सोमवार, 26 सितंबर 2022

अंतिम सच

 



    एक राजा था जिसने ने अपने राज्य में क्रूरता से बहुत सी दौलत इकट्ठा करके(एकतरह शाही खजाना )आबादी से बाहर जंगल एक सुनसान जगह पर बनाए तहखाने मे सारे खजाने को खुफिया तौर पर छुपा दिया था खजाने की सिर्फ दो चाबियां थी एक चाबी राजा के पास और एक उस के एक खास मंत्री के पास थी इन दोनों के अलावा किसी को भी उस खुफिया खजाने का राज मालूम ना था । एक रोज़ किसी को बताए बगैर राजा अकेले अपने खजाने को देखने निकला,तहखाने का दरवाजा खोल कर अंदर दाखिल हो गया और अपने खजाने को देख देख कर खुश हो रहा था,और खजाने की चमक से सुकून पा रहा था।

उसी वक्त मंत्री भी उस इलाके से निकला और उसने देखा की खजाने का दरवाजा खुला है वो हैरान हो गया और ख्याल किया कि कही कल रात जब मैं खजाना देखने आया तब शायद खजाना का दरवाजा खुला रह गया होगा, उसने जल्दी जल्दी खजाने का दरवाजा बाहर से बंद कर दिया और वहां से चला गया,उधर खजाने को निहारने के बाद राजा जब संतुष्ट हुआ,और दरवाजे के पास आया तो ये क्या...दरवाजा तो बाहर से बंद हो गया था,उसने जोर जोर से दरवाजा पीटना शुरू किया पर वहां उनकी आवाज सुननेवाला उस जंगल में कोई ना था ।
       
राजा चिल्लाता रहा,पर अफसोस कोई ना आया वो थक हार के खजाने को देखता रहा अब राजा भूख और पानी की प्यास से बेहाल हो रहा था , पागलो सा हो गया..वो रेंगता रेंगता हीरो के संदूक के पास गया और बोला ए दुनिया के नायाब हीरो मुझे एक गिलास पानी दे दो..फिर मोती सोने चांदी के पास गया और बोला ए मोती चांदी सोने के खजाने मुझे एक वक़्त का खाना दे दो..राजा को ऐसा लगा की हीरे मोती उसे बोल रहे हो की तेरे सारी ज़िन्दगी की कमाई तुझे एक गिलास पानी और एक समय का खाना नही दे सकती..राजा भूख से बेहोश हो के गिर गया ।
        जब राजा को होश आया तो सारे मोती हीरे बिखेर के दीवार के पास अपना बिस्तर बनाया और उस पर लेट गया,वो दुनिया को एक पैगाम देना चाहता था लेकिन उसके पास कागज़ और कलम नही था ।
       राजा ने पत्थर से अपनी उंगली फोड़ी और बहते हुए खून से दीवार पर कुछ लिख दिया,उधर मंत्री और पूरी सेना लापता राजा को ढूंढते रहे पर बहुत दिनों तक राजा ना मिला तो मंत्री राजा के खजाने को देखने आया,उसने देखा कि राजा हीरे जवाहरात के बिस्तर पर मरा पड़ा है,और उसकी लाश को कीड़े मोकड़े खा रहे थे,राजा ने दीवार पर खून से लिखा हुआ था...ये सारी दौलत एक घूंट पानी ओर एक निवाला नही दे सकी...
  *यही अंतिम सच है |आखिरी समय आपके साथ आपके कर्मो की दौलत जाएगी,चाहे आप कितनी बेईमानी से हीरे पैसा सोना चांदी इकट्ठा कर लो सब यही रह जाएगा |इसीलिए जो जीवन आपको प्रभु ने उपहार स्वरूप दिया है , उसमें अच्छे कर्म लोगों की भलाई के काम कीजिए बिना किसी स्वार्थ के ओर अर्जित कीजिए अच्छे कर्मो की अनमोल दौलत जो आपके सदैव काम आएगी |*

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रविवार, 25 सितंबर 2022

कम्फर्ट जोन

 


एक दार्शनिक अपने एक शिष्य के साथ कहीं से गुजर रहा था। चलते-चलते वे एक खेत के पास पहुंचे। खेत अच्छी जगह स्थित था लेकिन उसकी हालत देखकर लगता था मानो उसका मालिक उस पर जरा भी ध्यान नहीं देता है।

खैर, दोनों को प्यास लगी थी सो वे खेत के बीचो-बीच बने एक टूटे-फूटे घर के सामने पहुंचे और दरवाज़ा खटखटाया।

अन्दर से एक आदमी निकला, उसके साथ उसकी पत्नी और तीन बच्चे भी थे। सभी फटे-पुराने कपड़े पहने हुए थे।

दार्शनिक बोला, “ श्रीमान !  क्या हमें पानी मिल सकता है? बड़ी प्यास लगी है!”

