बुधवार, 6 सितंबर 2023

जय कन्हैया लाल की

 

नंद के आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की !!

जन्माष्टमी ..या रामनवमी

हम आप ( केवल पचास साठ वर्ष पूर्व तक) अपना जन्मदिन नहीं मनाते थे अब मनाने लग गये हैं और उससे सनातन हिन्दू धर्म को कोई समस्या नहीं है बस अपने जन्मदिन को भी हम ईश्वर का श्रवण करें और उसका ही मनन  ।

क्या कारण था हमारे आपके मां पिताजी के समय तक जन्माष्टमी रामनवमी ( तथा अन्य देवताओं) की तिथियाँ ही धूम धाम से मनायी जाती थी ?

इसका कारण था कि हमारे मां  पिताजी के समय तक सभी सनातन हिन्दू धर्मी को यह पता था कि हम मनुष्यों का जन्म कर्म वासना के आधार पर होता है ॥ अतः कोई बड़ी घटना नहीं क्योंकि जब तक कर्म वासना बनी रहेगी जन्म मरण का खेल चलता रहेगा ।

वहीं श्री हरि नारायण स्व इच्छा से अवतरित होते हैं । जन्माष्टमी और रामनवमी श्री हरि के कर्म वासना के कारण नहीं बल्कि उनकी स्व इच्छा से शरीर धारण के पीछे होती है अतः हमारे लिये परम उत्साह का समय ।

जन्माष्टमी का आध्यात्मिक पक्ष :

द्वापर अर्थात् दो नाव पर पैर रखना और संकंट मोल लेना ।
द्वापर अर्थात् संशय ।
द्वापर अर्थात् जब सनातन धर्म पर संशय । ईश्वर पर संशय । आत्मा ब्रह्म की एकता पर संशय । संत महात्माओं पर संशय ।
द्वापरांत अर्थात् संशय के अन्त का समय ।
और वही जन्माष्टमी आती है जब द्वापर का अंत होने वाला ही होता है ।

वसुदेव अर्थात् शुद्ध अंतःकरण । देवकी अर्थात् पवित्र बुद्धि । अंतःकरण के पेट में नहीं बल्कि पवित्र बुद्धि जो कि अंतरंग है के गर्भ से श्री भगवान का अवतरण होता है ।

पूतना अर्थात् अविद्या । कंस अर्थात् हिंसक । इत्यादि इत्यादि ।

पौराणिक पक्ष:

पृथिवी के उपर पेड़ पहाड़ का बोझ नहीं होता । पेड़ पहाड़ इत्यादि पृथ्वी के अवयव हैं । पृथ्वी के उपर घमंड का बोझ पड़ता है । पृथ्वी घमंड का बोझ नहीं झेल पाती ।

जब घमंड का बोझ पड़ता है तब रजोगुण का चैतन्य तमोगुण का चैतन्य रूद्र , सर्व दैवीय संपदा के राजा इंद्र , श्री हरि नारायण जो कि सत् गुण के सागर क्षीरसागर में रहते हैं के पास जाकर पृथ्वी के उपर विचरण कर रहे घमंडिया गठबंधन कंस जरासंध दुर्योधन इत्यादि के नाश के लिये प्रार्थना करते हैं । श्री हरि नारायण कहते हैं कि ठीक है कुछ उपाय करता हूँ ।

भगवान के द्वारापाल जय विजय भी घमंडी हो गये थे और एक दिन लक्ष्मी जी को ही अंदर जाने से रोकने लगे । बहरहाल श्री भगवान ने कहा कि अभी मैं कुछ नहीं करूँगा क्योंकि यह पक्षपात लगेगा परन्तु इनकी ( जय विजय की ) आदत ख़राब हो चुकी है और यह सब घमंडिया हो चुके हैं अतः संत महात्माओं का भी अपमान करेंगे और मैं संत महात्माओं का अपमान सहन नहीं करूँगा ।

वही हुआ घमंडिया जय विजय एक दिन सनत कुमारों को भी रोक दिये और सनत कुमारों ने शाप दे दिया कि जाकर राक्षस हो जाओ । और उनके प्रार्थना करने पर वरदान दे दिया कि ठीक है श्री हरि नारायण ही कि तुम्हारी मुक्ति करेंगे अतः जन्माष्टमी ।

