सोमवार, 27 मार्च 2023

बैटर ऑप्शन

 

-रचित जी सतीजा ने एक प्रसंग बताया, उन्हें व्यवसायिक कार्य से लगभग हर रोज दिल्ली जाना होता है। वापसी पर मुरथल के एक ढाबे पर रात्रिभोज हेतु रुकते हैं ।
खाने का मेन्यू सेट है।
हाफ दाल
3 रोटी
1 प्लेट सलाद
2 कटोरी सफेद मक्खन
........और आखिर में खीर।

लगभग हर रोज एक व्यक्ति मेरी टेबल पर आता है।
मैं उसे वही मेन्यू बताता हूं।
.......बीते कुछ दिनों से वह मुझसे पूछने की जहमत भी नहीं करता।

मैं बैठता हूं .......सलाद परोस देता है और फिर एक एक कर बाकी सामग्री ले आता है।

कल रात मैं ढाबे पर आ कर बैठा।
चिरपरिचित बंधु जो हर रोज ऑर्डर लेता था वह कहीं दिखाई ना दिया।

मेरी नजरें उसे तालाश रही थी। इतने में एक नौजवान लड़का टेबल पर आया और बोला " भोला भईया नहीं आए हैं सर। उनका तबियत खराब था।"

मुझे नहीं पता था की जिस व्यक्ति को मैं रोज खाने का ऑर्डर देता हूं उसका नाम "भोला" है।

"आपका क्या नाम है ? " मैंने सामने खड़े नवयुवक से पूछा।

"हमारा नाम आकास है।" उसने फट से जवाब दिया।

मुरथल के ढाबों पर अधिकतर कर्मचारी बिहारी हैं।
नवयुवक का आका"श" को आका"स" कहना मुझे खला नहीं।
लड़का टिप टॉप था। सधी हुई कद काठी। तेल से चुपड़े कंघी किए हुए बाल।

सबसे बड़ी बात उसके जूते चमक रहे थे। लग रहा था की पालिश किए गए हैं।

मैंने अपना मैन्यू बताने की शुरुआत की ही थी की उसने मेरी बात काटते हुए कहा......पता है सर। हरा सलाद.... दाल .....मक्खन ....रोटी....खीर।
मैंने उसकी ओर देखा.....मुस्कुराया .....और कहा....." पता है तो ले आईए। भूख के मारे जान निकल रही है।"
वह किचन की ओर चला गया।

कुछ ही समय बाद वापिस आया।
बोला ....." सर। डोंट माइंड। एक बैटर ऑप्शन है।"

मैं एक क्षण ....... अवाक रह गया।

डोंट माइंड .......बैटर ऑप्शन......मेरे समाने ढाबे का एक वेटर खड़ा था या किसी मैनेजमेंट इंस्टिट्यूट से एम बी ए मेनेजर खड़ा था।
शक्ल देख कर तो लग ना रहा था की ऊन्ने अंग्रेजी का ए भी आता होगा।

मैं हतप्रभ था।

" क्या बैटर ऑप्शन है सर।" मैंने व्यंगतामक लहजे में पूछा।

लडके ने मेन्यू कार्ड उठाया। बोला ......." आप वेज थाली लीजिए सर। इसमें दाल है। दो सब्जी है। पुलाव है। सलाद है अउर मीठा मैं खीर भी है .......और सर ......ये थाली आपको आपका मेन्यू के मुकाबले बीस परसेंट सस्ता पड़ेगा।" लड़का एक सांस में कह गया।

पहले ......."डोंट माइंड ......बैटर ऑप्शन ".....यानी अंग्रेजी .....और फिर "20 परसेंट" यानी मैथेमेटिक्स।

