रविवार, 30 अप्रैल 2023

वृद्धाश्रम

 

कहानी

डोरबेल बजी जा रही थी। रामसिंह भुनभुनाए
'इस बुढ़ापे में यह डोरबेल भी बड़ी तकलीफ देती है।'
दरवाजा खोलते ही डाकिया पोस्टकार्ड और एक लिफाफा पकड़ा गया।

लिफाफे पर बड़े अक्षरों में लिखा था वृद्धाश्रम।
रुंधे गले से आवाज दी-
'सुनती हो बब्बू की अम्मा, देख तेरे लाडले ने क्या हसीन तोहफा भेजा है!'

रसोई से आंचल से हाथ पोछती हुई दौड़ी आई - 'ऐसा क्या भेजा मेरे बच्चे ने जो तुम्हारी आवाज भर्रा रही है। दादी बनने की खबर है क्या?'

'नहीं, अनाथ!'

'क्या बकबक करते हो, लाओ मुझे दो। तुम कभी उससे खुश रहे क्या!'

"वृद्धाश्रम" शब्द पढ़ते ही कटी हुई डाल की तरह पास पड़ी मूविंग चेयर पर गिर पड़ी।

'कैसे तकलीफों को सहकर पाला-पोसा, महंगे से महंगे स्कूल में पढ़ाया। खुद का जीवन इस एक कमरे में बिता दिया।' कहकर रोने लगी
 
दोनों के बीते जीवन के घाव उभर आए और बेटे ने इतना बड़ा लिफाफा भेजकर उन रिसते घावों पर अपने हाथों से जैसे नमक रगड़ दिया हो।

दरवाजे की घंटी फिर बजी। खोलकर देखा तो पड़ोसी थे।
'क्या हुआ भाभी जी? फोन नहीं उठा रहीं हैं। आपके बेटे का फोन था। कह रहा था अंकल जाकर देखिए जरा।

उसे चिंता करने की जरूरत है! चेहरे की झाुर्रियां गहरी हो गई।'
'अरे इतना घबराया था वह, और आप इस तरह। आंखें भी सूजी हुई हैं। क्या हुआ?'

'क्या बोलू श्याम, देखो बेटे ने..' मेज पर पड़ा लिफाफा और पत्र की ओर इशारा कर दिया।'

श्याम पोस्टकार्ड बोलकर पढऩे लगा। लिफाफे में पता और टिकट दोनों भेज रहा हूं। जल्दी आ जाइये। हमने उस घर का सौदा कर दिया है।

सुनकर झर-झर आंसू बहें जा रहें थे। पढ़ते हुए श्याम की भी आंखें नम हो गई। बुदबुदाये 'नालायक तो नहीं था बब्बू!'

रामसिंह के कंधे पर हाथ रख दिलासा देते हुए बोले- 'तेरे दोस्त का घर भी तेरा ही है। हम दोनों अकेले बोर हो जाते हैं। साथ मिल जाएगा हम दोनों को भी।'
कहते-कहते लिफाफा उठाकर खोल लिया।

खोलते ही देखा - रिहाइशी एरिया में खूबसूरत विला का चित्र था, कई तस्वीरों में एक फोटो को देख रुक गए। दरवाजे पर नेमप्लेट थी सिंहसरोजा विला।
हा! हा! जोर से हंस पड़े।

'श्याम तू मेरी बेबसी पर हंस रहा है!'
'हंसते हुए श्याम बोले- 'नहीं यारा, तेरे बेटे के मजाक पर। शुरू से शरारती है वह।'

'मजाक..!'