सनातन हिन्दू धर्म के नाश का दुःस्वप्न देखने वाले घमंडिया गठबंधन के समूल नाश के लिये हम इस जन्माष्टमी को संकल्प लें और हम सब अर्जुन बनकर अपनी बुद्धि को नारायणाकार करके शत्रुओं पर जैसे भी हो सके , जितना भी हो सके प्रहार करें । - राज शेखर जी कहिन

*नन्द के आनंद भयो जय कन्हैया लाल की 🙏🌷🙏*
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सोमवार, 4 सितंबर 2023

चिन्तन के पल

 

चिन्तन की धारा

     एक पुरानी कहानी है कि एक धोबी के पास एक गधा था जिसे वो कपड़े लादकर लाने ले जाने के लिए इस्तेमाल करता था। एक बार धोबी कपड़े धोने के लिए नदी किनारे आया। गधे की पीठ से कपड़े उतारते वक़्त उसे याद आया कि जिस रस्सी से वो गधे को पेड़ से बांध देता था, वो आज उस रस्सी को लाना भूल गया है। धोबी बड़ी चिंता में पड़ गया। वो इस चिंता में घुला ही जा रहा था कि क्या अब फिर से उसे इतनी दूर जाकर रस्सी लानी होगी क्योंकि नहीं तो मेरे कपड़े धोने जाते ही ये गधा तो कहीं रपक (निकल) लेगा।
     वो ये सब सोच ही रहा था कि उधर से एक आदमी गुज़रा जो काफ़ी पढ़ा-लिखा और समझदार दिखता था। धोबी ने अपनी दास्तां उस आदमी से कह डाली और उससे किसी सलाह की आशा करने लगा। उस आदमी ने धोबी की पूरी बात इत्मीनान से सुनी और उससे कहा कि रस्सी लाने की कोई ज़रूरत नहीं है बस जब रस्सी होने पर तुम जिस प्रकार अपने गधे को बांधते आए हो ठीक उसी प्रकार का अभिनय करो। काल्पनिक रस्सी से उसे बांध दो। धोबी ने ठीक वैसा ही किया और बिल्कुल वैसे ही अपने गधे को थपथपाया जैसे वो रस्सी मजबूती से बांधने के बाद थपथपाया करता था।
     धोबी कपड़े धोता जाता और बीच-बीच में दूर बंधे अपने गधे को देखकर आश्चर्यचकित होता जाता कि ये काल्पनिक रस्सी तो ख़ूब काम कर रही है। कई बार अनायास उसके मुंह से ठहाके भी निकल जाते।
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     सारे कपड़े धोने के बाद उसने वो कपड़े गधे पर लाद दिए और फिर उसने गधे को ठहाके लगाते हुए कुछ यूं हांका कि 'तू तो सच में गधा है जो रस्सी थी ही नहीं उससे बंधा पड़ा रहा' लेकिन उसके ठहाके तुरंत रुक गए जब गधा आगे बढ़ने को तैयार ही नहीं हुआ। धोबी के बहुत हांकने के बाद भी गधा एक पैर भी आगे बढ़ाने के लिए तैयार नहीं था। धोबी घबरा गया, घबराकर उसने इधर-उधर देखा और पाया कि पेड़ की छांव में बैठकर वही समझदार और काफ़ी पढ़ा-लिखा आदमी मुस्कुरा रहा है। वो आदमी भी ये सब तमाशा देखने के लिये बैठ गया था हालांकि वो पढ़ा-लिखा था लेकिन बेरोज़गार था तो अक्सर वो कहीं भी तमाशे देखने रुक जाया करता था। उस आदमी ने कहा कि तुम शायद भूल गए हो कि तुम्हारा गधा बंधा है, उसे ठीक उसी प्रकार खोलो जिस प्रकार रोज़ खोलते आए हो। धोबी एक बार फिर से आश्चर्यचकित हुआ और उसने ठीक उसी प्रकार अपने गधे को खोला जिस प्रकार वो रोज़ उसकी रस्सी खोला करता था और फिर से उसे थपथपाया करता था। ऐसा करते ही गधा अपने रास्ते चल दिया।
    यहां गधे की जगह हम अपने आप को रखकर देख सकते हैं। ऐसा भी हो सकता है कि हम तमाम तरह के काल्पनिक पाशों (बंधनों) में बंधे हो और हम ये बात जानते ही न हो।

रविवार, 27 अगस्त 2023

कहानी

 