“ज़रूर!”, आदमी उन्हें पानी का जग थमाते हुए बोला।

“मैं देख रहा हूँ कि आपका खेत इतना बड़ा है पर इसमें कोई फसल नहीं बोई गयी है, और न ही यहाँ फलों के वृक्ष दिखायी दे रहे हैं तो आखिर आप लोगों का गुजारा कैसे चलता है?”, दार्शनिक ने प्रश्न किया।

“जी, हमारे पास एक भैंस है, वो काफी दूध देती है उसे पास के गाँव में बेच कर कुछ पैसे मिल जाते हैं और बचे हुए दूध का सेवन कर के हमारा गुजारा चल जाता है।”, आदमी ने समझाया।

दार्शनिक और शिष्य आगे बढ़ने को हुए तभी आदमी बोला, “ शाम काफी हो गयी है, आप लोग चाहें तो आज रात यहीं रुक जाएं!”

दोनों रुकने को तैयार हो गये।

आधी रात के करीब जब सभी गहरी नींद में सो रहे थे तभी दार्शनिक ने शिष्य को उठाया और बोला, “चलो हमें अभी यहाँ से चलना है, और चलने से पहले हम उस आदमी की भैंस को कहीं दूर ले जाकर छोड़ देते हैं।”

शिष्य को अपने गुरु की बात पर यकीन नहीं हो रहा था पर वो उनकी बात काट भी नहीं सकता था।

दोनों भैंस को बहुत दूर छोड़कर रातों-रात गायब हो गये।

यह घटना शिष्य के जेहन में बैठ गयी और करीब 10 साल बाद जब वो एक सफल उद्यमी बन गया तो उसने सोचा क्यों न अपनी गलती का पश्चाताप करने के लिये एक बार फिर उसी आदमी से मिला जाये और उसकी आर्थिक मदद की जाये।

अपनी चमचमाती कार से वह उस खेत के सामने पहुंचा।

शिष्य को अपनी आँखों पर यकीन नहीं हो रहा था। वह उजाड़ खेत अब फलों के बागीचे में बदल चुका था। टूटे-फूटे घर की जगह एक शानदार बंगला खड़ा था और जहाँ अकेली भैंस बंधी रहती थी वहां अच्छी नस्ल की कई गाएं और भैंस अपना चारा चर रही थीं।

शिष्य ने सोचा कि शायद भैंस के न रहने पर वो परिवार सब बेच-बाच कर कहीं चला गया होगा और वापस लौटने के लिये वो अपनी कार स्टार्ट करने लगा कि तभी उसे वो दस साल पहले वाला आदमी दिखा।

“ शायद आप मुझे पहचान नहीं पाये, सालों पहले मैं आपसे मिला था।”, शिष्य उस आदमी की तरफ बढ़ते हुए बोला।

“नहीं-नहीं, ऐसा नहीं है, मुझे अच्छी तरह याद है, आप और आप के गुरु यहाँ आये थे। उस दिन को कैसे भूल सकता हूँ। उस दिन ने तो मेरा जीवन ही बदल कर रख दिया।

आप लोग तो बिना बताये चले गये पर उसी दिन ना जाने कैसे हमारी भैंस भी ग़ायब हो गयी।

कुछ दिन तो समझ ही नहीं आया कि क्या करें, पर जीने के लिये कुछ तो करना था, सो लकड़ियाँ काट कर बेचने लगा। उससे कुछ पैसे हुए तो खेत में बोवाई कर दी। सौभाग्य से फसल अच्छी हो गयी, बेचने पर जो पैसे मिले उससे फलों के बागीचे लगवा दिये और यह काम अच्छा चल पड़ा और इस समय मैं आस-पास के हज़ार गाँव में सबसे बड़ा फल व्यापारी हूँ। सचमुच, ये सब कुछ ना होता अगर उस भैंस की गायब ना हुई होती ।