देख जवानी में भी उसकी शरारत नहीं गई।' कहते हुए दरवाजे वाला चित्र रामसिंह के हाथ में दे दिया।

  नीचे नोट में लिखा था- *'बाबा, आप अपने वृद्धाश्रम में अपने बेटे-बहू को भी आश्रय देंगे न।'*  पढ़कर रामसिंह और सरोजा के आंखें डबडबा गई।   -संकलित

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शनिवार, 29 अप्रैल 2023

उर्मिला 21

 

उर्मिला 21

      भरत के साथ चल रही भीड़ के मध्य में राजकुल की स्त्रियां चल रही थीं। उन्हीं स्त्रियों के मध्य शीश झुकाए चल रही थी वह स्त्री भी, जिसकी आंखों में अश्रु थे और मन में चल रहा था भीषण द्वंद! कभी मन कहता था कि उसे अवश्य जाना चाहिये, क्योंकि भइया राम को वन से अयोध्या लाना कुल और राज्य दोनों के हित में है। वनवासी राम को राजा राम बनाने के लिए निकली इस यात्रा से वह स्वयं को कैसे दूर कर सकती थी? रामराज्य तो उसका भी स्वप्न था! पर कभी मन कहता, उसे नहीं जाना चाहिये! पति को चौदह वर्ष के लिए मुक्त कर दिया है ताकि वे केवल और केवल भइया की सोचें...
     उर्मिला ने स्वयं तय किया था कि इन चौदह वर्षों तक लखन के जीवन में उसका कोई हिस्सा नहीं होगा। फिर इसी बीच लक्ष्मण के समक्ष कैसे जा सकती थी वह? प्रेम तो हृदय में उसी तरह भरा हुआ है, बस प्रतिज्ञा की बांध से उसे रोक रखा है। यदि बांध टूट गया तो? मोह भरी एक दृष्टि भी उनपर पड़ी तो धर्म जाएगा... पर उनके समक्ष जा कर भी उनपर दृष्टि न डाले, ऐसा कैसे हो सकता है? दृष्टि पड़े और उसमें मोह न हो, ऐसा भी तो नहीं हो सकता न...
      "अयोध्या के दुर्भाग्य के चौदह वर्ष सिया-राम के लिए वनवास के वर्ष हैं, पर उर्मिला-लखन के लिए तप के वर्ष हैं। इन दोनों जोड़ों की नियति में अंतर यह है कि सिया-राम अपना वनवास एक साथ निभाएंगे, पर उर्मिला-लखन को अपना तप अलग रह कर ही करना होगा।" उर्मिला नियति की इस योजना के विरुद्ध जाना नहीं चाहती थी, पर... धीरे धीरे वह भी बढ़ी ही जा रही थी।
      उधर वन में अपनी कुटिया में बैठे राम की आंखे अनायास ही बार बार भर आती थीं। वे आश्चर्य में डूब जाते कि ऐसा हो क्यों रहा है। सिया ने टोका तो बोले- "जाने क्यों लग रहा है कि कुछ अशुभ हुआ है सिया! मन बहुत ब्याकुल हो उठा है। कहीं मेरी मातृभूमि पर कोई सङ्कट तो नहीं..."
      "ऐसा न सोचिये भइया! पिताश्री बृद्ध हुए तो क्या हुआ, वे अपने युग में संसार के सर्वश्रेष्ठ योद्धा रहे हैं। उनके होते हुए अयोध्या पर कोई संकट आ ही नहीं सकता! फिर भइया भरत और शत्रुघ्न भी तो वहीं हैं न! आप विह्वल न होइये, सब ठीक होगा।" लखन ने सांत्वना दी।
      राम ने कोई उत्तर नहीं दिया, पर उनकी दशा न बदली। कुछ समय बाद लखन भोजन बनाने के लिए सूखी लकड़ियां लेने निकले। इन दिनों उनकी वनवासी बालकों से मित्रता हो गयी थी। वे उन्हें धनुर्विद्या और भाषा सिखाते थे और बच्चे शिष्य भाव से उनकी सेवा किया करते थे।
      लखन कुटिया से निकले और शीघ्र ही असँख्य बालक उनके साथ हो लिए। लखन से सोचा लकड़ियों के साथ साथ थोड़े फल भी ले लेते हैं, सो वे लोग कुछ दूर निकल आये। आपस में सहज परिहास करती हुई इस टोली को धीरे धीरे कोलाहल सुनाई देने लगा। लगता था जैसे कोई बड़ी सेना चली आ रही हो। वन के पंछी भी व्यग्र हो कर उड़ने-चहचहाने लगे थे, धूल आकाश में उड़ने लगी थी।
      लखन ने मुड़ कर देखा लड़कों की ओर, उनमें से दो शीघ्र दौड़ पड़े। कुछ समय बाद लौट कर आये और भयभीत स्वर में कहा, "कोई बड़ी सेना है गुरुदेव! पर उनके साथ नगरजन भी हैं। स्त्रियां भी हैं। अब तो बहुत निकट आ गए हैं, आप यदि इस ऊँचे बृक्ष पर चढ़ कर देखें तो उन्हें देख सकेंगे।
      लखन तीव्र गति से उस विशाल बृक्ष की ऊपरी डाल तक चढ़ गए। वे उस बड़ी भीड़ का कोई चेहरा तो नहीं पहचान सके, पहचाने तो अयोध्या का ध्वज! वे शीघ्र उतर आए।
     लखन के पास कुछ भी सोचने-समझने का समय नहीं था। अयोध्या की सेना वन में क्यों आयी है, इसका सटीक उत्तर नहीं समझ पा रहे थे वे। पर उन्हें शीघ्र ही निर्णय लेना था। उन्होंने कुछ पल सोचा और फिर अपने बनवासी शिष्यों के साथ उस ओर बढ़ने लगे जिस ओर से अयोध्या की सेना आ रही थी।
       बस कुछ ही पल बाद! एक और सेना सहित समूची अयोध्या और दूसरी ओर अपने बीस शिष्य बालकों के साथ खड़े लक्ष्मण। धनुष को कंधे पर ही रहने दिया और हाथ में पकड़ी सुखी डाल को हवा में उठा कर अयोध्या के उस निर्वासित राजकुमार ने गरज कर कहा, "सावधान राजकुमार! वन में आने का अपना प्रयोजन बताइये, अन्यथा आप जौ बराबर भी आगे न बढ़ सकेंगे।"
क्रमशः
(पौराणिक पात्रों व कथानक लेखनी के धनी श्री सर्वेश तिवारी श्रीमुख द्वारा लिखित ये कथा इतनी प्यारी व आकर्षण भरी लगी, कि शेयर करने के लोभ को रोक न पाया )