   कहानी
     आज बाबूजी की तेरहवीं है। नाते-रिश्तेदार इकट्ठे हो रहे हैं पर उनकी बातचीत, हँसी मज़ाक देख-सुनकर उसका मन दुखी हो रहा है.."कोई किसी के दुख में भी कैसे हँसी मज़ाक कर सकता है? पर किससे कहे,किसे मना करे" इसीलिये वह बाबूजी की तस्वीर के सामने जाकर आँख बंद करके चुपचाप बैठ गई।

अभी बीस दिन पहले ही की तो बात है.. वह रक्षाबंधन पर मायके आई थी। तब बाबूजी कितने कमजोर लग रहे थे। सबके बीच होने के बावजूद उसे लगा कि जैसे वह कुछ कहना चाहते हों फिर मौका मिलते ही फुसफुसा कर धीरे से बोले भी थे .."बिट्टू... रमा तुम्हारी भाभी हमको भूखा मार देगी। आधा पेट ही खाना देती है, दोबारा माँगने पर कहती है कि परेशान ना करो ,जितना देते हैं उतना ही खा लिया करो। ज़्यादा खाओगे तो नुकसान करेगा फिर परेशान हम लोगों को करोगे " कहते-कहते उनका गला भर आया।
" पर कभी आपने बताया क्यों नही बाबूजी?"  सुनकर सन्न रह गई वह और तुरंत अपने साथ लाई मिठाई से चार पीस बर्फी के निकाल कर बाबूजी को दे दिये। वह लगभग झपट पड़े..और जल्दी-जल्दी खाने लगे.. ऐसा लग रहा था मानों बरसों से उन्होंने कुछ खाया ही ना हो।

"अरे,अरे,,,,इतना मत खिलाओ बिट्टू। तुम तो चली जाओगी पर अभी पेट ख़राब हो जायेगा तो हमको ही भुगतना पड़ेगा" तभी भाभी ने आकर ताना दिया।
तब मन मसोस कर वह रह गई थी और चलते-चलते दबे शब्दों में उसने भाभी से कुछ दिनों के लिए बाबूजी को अपने साथ ले जाने की बात कही तो भाभी तो कुछ न बोलीं पर भइया भड़क गये.."सारी उम्र किया है..तो अब भी कर लेंगें। वैसे तूने ये बात क्यों कही? कुछ कहा क्या बाबूजी ने ?"

"नही भइया, नही.." वह हड़बड़ा गई और बाकी के शब्द उसके मन में ही रह गए। बड़े भाई से जवाब-सवाल कर भी कैसे सकती थी ? बचपन से ही बेटियों को भाइयों से दबकर रहने का संस्कार जो कूट कूट कर भरा जाता है..पर जाते-जाते उसने एक बार पलटकर देखा तो उसके जन्मदाता तरसी निगाहों से उसे ही देख रहे थे। तब क्या पता था कि ये उनकी आख़िरी मुलाकात है।

इसके पाँच दिन बाद ही खब़र मिली कि "बाबूजी की हालत ठीक नहीं है,वो अस्पताल में हैं ..आकर मिल जाओ" सुनकर छटपटा उठी वह और दूसरे दिन ही उनके पास पहुँच गई।

बाबूजी अर्धमूर्छित से थे,उसको पहचान भी नही पाये! वह उनके कान में फुसफुसाई "बाबूजी, देखिये मैं आपकी बिट्टू"
कई बार आवाज़ देने पर बामुश्किल उनकी आँखें हिली.. "बि..ट्टू.. भू..ख.." उनकी अस्फुट सी आवाज़ सुनकर वह यूँ खुश हो गई मानो बरसों के प्यासे को जी भर के पानी पीने को मिल गया हो ..."बताइये,क्या खाना है बाबूजी..?" पूछते हुए उसकी आँखे भर आईं।

"आ,,लू  टमाटर की स,,ब्ज़ी रो,,टी .." लड़खड़ाती आवाज़ में उनके मुँह से बोल निकले। जल्दी से उसने इंतज़ाम भी किया..पर देर हो चुकी थी! बाबूजी बगैर खाये पिये,भूखे ही इस सँसार से चले गये।

"बिट्टू,,बिट्टू ,,,,चलो,खाना खा लो" अचानक भइया की आवाज़ सुनकर वह चौंक पड़ी।
"खाना?" वह धीरे से बोली "भूख नही है भइया"
बिट्टू थोड़ा सा खा लो भइया ने फिर कहा वह कुछ न बोली !