अबे कौन है ये लड़का।

ध्यान से देखा तो वाकई बिल में बीस परसेंट का अंतर भी था।

उम्र के 42 बसंत देख चुका हूं।।
खत पढ़ लेता हूं मजमू .....लिफाफा खोले बिना।

"क्या करते हो?" मैंने प्रश्नवाचक निगाहों से उससे पूछा।

"यहीं काम करते हैं।" उसने जवाब दिया।

"इसके अलावा क्या करते हो? " मैंने पूछा।

" यूपीएससी का तैयारी कर रहे हैं सर। दिन में दिल्ली रहते हैं। ढाबा पर नाइट ड्यूटी रहता है।" आत्मविश्वास भरी आवाज़ में उसने जवाब दिया।

" बैटर ऑप्शन ले आओ।" मैंने मुस्कुराते हुए कहा।

खाना खाया। बिल टेबल पर था और आकाश......नहीं नहीं ..... आका"स" समाने खड़ा था।

एक लम्बे अर्से बाद मैंने किसी वेटर को टिप नहीं दी।

वह टिप देने लायक व्यक्ति नहीं था।

मेरे पास पार्कर का एक पेन था। मैंने उसकी शर्ट की जेब में वह पेन लगा दिया।
उसकी आंखों की चमक देखने लायक थी।

एक वर्ग है.......जो बेशक घोर गरीबी में जी रहा है। दाने दाने का मोहताज है। रोज कुआं खोद रोज पानी पी रहा है......लेकिन फिर भी अपने लिए .........बैटर ऑप्शन खोज रहा है।
बेहतर विकल्प खोज रहा है। यह वर्ग दिन में किताबों में मुंह दिए सपनों की लड़ाई लड़ रहा है और रात में ढाबे पर खाना परोसता सर्वाइवल की लड़ाई लड़ रहा है।

........और जीतता भी यही वर्ग है क्योंकि इसके पास हारने को .....कुछ भी नहीं है।

मैं कल रात भविष्य के एक प्रशासनिक अधिकारी को पेन भेंट कर आया हूं।
परिस्थिति जितनी भी विकट हो संघर्ष जारी रखना ही ......."बैटर ऑप्शन" है।

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*शनि-रवि-सोम प्रेरक प्रसंग । यदा कदा तत्कालीन प्रसंग - स्वास्थ्य - हास्य ...*    👉🏼
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रविवार, 26 मार्च 2023

मोह

 