“लेकिन यही काम आप पहले भी कर सकते थे?”, शिष्य ने आश्चर्य से पूछा।

आदमी बोला, “ बिलकुल कर सकता था। पर तब ज़िन्दगी बिना उतनी मेहनत के आराम से चल रही थी। कभी लगा ही नहीं कि मेरे अन्दर इतना कुछ करने की क्षमता है सो कोशिश ही नहीं की , पर जब भैंस गायब हो गयी तब हाथ-पाँव मारने पड़े और मुझ जैसा गरीब-बेहाल इंसान भी इस मुकाम तक पहुँच पाया।”

आज शिष्य अपने गुरु के उस निर्देश का असली मतलब समझ चुका था और बिना किसी पश्चाताप के वापस लौट गया।

आदी जिंदगी यानि 'कम्फर्ट जोन' से बाहर आना जरूरी ।

कई बार हम अपनी परिस्थितियों के इतने आदी हो जाते हैं कि बस उसी में जीना सीख लेते हैं,और नये काम या व्यापार के बारे में सोचते ही नहीं। इस तरह की आदी ज़िंदगी यानी 'कम्फर्ट जोन' में हम कभी भी अपने क्षमता को महसूस ही नहीं कर पाते और बहुत सी ऐसी चीजें करने से चूक जाते हैं जिन्हें करने के लिये हमारे अन्दर अदृश्य आंतरिक क्षमता विद्यमान है और जो हमारी जिंदगी को बहुत ही बेहतर बना सकती है।

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शनिवार, 24 सितंबर 2022

माया ईश्वर की

 

एक राजा, वह जब भी मंदिर जाता, तो 2 भिखारी उस मंदिर के दरवाज़े के दाएं और बाएं बैठा करते...
    
दाईं तरफ़ वाला कहता: "हे ईश्वर, तूने राजा को बहुत कुछ दिया है, मुझे भी दे दो.!"
   
बाईं तरफ़ वाला कहता: "हे राजन.! ईश्वर ने तुझे बहुत कुछ दिया है, मुझे भी कुछ दे दो.!"

दाईं तरफ़ वाला भिखारी बाईं तरफ़ वाले से कहता: ईश्वर से माँग वह सबकी सुनने वाला है..... बाईं तरफ़ वाला जवाब देता: "चुप कर मूर्ख"
    
एक बार राजा ने अपने मंत्री को बुलाया और कहा, "कि मंदिर में दाईं तरफ जो भिखारी बैठता है वह हमेशा ईश्वर से मांगता है तो अवश्य ईश्वर उसकी जरूर सुनेगा..... लेकिन जो बाईं तरफ बैठता है वह हमेशा मुझसे विनती करता रहता है, तो तुम ऐसा करो, कि एक बड़े से बर्तन में खीर भर कर उसमें स्वर्ण मुद्राएं डाल दो और वह उसको दे आओ....
     
मंत्री ने ऐसा ही किया.. अब वह भिखारी मज़े से खीर खाते-खाते दूसरे भिखारी को चिड़ाता हुआ बोला: "हुह... बड़ा आया ईश्वर देगा..', यह देख राजा से माँगा, मिल गया ना.?"
    
खाते खाते जब इसका पेट भर गया, तो उसने बची हुई खीर का बर्तन दूसरे भिखारी को दे दिया और कहा: "ले पकड़... तू भी खाले, मूर्ख.."
     
अगले दिन जब राजा आया तो देखा कि बाईं तरफ वाला भिखारी तो आज भी वैसे ही बैठा है लेकिन दाईं तरफ वाला ग़ायब है....
     
राजा ने चौंक कर उससे पूछा: "क्या तुझे खीर से भरा बर्तन नहीं मिला...???"
   
भिखारी: "जी बर्तन मिला था राजा जी, क्या स्वादिस्ट खीर थी, मैंने ख़ूब पेट भर कर खायी.!"
  
राजा: "फिर....???"
    
भिखारी: "फ़िर जब मेरा पेट भर गया तो वह जो दूसरा भिखारी यहाँ बैठता है मैंने उसको दे दी, मुर्ख हमेशा कहता रहता था: ' ईश्वर देगा, ईश्वर देगा तो मैंने कहा, "ले बाकी की बची हुई तू खा लेना---"
      
राजा मुस्कुरा कर बोला: "अवश्य ही, ईश्वर ने उसे... दे ही दिया.!"