चुपचाप उठकर घरबालों वाले बिछे आसन पर बैठ गई। थाली में तरह-तरह के पकवान परोसे जा रहे थे। उसकी आँखों से आँसू बह निकले! कानों में बाबूजी के आख़िरी शब्द गूँज रहे थे..."आलू टमाटर की सब्जी,रोटी"

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गौरवशाली इतिहास

हमारा इतिहास - गौरवशाली इतिहास
   आज अगर कोई कहे कि घर में पूजा है, तो ये माना जा सकता है कि #सत्यनारायण_कथा होने वाली है। ऐसा हमेशा से नहीं था। दो सौ साल पहले के दौर में घरों में होने वाली पूजा में सत्यनारायण कथा सुनाया जाना उतना आम नहीं था। हरि विनायक ने कभी 1890 के आस पास #स्कन्द_पुराण में मौजूद इस संस्कृत कहानी का जिस रूप में अनुवाद किया, हमलोग लगभग वही सुनते हैं। हरि विनायक की आर्थिक स्थिति बहुत मजबूत नहीं थी। वो दरबारों और दूसरी जगहों पर कीर्तन गाकर आजीविका चलाते थे।

कुछ तो आर्थिक कारणों से और कुछ अपने बेटों को अपना काम सिखाने के लिए उन्होंने अपनी कीर्तन मंडली में अलग से कोई संगीत बजाने वाले नहीं रखे। उन्होंने अपने तीनों बेटों को इसी काम में लगा रखा था। दामोदर, बालकृष्ण और वासुदेव को इसी कारण कोई ख़ास स्कूल की शिक्षा नहीं मिली। हाँ ये कहा जा सकता है कि संस्कृत और मराठी जैसी भाषाएँ इनके लिए परिवार में ही सीख लेना बिलकुल आसान था। ऊपर से लगातार दरबार जैसी जगहों पर आने जाने के कारण अपने समय के बड़े पंडितों के साथ उनका उठना बैठना था। दामोदर हरि अपनी आत्मकथा में भी यही लिखते हैं कि दो चार परीक्षाएं पास करने से बेहतर शिक्षा उन्हें ज्ञानियों के साथ उठने बैठने के कारण मिल गयी थी।

आज अगर पूछा जाए तो हरि विनायक को उनके सत्यनारायण कथा के अनुवाद के लिए तो नहीं ही याद किया जाता। उन्हें उनके बेटों की वजह से याद किया जाता है। सर्टिफिकेट के आधार पर जो तीनों कम पढ़े-लिखे बेटे थे। अपनी पत्नी के साथ हरि विनायक पुणे के पास रहते थे। आज जिसे इंडस्ट्रियल एरिया माना जाता है, वो चिंचवाड़ उस दौर में पूरा ही गाँव हुआ करता था। 1896 के अंत में पुणे में प्लेग फैला और 1897 की फ़रवरी तक इस बीमारी ने भयावह रूप धारण कर लिया। ब्युबोनिक प्लेग से जितनी मौतें होती हैं, पुणे के उस प्लेग में उससे दोगुनी दर से मौतें हो रही थीं। तबतक भारत के अंतिम बड़े स्वतंत्रता संग्राम को चालीस साल हो चुके थे और फिरंगियों ने पूरे भारत पर अपना शिकंजा कस रखा था।

अंग्रेजों को दहेज़ में मिले मुंबई (तब बॉम्बे) के इतने पास प्लेग के भयावह स्वरूप को देखते हुए आईसीएस अधिकारी वाल्टर चार्ल्स रैंड को नियुक्त किया गया। उसे प्लेग के नियंत्रण के तरीके दमनकारी थे। उसके साथ के फौजी अफसर घरों में जबरन घुसकर लोगों में प्लेग के लक्षण ढूँढ़ते और उन्हें अलग कैंप में ले जाते। इस काम के लिए वो घरों में घुसकर औरतों-मर्दों सभी को नंगा करके जांच करते। तीनों भाइयों को साफ़ समझ में आ रहा था कि महिलाओं के साथ होते इस दुर्व्यवहार के लिए वाल्टर रैंड ही जिम्मेदार है। उन्होंने देशवासियों के साथ हो रहे इस दमन के विरोध में वाल्टर रैंड का वध करने की ठान ली।