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सोमवार, 24 अप्रैल 2023

पंथ

 

वाह क्या जिज्ञासा है,,,

कल इंदौर से तीन जन आए थे धाम पर,,कहने लगे कि मत या पंथ और धर्म में क्या अंतर है और कौन सत्य है??

मैंने उन्हें सिर्फ इतना कहा कि आयुर्वेद में आयु को बढ़ाने वाली अनेकों बातें बताई हैं,, शिष्यों ने महर्षि चरक से पूछा कि आपने घृत का नाम नहीं लिया इनमें??  ऋषि ने कहा कि बाकी चीजें आयु को बढ़ाने वाली हैं लेकिन घृत तो स्वयं ही आयु है--आयुर्वै घृतम--घृत आयु का ही दूसरा नाम है,,
अब कोई अजीर्ण का या फैटी लिवर का या हार्ट का रोगी है,, वह कहने लगे कि झूठ,, बिल्कुल झूठ,, घृत आयु नहीं मृत्यु है,,खाया कि मरे,,

तो बात इतनी ही है बन्धु की घृत आयु है यह है धर्म,, पृथ्वी पर आप किसी को भी यह खिलाओ वह पुष्ट ही होगा,, यह सनातन सत्य है, यह ध्रुव सत्य है,,यह जागतिक सत्य है,,लेकिन जो अजीर्ण या फैटी लिवर या हार्ट रोगी है उसे मार डालेगा यह उसका व्यक्तिगत सत्य है,,तो व्यक्तिगत मान्यताएं जो होती हैं वह मत या पंथ होता है,,जागतिक सत्य जो होता है वह धर्म होता है जो मनुष्य मात्र पर लागू होता है,,