एक सेठ जी थे | काफी बूढ़े हो गए थे | दाना दलने की एक चक्की थी उनकी | दूकान पर बैठे थे | बूढ़े होने पर भी दाना दल रहे थे | दलते जाते, कहते जाते- “इस जीवन से तो मौत अच्छी है |” इसी समय एक साधु दूकान के पास से होकर निकले| उन्होंने सेठ जी के ये शब्द सुने, सोचा कितना दुखी है यह व्यक्ति ! इसकी सहायता करनी चाहिये |
’उसके पास जाकर बोले –सेठ बहुत दुखी लगता है तू ! मेरे पास एक विद्या है ! यदि तू चाहे तो तुझे स्वर्ग ले जा सकता हूँ| चलता है तो चल! यहाँ के दुखों से छुटकारा मिल जायगा |  सेठ ने साधु की और देखा; बोला –“बहुत दयावान हो तुम, परन्तु मैं जा कैसे सकता हूँ?  इतना बुढा हो गया , अभी तक कोई संतान नहीं हुई | संतान हो जाय तो चलूँगा अवश्य|” साधु ने कहा –“बहुत अच्छा |”और चला गया |
कुछ वर्षों बाद सेठ के दो बेटे पैदा हो गये| साधु ने वापस आकर कहा- “चलो सेठ ! अब तो तुम्हारी सन्तान हो गई|” सेठ ने कहा –“हाँ हो तो गई, परन्तु अभी तक वह किसी योग्य तो नहीं | लड़के तनिक बड़े हो जाएँ, तब तुम आना | मैं अवश्य चलूँगा |
लड़के बड़े हो गये | साधु फिर आया तो सेठ नहीं था | पूछा उसने की सेठ कहाँ हैं ? तो पता लगा की मर गये हैं | साधु ने योग बल से देखा कि मर कर वह गया कहाँ ? तो उसने पता लगाया कि दूकान के बाहर जो बैल बंधा है, वही पिछले जन्म का सेठ है | उसके पास जाकर साधु ने कहा - अब चलेगा स्वर्ग को ?” 
सेठ (बैल) ने सर हिला कर कहा- “कैसे जाऊँ| बच्चे अभी नासमझ हैं | मैं चला गया तो कोई दूसरा बैल ले आयेंगे | जितनी अच्छी प्रकार से मैं बोझ उठता हूँ, उतनी अच्छी प्रकार से दूसरा बैल बोझ नहीं उठाएगा| तो मेरे बच्चों को हानि हो जायेगी | ना भाई अभी तो मैं नहीं जा सकता, कुछ देर और ठहर जा |” 
पांच वर्ष व्यतीत हो गये | साधु फिर वापस आया | देखा- दूकान के सामने अब बैल नहीं है| दूकान के मालिकों ने एक ट्रक खरीद लिया है | उसने इधर उधर से पूछा कि बैल कहाँ गया ? ज्ञात हुआ, बोझ ढोते ढोते मर गया | साधु ने फिर अपने योग बल का प्रयोग करके पता लगाया |
तो पता लगा कि- कि वह सेठ अपने ही घर के द्वार पर कुत्ता बन कर बैठा है | साधु ने उसके पास जाकर कहा _ अब तो बोझ ढोने कि बात भी नहीं रही | अब चल तुझे स्वर्ग ले चलूँ |”
कुत्ते के शरीर में बैठे सेठ ने कहा- अरे कैसे ले चलेगा ! देखता नहीं कि मेरी बहु ने कितने आभूषण पहन रखे हैं? मेरे लड़के घर में नहीं हैं, यदि कोई चोर आ गया तो बहु को बचायेगा कौन? नहीं बाबा! तुम जाओ, अभी मैं नहीं जा सकता |” साधू चला गया |
एक वर्ष बाद उसने वापस आकर देखा कि कुत्ता भी मर गया है  | उस साधु ने अपने योग बल द्वारा पुनः उस सेठ को खोजा | तो ज्ञात हुआ कि वह अपने घर के पास बहने वाली गन्दी नाली में कीड़ा बन के बैठा है | साधु ने उसके पास जाकर कहा- “देखो सेठ! क्या इससे बड़ी दुर्गति भी कभी होगी? कहाँ से कहाँ पहुँच गये तुम ! अब भी मेरी बात मानो |
आओ तुम्हें स्वर्ग ले चलूँ|” कीड़े के शरीर में बैठे सेठ ने चिल्ला कर कहा - “चला जा यहाँ से ! क्या मैं ही रह गया हूँ स्वर्ग जाने के लिए ? उनको ले जा मुझको यहीं पड़ा रहने दे | यहाँ पोतों पोतीओं को आते जाते देख कर प्रसन्न होता हूँ | स्वर्ग में क्या मैं तेरा मुख देखा करूँगा ?”

यह है मोह के चक्र में फंसे रहने का परिणाम | यह 😭मोह😭 का चक्र आत्मा को (सुसुप्त अवस्था) पहुंचा देता है यहि अधम योनि का कारण बनता है l  अतः इस प्रकार के कर्म मत करो ! कर्म करो अवश्य, परन्तु मोह और ममता  यानि तामसिक प्रवृतियों से दूर हटकर करो l
(- लखपत जी के संकलन से प्राप्त )
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शनिवार, 25 मार्च 2023

आत्मनिर्भर

 