थोड़े समय बाद (22 जून 1887 को) रानी विक्टोरिया के राज्याभिषेक की डायमंड जुबली मनाई जाने वाली थी। दामोदर, बालकृष्ण और वासुदेव ने इसी दिन वाल्टर रैंड का वध करने की ठानी। हरेक भाई एक तलवार और एक बन्दूक/पिस्तौल से लैस होकर निकले। आज जिसे सेनापति बापत मार्ग कहा जाता है, वो वहीँ वाल्टर रैंड का इन्तजार करने वाले थे मगर ढकी हुई सवारी की वजह से वो जाते वक्त वाल्टर रैंड की सवारी पहचान नहीं पाए। लिहाजा अपने हथियार छुपाकर दामोदर हरि ने लौटते वक्त वाल्टर रैंड का इंतजार किया। जैसे ही वाल्टर रवाना हुआ, दामोदर हरि उसकी सवारी के पीछे दौड़े और चिल्लाकर अपने भाइयों से कहा “गुंडया आला रे!”
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सवारी का पर्दा खींचकर दामोदर हरि ने गोली दाग दी। उसके ठीक पीछे की सवारी में आय्रेस्ट नाम का वाल्टर का ही फौजी एस्कॉर्ट था। बालकृष्ण हरि ने उसके सर में गोली मार दी, उसकी फ़ौरन मौत हो गयी। वाल्टर फ़ौरन नहीं मरा था, उसे ससून हॉस्पिटल ले जाया गया, 3 जुलाई 1897 को उसकी मौत हुई। इस घटना की गवाही द्रविड़ बंधुओं ने दी थी। उनकी पहचान पर दामोदर हरि गिरफ्तार हुए और उन्हें 18 अप्रैल 1898 को फांसी दी गयी। बालकृष्ण हरि भागने में कामयाब तो हुए मगर जनवरी 1899 को किसी साथी की गद्दारी की वजह से पकड़े गए। बालकृष्ण हरि को 12 मई 1899 को फांसी दी गयी।

भाई के खिलाफ गवाही देने वाले द्रविड़ बंधुओं का वासुदेव हरि ने वध कर दिया था। अपने साथियों महादेव विनायक रानाडे और खांडो विष्णु साठे के साथ उन्होंने उसी शाम (9 फ़रवरी 1899) को पुलिस के चीफ कांस्टेबल रामा पांडू को भी मारने की कोशिश की मगर पकड़े गए। वासुदेव हरि को 8 मई 1899 और महादेव रानाडे को 10 मई 1899 को फांसी दी गयी। खांडो विष्णु साठे उस वक्त नाबालिग थे इसलिए उन्हें दस साल कैद-ए-बामुशक्कत सुनाई गयी।

मैंने स्कूल के इतिहास में भारत का स्वतंत्रता संग्राम पढ़ते वक्त दामोदर चापेकर, बालकृष्ण चापेकर और वासुदेव चापेकर की कहानी नहीं पढ़ी थी। जैसे पटना में सात शहीदों की प्रतिमा दिखती है वैसे ही चापेकर बंधुओं की मूर्तियाँ पुणे के चिंचवाड में लगी हैं। उनकी पुरानी किस्म की बंदूकें देखकर जब हमने पूछा कि ये क्या 1857 के सेनानी थे? तब चापेकर बंधुओं का नाम और उनकी कहानी मालूम पड़ी। भारत के स्वतंत्रता संग्राम को अहिंसक साबित करने की जिद में शायद इनका नाम किताबों में शामिल करना उपन्यासकारों को जरूरी नहीं लगा होगा। काफी बाद में (2018) भारत सरकार ने दामोदर हरि चापेकर का डाक टिकट जारी किया है।

बाकी इतिहास खंगालियेगा तो चापेकर के किये अनुवाद से पहले, सत्यनारायण कथा के पूरे भारत में प्रचलित होने का कोई पुराना इतिहास नहीं निकलेगा। चापेकर बंधुओं को किताबों और फिल्मों आदि में भले कम जगह मिली हो, धर्म अपने बलिदानियों को कैसे याद रखता है, ये अगली बार सत्यनारायण की कथा सुनते वक्त जरूर याद कर लीजियेगा। धर्म है, तो राष्ट्र भी है!
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