तो उन्होंने पूछा कि व्यक्ति पंथ में जुड़ते ही धर्म का बैरी क्यों हो जाता है?? मैंने उन्हें कहा कि अज्ञानता के कारण,, यही तो पंथ की शक्ति है,,मान लो अजीर्ण या फैटी लिवर के व्यक्ति ने घृत का विरोध किया तो दुनिया में जितने लोग अजीर्ण  फैटी लिवर हैं वे उसके समर्थन में आ जाएंगे,, कहेंगे यह व्यक्ति सत्य कह रहा है हम भी इसकी पुष्टि करते हैं,, बस यही उनकी धूर्तता है, यहीं उसका छल है जो सामान्य व्यक्ति समझ नहीं सकता,,

छल या धूर्तता यह है कि वे घृत पर दोषारोपण कर रहे हैं कि यह तो मार डालेगा,, जबकि स्वयं के बारे में यह नहीं बता रहे हैं कि घृत तो अमृत ही है, यह तो वास्तव में आयु ही है लेकिन हम अजीर्ण के रोगी हैं हम फैटी लिवर हैं हम  अयोग्य हैं इस महाताकतवर चीज को पचाने में,, हममें शक्ति नही रही शुद्धता या सही चीज को पचाने की,,

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बस इतनी सी बात है,, घी को कोसने लगते हैं अपना अजीर्ण या फैटी लिवर नहीं दिखता अपनी अयोग्यता अपनी  अपच नहीं दिखती,, ठीक यही पंथ या मत का फंडा होता है,, वह यह नहीं कहेगा कि धर्म जैसी अमूल्य मणि धारण करने की हममें सामर्थ्य नहीं रही, अब ऊर्ध्वारोहण की हममें शक्ति नहीं रही,, उल्टे कोसने लगेंगे की यह कोई धर्म है यह तो मार डालेगा,, और उनकी हां में हां मिलाने वाले रोगी जुड़ते और बढ़ते जाएंगे,, यही मत या पंथ के विस्तार का सीक्रेट है,, मत या पंथ शुद्धता पर नहीं रोग पर टिके होते हैं ।।
ॐ श्री परमात्मने नमः।             
  - *स्वामी सूर्यदेव*

रविवार, 23 अप्रैल 2023

आखा तीज

 अक्षय तृतीया: परशुराम जी का अवतार दिवस


सबसे प्रचण्ड अवतार है परशुरामजी का..

झूठी है उनके क्रोधी होने और क्षत्रिय क्षय की बातें...


पृथ्वी पर सत्य, धर्म और न्याय की स्थापना के लिये भगवान् नारायण ने अनेक अवतार लिये हैं।  इनमें परशुरामजी का अवतार पहला पूर्ण अवतार है । जो सर्वाधिक व्यापक है । 

संसार का ऐसा कोई कोना, कोई क्षेत्र या कोई देश ऐसा नहीं जहाँ भगवान् परशुरामजी की स्मृति या चिन्ह नहीं मिलते हों । उन्होंने संसार में शाँति और मानवता की स्थापना के लिये पूरी पृथ्वी की सतत यात्राएँ की । यदि यह कहा जाय कि विश्व में आर्यत्व की स्थापना भगवान् परशुरामजी ने की तो यह सच्चाई का महत्वपूर्ण तथ्य होगा । 