एक बार दिल्ली से गोवा की उड़ान में एक सरदारजी मिले। साथ में उनकी सरदारनी भी थीं।
सरदारजी की उम्र करीब 80 साल रही होगी। मैंने पूछा नहीं लेकिन सरदारनी भी 75 पार ही रही होंगी। उम्र के सहज प्रभाव को छोड़ दें, तो दोनों फिट थे।
सरदारनी खिड़की की ओर बैठी थीं, सरदारजी बीच में और सबसे किनारे वाली सीट मेरी थी।
उड़ान भरने के साथ ही सरदारनी ने कुछ खाने का सामान निकाला और सरदारजी की ओर किया। सरदार जी कांपते हाथों से धीरे-धीरे खाने लगे।
सरदार जी ने कोई जूस लिया था। खाना खाने के बाद जब उन्होंने जूस की बोतल के ढक्कन को खोलना शुरू किया तो ढक्कन खुले ही नहीं। सरदारजी कांपते हाथों से उसे खोलने की कोशिश कर रहे थे।
मैं लगातार उनकी ओर देख रहा था। मुझे लगा कि ढक्कन खोलने में उन्हें मुश्किल आ रही है तो मैंने कहा कि लाइए, मैं खोल देता हूं।
सरदारजी ने मेरी ओर देखा, फिर मुस्कुराते हुए कहने लगे कि बेटा ढक्कन तो मुझे ही खोलना होगा।
मैंने कुछ पूछा नहीं, लेकिन सवाल भरी निगाहों से उनकी ओर देखा।
सरदारजी ने कहा, बेटाजी, आज तो आप खोल देंगे। लेकिन अगली बार कौन खोलेगा? इसलिए मुझे खुद खोलना आना चाहिए। सरदारनी भी सरदारजी की ओर देख रही थीं। जूस की बोतल का ढक्कन उनसे भी नहीं खुला था। पर सरदारजी लगे रहे और बहुत बार कोशिश करके उन्होंने ढक्कन खोल ही दिया। दोनों आराम से जूस पी रहे थे।
कल मुझे दिल्ली से गोवा की उड़ान में ज़िंदगी का एक सबक मिला।
सरदारजी ने मुझे बताया कि उन्होंने ये नियम बना रखा है कि अपना हर काम वो खुद करेंगे। घर में बच्चे हैं, भरा पूरा परिवार है। सब साथ ही रहते हैं। पर अपनी रोज़ की ज़रूरत के लिए सरदारजी सिर्फ सरदारनी की मदद लेते हैं, बाकी किसी की नहीं। वो दोनों एक दूसरे की ज़रूरतों को समझते हैं।
सरदारजी ने मुझसे कहा कि जितना संभव हो, अपना काम खुद करना चाहिए। एक बार अगर काम करना छोड़ दूंगा, दूसरों पर निर्भर होऊंगा, तो समझो बेटा कि बिस्तर पर ही पड़ जाऊंगा। फिर मन हमेशा यही कहेगा कि ये काम इससे करा लूं, वो काम उससे। फिर तो चलने के लिए भी दूसरों का सहारा लेना पड़ेगा। अभी चलने में पांव कांपते हैं, खाने में भी हाथ कांपते हैं, पर जब तक आत्मनिर्भर रह सको, रहना चाहिए।
हम गोवा जा रहे हैं, दो दिन वहीं रहेंगे। हम महीने में एक दो बार ऐसे ही घूमने निकल जाते हैं। बेटे-बहू कहते हैं कि अकेले मुश्किल होगी, पर उन्हें कौन समझाए कि मुश्किल तो तब होगी, जब हम घूमना-फिरना बंद करके खुद को घर में कैद कर लेंगे। पूरी ज़िंदगी खूब काम किया। अब सब बेटों को दे कर अपने लिए महीने के पैसे तय कर रखे हैं और हम दोनों उसी में आराम से घूमते हैं।
जहां जाना होता है एजेंट टिकट बुक करा देते हैं, एयरपोर्ट पर टैक्सी आ जाती है, होटल में कोई तकलीफ होनी नहीं है। स्वास्थ्य एकदम ठीक है। कभी-कभी जूस की बोतल ही नहीं खुलती। पर थोड़ा दम लगाता हूं तो वो भी खुल ही जाती है।
तय किया था कि इस बार की उड़ान में लैपटॉप पर एक पूरी फिल्म देख लूंगा। पर यहां तो मैं जीवन की फिल्म देख रहा था। एक ऐसी फिल्म जिसमें जीवन जीने का संदेश छिपा था।
“जब तक हो सके, आत्मनिर्भर होना चाहिए।”...

