य का पालन करने पर क्या होता है, ये हम लोगों ने हाल ही में एक फिल्म के बनने में देखा है। फिल्म केवल सत्य घटनाओं पर आधारित थी। कोई बड़े सितारे फिल्म में नायक-नायिका नहीं थे, फिल्म में गाने-आइटम सोंग्स नहीं थे। कोई नामी गिरामी डायरेक्टर नहीं था, प्रचार में बहुत पैसे खर्च नहीं हुई क्योंकि बड़ा बजट भी नहीं था। सिर्फ सत्य का आधार बनाये रखने का नतीजा ये हुआ कि यश-कीर्ति आई। धर्म की साथ है ये कहा जाने लगा। सचमुच कुछ दे या नहीं, दान की बातें हो रही हैं। लक्ष्मी आई या नहीं, इसके बारे में तो खैर, कुछ कहने की भी जरुरत नहीं रह गयी है।

सत्य को भगवद्गीता के आधार पर देखें तो ये सत्रहवें अध्याय के तेईसवें श्लोक के हिसाब से देखें तो तीन नामों से परमात्मा का निर्देश दिया गया है –

तत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृतः।
ब्राह्मणास्तेन वेदाश्च यज्ञाश्च विहिताः पुरा।।17.23

अर्थात, ऊँ, तत् और सत् -- इन तीनों नामों से जिस परमात्मा का निर्देश किया गया है, उसी परमात्मा ने सृष्टि के आदि में वेदों, ब्राह्मणों और यज्ञों की रचना की है।

अगर दूसरे अध्याय के सोलहवें श्लोक में देखें तो वहाँ भी सत्य की चर्चा आती है –

नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः।
उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभिः।।2.16

यहाँ कहा गया है कि असत्य की तो सत्ता ही नहीं है, यानि वो होता ही नहीं, और सत्य कभी विद्यमान न हो, ऐसा भी नहीं होता। इसके अलावा भी अलग-अलग स्थानों पर भगवद्गीता में माया और सत्य के अंतर पर बातें हुई हैं। अगर सत्रहवें अध्याय के तेईसवें श्लोक से पहले देखेंगे तो वहाँ दान के विषय में भी चर्चा मिल जाएगी।

बाकी किसी पुरानी सी, नैतिकता की कहानी के जरिये आप ये भी सीख सकते हैं कि शासन-सत्ता को मुफ्तखोरी को बढ़ावा क्यों नही देना चाहिए। आंनद कुमार कहते हैं कि जो भगवद्गीता के श्लोको के सम्बन्ध में बताया वो नर्सरी स्तर का है, और पीएचडी के लिए आपको खुद ही पढ़ना होगा !!
।।।।
नितांत ताज़ा उदाहरण हम अपने पड़ोसी श्रीलंका का देख सकते हैं, तत्कालीन सहानुभुति बटोरने वहां के शाशन ने फ्री की सुविधाएं शुरू की, अब वहां सरदर्द की गोली लेने भी लम्बी लाइन में लगना पड़ रहा, रसोई गैस - अन्य जीवनोपयोगी सामग्री का अभाव हो गया , गृहयुद्ध से हालात । आज ही आपातकाल लागू किया गया है । फ्री की स्कीम सिर्फ तबाही ही लाती है ...

शुक्रवार, 1 अप्रैल 2022

 

आज के दिन/ सुनी सुनाई...
एक बेटी ने जब सुनाई अपनी यादें ...

उन दिनों जब फोन का मतलब बस लैंडलाइन फोन ही होता था। लोग एक बार घर से बाहर गए तो कह कर जाते थे, कहीं एसटीडी मिली तो कॉल करेंगे। तब न तो कोई हड़बड़ाहट थी और न ही कोई फिक्र! कम बात होने के बाद भी एक तसल्ली थी जीवन मे। किसी का कॉल आता, तो कोशिश रहती कि 60 सेकेंड से पहले फोन रख दें, क्योंकि दूसरे मिनट लगते ही दो कॉल के पैसे लग जाएंगे।

खैर, मुझे यह सब क्यों याद आया?

आज पहली अप्रैल है। और बचपन से लेकर अब तक पापा को अप्रेल फूल बनाना मेरा प्रिय शगल हुआ करता है।

जब घर में लैंडलाइन था, तो उसमें 162 डायल करने पर अपने ही फोन पर रिंग बजती थी। मैं हर साल 162 डायल कर के फोन रखती। फोन की घण्टी बजती और मैं उठाकर कहती...पापा आपका कॉल है!

पापा आते हेलो हेलो करते और मैं ताली बजा बजाकर हँसती...अप्रेल फूल बनाया:-) सालों से पापा को सेम तरीके से अप्रेल फूल बनाती। और वो बन भी जाते। और मुस्कराते।

अब जब दूर रहती हूँ तब भी हर साल फोन कर के कुछ न कुछ कहकर अप्रेल फूल बनाती ही हूँ। आज भी यही हुआ। पापा बन भी गए...और मैं ज़ोरों से चिल्लाई ; अप्रेल फूल  अप्रेल फूल और पापा कहने लगे अरे..आज अप्रेल फूल डे है क्या?? तूने तो सुबह सुबह फूल बना दिया!

मैं एकदम खुश थी तब पीछे से माँ की आवाज़ आई;

"अरे आपको 5 मिनट पहले ही तो बताया था कि आज 1 अप्रेल है। वो जरूर फोन करेगी, उसकी बातों में मत आना और आज तो अप्रेल फूल मत ही बनना"

माँ की बात सुनकर मुझे पता चला कि, सालों से मैं नहीं...बल्कि पापा ही जानबूझकर अप्रेल फूल बनकर, मुझे ही फूल बनाते हैं। और जब मैं हँसती हूँ तो वो मन ही मन मुस्कराते हैं।

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