भगवान् परशुरामजी का चरित्र वैदिक और पौराणिक इतिहास में सबसे प्रचण्ड और व्यापक है । उन्हे नारायण के दशावतार में छठे क्रम पर माना गया । वे पहले पूर्ण अवतार हैं । उन्हे चिरंजीवी माना गया इसीलिए उनकी उपस्थिति हरेक युग में मिलती है । उनका अवतार सतयुग के समापन और त्रेता युग आरंभ के संधि क्षण में हुआ । वह वैशाख शुक्ल पक्ष की तृतीया थी । चूँकि उनका अवतार अक्षय है,  इसलिये यह तिथि अक्षय तृतीया कहलाई । इस तिथि का प्रत्येक पल शुभ होता है । उनका अवतार एक प्रहर रात्रि के शेष रहते हुआ,  इसलिये यह ब्रह्म मुहूर्त कहलाया । उनकी उपस्थिति सतयुग के समापन से आरंभ होकर कलियुग के अंत तक रहने वाली है । इतना व्यापक और कालजयी चरित्र किसी देवता, ऋषि अथवा अवतार का नहीं मिलता । उन्होंने ही वह शिव धनुष राजा जनक को दिया था जिसे भंग करके रामजी ने माता सीता का वरण् किया ।  परशुराम जी ने ही वह विष्णुधनुष रामजी को दिया था जिससे लंकापति रावण का उद्धार हुआ ।  इसी प्रकार भगवान् श्रीकृष्ण को सुदर्शन चक्र और गीता का ज्ञान भी देने वाले भी परशुरामजी ही हैं। पुराणों यह भी उल्लेख है कि धर्म रक्षा के लिये कलयुग में कल्कि अवतार होगा तब उन्हें शस्त्र और शास्त्र का ज्ञान देने के निमित्त भी भगवान परशुराम जी ही होंगे । 

भगवान् परशुरामजी का अवतार ऋषिकुल में हुआ हैं । भगवान परशुराम जी के पिता महर्षि जमदग्नि हैं और माता रेणुका  सूर्यवंशी प्रतापी सम्राट राजा रेणु की पुत्री हैं । भगवान् परशुरामजी पांच भाई और एक बहन हैं । भगवान् परशुरामजी के सात गुरू हैं । पहली गुरू माता रेणुका हैं, दूसरे गुरु पिता महर्षि जमदग्नि । तीसरे गुरू महर्षि चायमान, चौथे गुरु महर्षि विश्वामित्र, पाँचवे गुरु महर्षि वशिष्ठ,  छठें गुरु भगवान् शिव और सातवें गुरु भगवान् दत्तात्रेय हैं । भगवान् शिव की भक्ति तो पूरा संसार करता है पर उनके एक मात्र शिष्य भगवान् परशुरामजी ही हैं । वे मन की गति से भ्रमण करते हैं । इसे मन व्यापक गति कहते हैं । उन्हे चिर यौवन का वरदान है अर्थात वे कभी वृद्ध नहीं होंगे । संसार को "श्रीविद्या" का ज्ञान भगवान् परशुरामजी ने दिया । शक्ति की उपासना भी भगवान परशुराम जी से आरंभ हुई । भगवान परशुराम जी ने ही शक्ति आराधना का महर्षि सुमेधा को दिया । महर्षि सुमेधा ने ही आगे शक्तिसाधना के ग्रंथ रचे । परशुराम जी के ज्ञान, साधना, ओजस्विता और तेजस्विता के आगे कोई नहीं ठहर  पाया । उनके आगे चारों वेद चलते हैं । पीठ पर अक्षय तीरों से भरा तूणीर रहता है । एक हाथ में शास्त्र हैं तो दूसरे में शस्त्र । वे श्राप देने और दंड देने दोनों में समर्थ हैं । यह क्षमता किसी और अवतार में या ॠषि में नहीं । उन्होंने यदि प्रत्यक्ष युद्ध करके आतताइयों का हनन् किया है तो तप करके शिवजी को प्रसन्न भी किया है । उन्होंने समाज निर्माण केलिये दो बार विश्व की यात्रा की है । ऋषि रूप वेद ऋचाओं का सृजन भी किया है । ऋग्वेद के दसवें मंडल का एकसौ दसवां सूक्त भगवान् परशुरामजी द्वारा ही सृजित है । लेकिन मध्यकाल में जिस भारत के मानविन्दुओं को कलंकित किया गया उसी प्रकार भारत के आदर्श चरित्र गाथा में अनेक कूटरचित कथाएँ जोड़कर विवादास्पद बनाने का कुचक्र चला । आक्रमणकारियों का घोषित नारा था "बाँटो और राज करो" इसके अंतर्गत ही भगवान परशुराम जी की गाथा में कुछ प्रसंग जोड़े , जो पूरी तरह असत्य और भ्रामक हैं ।