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सोमवार, 20 मार्च 2023

उर्मिला 19

 

उर्मिला 19

    भरत निकले अयोध्या से! हृदय में प्रेम था बस! कभी मन डर रहा था, राम क्या प्रण तोड़ सकते हैं? कभी मन कह रहा था, राम भक्तों की ही सुनते हैं।
    भरत के साथ थी पूरी अयोध्या! वे सारे लोग जिनका हृदय तो बस राम मय था। कौसल्या थीं, जिनके मुख पे अद्भुत शांति थी। राम को बस देख भर लेने की कोमल भावना थी, क्यों कि उनको ज्ञात था कि पांव पीछे खींचने वालों में नहीं है राम उनका!
     सुमित्रा थीं, जिन्होंने युगों पहले त्याग डाला था कभी अधिकार अपने। जिन्होंने भरे थे बच्चों में अपने भाइयों के प्रति समर्पण के ही सारे गुण! थी उनकी आंख में आशा की पतली जोत, कि उनके कुल का संकट दूर हो जाता तो जीवन धन्य होता।
     वहीं पर कैकई थीं। जिनके भाग्य में अब अश्रु थे, अपमान था, और थे तिरस्कृत दिन कि जो कटते नहीं थे। उन निरीह आंखों में भी था विश्वास, कि उनका राम उनसे रूष्ट तो हो ही नहीं सकता।
     उन्ही के संग निज गृह त्याग कर दौड़े चले थे लोग, जो अपने राम को उनकी अयोध्या सौंपने की जिद में थे। राम जी का नाम उनके मुख पे था। राम उनकी आंख में थे, हृदय में थे, धमनियों में रक्त बन कर दौड़ते से राम, कि सारी अयोध्या भाव में डूबी हुई थी। वे संसार के सबसे अनूठे लोग थे जी, थी वह संसार की सबसे बड़ी तीर्थयात्रा...
     उन्ही के मध्य गुमसुम सर झुकाए चल रही थी वह, कि जिसका प्रेम था इस यात्रा के पार! परिवार की खातिर समय से जूझती सी उर्मिला, और धर्म की खातिर ही वन वन भटकता सा प्रेम उसका... सर उठाती थीं तो बस इस आश में कि देख लेंगे प्रेम को, भय झुका देता था सर कि प्रेम को यदि प्रेम की याद आ गयी तो धर्म की डोरी कहीं ना छूट जाए हाथ से... उर्मिला कब चाहती थीं कि लखन घर लौट आएं? उर्मिला बस चाहती थीं धर्म, पति का अमर होवे... कीर्ति उनकी धवल होवे... स्वयं की चिन्ता कहाँ थी उर्मिला को? उसे तो बस याद थे तो लक्ष्मण थे, और था तो कुलवधू का धर्म अपना... राम के युग में खड़ी वह मूक देवी ही हमारी उर्मिला थीं।
    एक संदेशा भरत ने भेज डाला था, कि मिथिला! धर्म पर्थ पर चल रहे हैं, आ सको तो संग आओ! और वह मिथिला थी भाई, राम खातिर दौड़ निकली। राह में जब भरत से राजा जनक की भेंट हो गयी, रो पड़े विदेह ने छाती लगा कर कहा कि हे संत! गर्व है मुझको, कि मेरे पुत्र हो तुम! तुम युगों की तपस्या की प्राप्ति हो, साधुता के ध्वज हो तुम, तुम अमर रघुवंश का सम्मान हो! राम वापस लौट आएं या न आएं, तुम सफल हो, तुम अमर हो...
क्रमशः
(पौराणिक पात्रों व कथानक लेखनी के धनी श्री सर्वेश तिवारी श्रीमुख द्वारा लिखित ये कथा इतनी प्यारी व आकर्षण भरी लगी, कि शेयर करने के लोभ को रोक न पाया )

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