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सोमवार, 19 सितंबर 2022

मंत्र सिद्धि का मंत्र

 

नवरात्रि नज़दीक है । कहीं पढ़ी ये चर्चा ध्यान में आई -
*मंत्र क्यों सिद्ध नहीं होते*

माधवाचार्य गायत्री के घोर उपासक थे। वृंदावन मे उन्होंने तेरह वर्ष तक गायत्री के समस्त अनुष्ठान विधिपूर्वक किये। लेकिन उन्हे इस से न भौतिक न आध्यायत्मिकता  लाभ दिखा। वो निराश हो कर काशी गये। वहां उन्हें एक आवधूत मिला जिसने उन्हें एक वर्ष तक काल भैरव की उपासना करने को कहा।

उन्होंने एक वर्ष से अधिक ही कालभैरव की आराधना की। एक दिन उन्होंने आवाज सुनी "मै प्रस्ंन्न हूं वरदान मांगो"। उन्हें लगा कि ये उनका भ्रम है। क्योंकि सिर्फ आवाज सुनायी दे रही थी कोइ दिखाई नहीं दे रहा था।
उन्होंने सुना अनसुना कर दिया। लेकिन वही आवाज फिर से उन्हें तीन बार सुनायी दी। तब माधवाचार्य जी ने कहा
आप सामने आ कर अपना परिचय दे मै अभी काल भैरव की उपासना मे व्यस्त हूं।

सामने से आवाज आयी "तूं जिसकी उपासना कर रहा है वो मै ही काल भैरव हूँ"।

माधवाचार्य जी ने कहा "तो फिर सामने क्यो नहीं आते?"

काल भैरव जी ने कहा "माधवा  तुमने तेरह साल तक जिन गायत्री मंत्रों का अखंड जाप किया है। उसका तेज तुम्हारे सर्वत्र चारो ओर व्याप्त है। मनुष्य रूप मै उसे मै सहन नहीं कर सकता, इसीलिए सामने नहीं आ सकता हूँ।"

माध्वाचार्य ने कहा "जब आप उस तेज का सामना नहीं कर सकते है तब आप मेरे किसी काम के नहीं। आप वापस जा सकते है।"

काल भैरव जी ने कहा "लेकिन मै तुम्हारा समाधान किये बिना नहीं जा सकता हूं।"

"तब फिर ये बताइये कि मेने पिछले तेरह वर्षों से किया गायत्री अनुष्ठान मुझे क्यों नहीं फला?"

काल भैरव ने कहा "वो अनुष्ठान निष्फल नहीं हुए है।
उससे तुम्हारे जन्म जन्मांतरो के पाप नष्ट हुए है।"

तो अब मै क्या करू "फिर से वृंदावन जा कर ओर एक वर्ष गायत्री का अनुष्ठान कर। इस से तेरे इस जन्म के भी पाप नष्ट हो जायेंगे फिर गायत्री मां प्रसन्न होगी।"

काल भैरव ने कहा "*आप या गायत्री कहां होते है हम यहीं रहते है पर अलग रुपों मे ये मंत्र जप जाप और कर्म कांड तुम्हें हमे देखने की शक्ति, सिध्दि देते है जिन्हें तुम साक्षात्कार कहते हो।"*

माधवाचार्य वृंदावन लौट आये। अनुष्ठान शुरु किया। एक दिन बृह्म मूहुर्त मे अनुष्ठान मे बैठने ही वाले थे कि उन्होंने आवाज सुनी "मै आ गयी हूँ माधव, वरदान मांगो"

"माँ" माधवाचार्य फूटफूटकर रोने लगे।

"माँ, पहले बहुत लालसा थी कि वरदान मांगू लेकिन
अब् कुछ मांगने की इच्छा  रही नही, माँ, आप जो मिल गयी हो"

"माधव तुम्हें मांगना तो पडेगा ही।"

"माँ ये देह, शरीर भले ही नष्ट हो जाये लेकिन इस शरीर से की गयी भक्ति अमर रहे।  इस भक्ति की आप सदैव साक्षी रहो। यही वरदान दो।"

"तथास्तू"

आगे तीन वर्षों मै माधवाचार्य जी नै माधवनियम नाम का आलौकिक ग्रंथ लिखा।

*याद रखिये आपके द्वारा शुरू किये गये मंत्र जाप पहले दिन से ही काम करना शुरू कर देतै है। लेकिन सबसे पहले प्रारब्ध के पापों को नष्ट करते है। देवताओं की शक्ति इन्हीं पापों को नष्ट करने मे खर्च हो जाती है और आप अपने जप, जाप या साधना को निष्फल जान हताश हो जाते हो। जैसे ही ये पाप नष्ट होते है आपको एक आलौकिक तेज, एक आध्यायात्मिक शक्ति और सिध्दि प्राप्त होने लगती है। अतः निराश न हो कर अनुष्ठान चालू रखे।*

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