 असत्य और भ्रामक आक्षेप -

भगवान् परशुरामजी पर दो आक्षेप लगाये जाते हैं एक तो यह कि उन्होंने क्षत्रियों का क्षय किया दूसरा यह कि वे बहुत क्रोधी थे । ये दोनों आक्षेप असत्य हैं और समाज में भेद पैदा करने के लिये कुछ विदेशी षडयंत्रकारियों द्वारा रचित हैं । ताकि भारतीय समाज को विभाजित कर भारत को दास बना सकें । वे अपने षडयंत्र में सफल भी हुये । लेकिन अब हमें स्वयं अध्ययन करके समस्त भ्रांतियों का निवारण करना चाहिए । इन दोनों प्रश्नों पर शास्त्रों में पर्याप्त प्रमाण है । श्रीमद्भागवत में स्पष्ट है कि "दुष्टं क्षत्रम्" शब्द आया है । अर्थात "दुष्ट राज्य" । पुराण कथाओं में तीन शब्द आतें हैं क्षत्र, क्षत्रप और क्षत्रिय । इन तीनों शब्दों में अंतर होता है । क्षत्र यनि राज्य, क्षत्रप यनि राजा और क्षत्रिय यनि राज्य के लिये समर्पित । यदि शब्द दुष्ट क्षत्रम् है तो उसका अर्थ हुआ ऐसे राज्य जो दुष्टता करते थे । महाभारत के एक प्रसंग में भगवान् शिव ने आदेश दिया कि "तुम मेरे समस्त शत्रुओं का वध करो"। संस्कृत में शब्द चाहे "क्षत्र" आया हो या "क्षत्रप" लेकिन हिन्दी अनुवाद में सीधा क्षत्रिय ही करके भ्रम  फैलाया गया। परशुराम जी के संदर्भ में क्षत्रिय शब्द का पहली बार कालिदास के रघुवंश में हुआ और यहीं से ने क्षत्रिय विनाश के किस्से चल पड़े । इसके बाद जो साहित्य रचा गया उसमें इसके वर्णन में विस्तार होता गया । भला बताइये भगवान् परशुरामजी नारायण के अवतार हैं क्षत्रिय की उत्पत्ति नारायण के बाहुओं से हुई तो क्या नारायण स्वयं अपनी बाहुओं का विनाश करने के लिये अवतार लेंगे? इसके अतिरिक्त उनकी माता देवी रेणुका क्षत्रिय, उनकी दादी देवी सत्यवती क्षत्रिय, भृगु वंश की अनेक ऋषि कन्याएं क्षत्रियों को ब्याहीं तब भला कैसे वे क्षत्रिय विरोधी अभियान छेड़ सकते हैं । इसके अतिरिक्त एक बात और नारायण जब भी अवतार लेते हैं । उनके अवतार के जीवन की प्रत्येक कार्य का कहीं न कहीं निमित्त होता है । यदि किसी अवतार में पत्नि वियोग होना है, वानरों का साथ लेना है, एक ही विवाह करना या एक से अधिक विवाह करना या रणछोड़ का आक्षेप लगना सब निर्धारित होता है । इसीलिए नारायण के अवतार के कार्यों को कर्म नहीं लीला कहा जाता है । नारायण के किसी प्रसंग में किसी शास्र में यह उल्लेख नहीं आया कि कभी वे क्षत्रिय हंता बनेंगे । अतएव यह भ्रामक बात समाज को मन से निकालनी होगी । समाज को बाँटने के यूँ भी कम षडयंत्र नहीं हो रहे । अतएव हमें जागृति के साथ सत्य को समझाना चाहिए ।

उन पर दूसरा आक्षेप लगता है क्रोधी होने का । 

लोग कहते हैं कि भगवान परशुरामजी बहुत क्रोधी हैं । यह आक्षेप भी तथ्य हीन है । क्रोध राक्षसों को आता है, दैत्यों को आता है । क्रोध तमोगुण है । हमारे प्रत्येक शास्त्र में क्रोध से दूर रहने को कहा गया है । क्रोध को अग्नि कहा गया है । जिस प्रकार अग्नि सबसे पहले अपने ही केन्द्र को जलाती है ठीक उसी प्रकार क्रोध भी उसी व्यक्ति को पहले नष्ट करता है जो क्रोध करता है । परशुरामजी नारायण का अवतार हैं । नारायण तो सदैव मुस्कुराते हैं कभी क्रोध नहीं करते । तब नारायण का कोई अवतार क्रोध करेगा ? वह शब्द रोष है । रोष में भरकर उन्होंने दुष्टों का नाश किया । गुस्सा तीन प्रकार का । माता का और गूरू का गुस्सा सतोगुणी होता है जिसे रोष कहते हैं । पिता और राजा का गुस्सा रजोगुणी होता है जिसे कोप कहते हैं । जबकि दुष्टों और दानवों का गुस्सा अहंकार से उत्पन्न होता है यह तमोगुणी होता है इसे क्रोध कहते है । भगवान् परशुरामजी नारायण का अवतार हैं, ऋषि हैं गुरू हैं उनका गुस्सा रोष है । संस्कृत में रोष शब्द ही आया है जिसका हिन्दी अनुवाद क्रोध के रूप में हुआ और भ्रान्तियाँ फैली । जिन्हे समाज को बाँटने के लिये योजना पूर्वक प्रचारित किया गया । 

पूरे विश्व में चिन्ह --

भगवान परशुराम जी से संबंधित प्रसंग पूरे विश्व में मिलते हैं। उनके विभिन्न नामों में एक नाम भृगुराम भी है । यह शब्द अपभ्रंश होगा बगराम बना । अफगानिस्तान में भी बगराम नामक स्थान है यहां विमानतल भी बना है । एक बगराम नगर ईराक में भी है । लैटिन अमेरिका की खुदाई में श्रीयंत्र जैसी आकृति निकली है । भगवान परशुराम जी के कहने पर मय दानव पाताल गया था । संभवतः मय दानव से ही लैटिन अमेरिका की "मायन सभ्यता" विकसित हुई होगी । रोम की खुदाई में पत्थर पर उकेरी गई एक ऐसी आकृति निकली जिसके कंधे पर धनुष बाण है और परशु जैसा शस्त्र भी । यद्यपि इस आकृति के सिर पर टोप तो रोमन ही पर परशु और धनुष बाण धारण करने वाले एक मात्र परशुराम जी हैं। संभव है कि रूस नाम ऋषिका का अपभ्रंश हो । पर इसपर व्यापक शोध की आवश्यकता है । मैक्समूलर की एक पुस्तक है "हम भारत से क्या सीखें" इस पुस्तक के अनुसार संसार का ज्ञान भारत से ईरान पहुँचा और ईरान से पूरे विश्व में।  इस कथन से भी यह धारणा प्रबल होती है कि विश्व में जो परशुराम जी से मिलते जुलते शब्द या चिन्ह मिलते हैं वे सब परशुराम जी से ही संबंधित हो सकते हैं। 

इस प्रकार भगवान परशुराम जी अवतार विश्व व्यापक है, सबसे प्रचण्ड है ।और संसार में अधर्म का नाश करके सत्य की स्थापना करने वाला है । -- रमेश शर्मा

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