रविवार, 27 फ़रवरी 2022

इधर उधर बिखरी कहानियां

 

बार बार पढ़ने सी है ये कहानी...


पिताजी ने मेरे लिये किया क्या है :-

"अजी सुनते हो? राहूल को कम्पनी में जाकर टिफ़िन दे आओगे क्या?"

"क्यों आज राहूल टिफ़िन लेकर नहीं गया।?" शरद राव ने पुछा।

आज राहूल की कम्पनी के चेयरमैन आ रहे हैं, इसलिये राहूल सुबह 7 बजे ही निकल गया और इतनी सुबह खाना नहीं बन पाया था।"

"ठीक हैं। दे आता हूँ मैं।"

शरद राव ने हाथ का पेपर रख दिया और वो कपडे बदलने के लिये कमरे में चले गये। पुष्पाबाई ने  राहत की साँस ली।

शरद राव तैयार हुए मतलब उसके और राहूल के बीच हुआ विवाद उन्होंने नहीं सुना था।

विवाद भी कैसा ? हमेशा की तरह राहूल का अपने पिताजी पर दोषारोपण करना और
पुष्पाबाई का अपनी पति के पक्ष में बोलना।

विषय भी वही! हमारे पिताजी ने हमारे लिये क्या किया? मेरे लिये क्या किया हैं मेरे बाप ने ?

"माँ! मेरे मित्र के पिताजी भी शिक्षक थे, पर देखो उन्होंने कितना बडा बंगला बना लिया। नहीं तो एक ये हमारे पापा   (पिताजी)। अभी भी हम किराये के मकान में ही रह रहे हैं।"

"राहूल, तुझे मालूम हैं कि तुम्हारे पापा  घर में बडे हैं। और दो बहनों और दो भाईयों की शादी का खर्चा भी उन्होंने उठाया था। सिवाय इसके तुम्हारी बहन की शादी का भी खर्चा उन्होंने ने ही किया था। अपने गांव की जमीन की कोर्ट कचेरी भी लगी ही रही। ये सारी जवाबदारियाँ किसने उठाई?"

"क्या उपयोग हुआ उसका? उनके भाई - बहन बंगलों में रहते हैं। कभी भी उन्होंने सोचा कि हमारे लिये जिस भाई ने इतने कष्ट उठाये उसने एक छोटा सा मकान भी नहीं बनाया, तो हम ही उन्हें एक मकान बना कर दे दें ?"

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एक क्षण के लिए पुष्पाबाई की आँखें भर आईं।

क्या बतायें अपने जन्म दिये पुत्र को "बाप ने क्या किया मेरे लिये" पुछ रहा है ?

फिर बोली  .... "तुम्हारे पापा  ने अपना कर्तव्य निभाया। भाई-बहनों से कभी कोई आशा नहीं रखी। "

राहूल मूर्खों जैसी बात करते हुए बोला — "अच्छा वो ठीक हैं। उन्होंने हजारों बच्चों की ट्यूशन्स ली। यदि उनसे फीस ले लेते तो आज पैसो में खेल रहे होते।"

"आजकल के क्लासेस वालों को देखो। इंपोर्टेड गाड़ियों में घुमते हैं।"

"यह तुम सच बोल रहे हो। परन्तु, तुम्हारे पापा ( पिताजी) का तत्व था, ज्ञान दान का पैसा नहीं लेना"

"उनके इन्हीं तत्वों के कारण उनकी कितनी प्रसिद्धि हुई। और कितने पुरस्कार मिलें। उसकी कल्पना हैं तुझे।"

ये सुनते ही राहूल एकदम नाराज हो गया।

"क्या चाटना हैं उन पुरस्कारों को? उन पुरस्कारों से घर थोडे ही बनते आयेगा। पडे ही धूल खाते हुए। कोई नहीं पुछता उनको।"

इतने में दरवाजे पर दस्तक सुनाई दी। राहूल ने दरवाजा खोला तो शरदराव खडे थे।

पापा  ने उनका  बोलना तो नहीं सुना इस डर से राहूल का चेहरा उतर गया। परन्तु, शरद राव बिना कुछ बोले अन्दर चले गये। और वह वाद वहीं खत्म हो गया।

ये था पुष्पाबाई और राहूल का कल का झगड़ा, पर आज ....

शरद राव ने टिफ़िन साईकिल को अटकाया और तपती धूप में औद्योगिक क्षेत्र की राहूल की कम्पनी के लिये निकल पडे।

7 किलोमीटर दूर कंपनी तक पहुचते - पहुंचते उनका दम फूल गया था। कम्पनी के गेट पर सिक्युरिटी गार्ड ने उन्हें रोक दिया।

"राहूल पाटील साहब का टिफ़िन देना हैं। अन्दर जाँऊ क्या?"

"अभी नहीं सहाब आये हुए है ।" गार्ड बोला।

"चेयरमैन साहब आये हुए हैं। उनके साथ मिटिंग चल रही हैं। किसी भी क्षण वो मिटिंग खत्म कर आ सकते हैं। तुम बाजू में ही रहिये। चेयरमैन साहब को आप दिखना नहीं चाहिये।"

शरद राव थोडी दूरी पर धूप में ही खडे रहे। आसपास कहीं भी छांव नहीं थी।

थोडी देर बोलते बोलते एक घंटा निकल गया। पांवों में दर्द उठने लगा था।

इसलिये शरद राव वहीं एक तप्त पत्थर पर बैठने लगे, तभी गेट की आवाज आई। शायद मिटिंग खत्म हो गई होगी।

चेयरमैन साहेब के पीछे पीछे कई   अधिकारी और उनके साथ राहूल भी बाहर आया।

उसने अपने पिताजी को वहाँ खडे देखा तो मन ही मन नाराज हो गया।

   चेयरमैन साहब कार का दरवाजा खोलकर बैठने ही वाले थे तो उनकी नजर शरद राव की ओर उठ गई।

कार में न बैठते हुए वो वैसे ही बाहर खडे रहे।

"वो सामने कौन खडा हैं?" उन्होंने सिक्युरिटी गार्ड से पुछा।

"अपने राहूल सर के पिताजी हैं। उनके लिये खाने का टिफ़िन लेकर आये हैं।"
गार्ड ने कंपकंपाती आवाज में कहा।

"बुलवाइये उनको।"

जो नहीं होना था वह हुआ।

राहूल के तन से पसीने की धाराऐं बहने लगी। क्रोध और डर से उसका दिमाग सुन्न हुआ जान पडने लगा।

गार्ड के आवाज देने पर शरद राव पास आये।

चेयरमैन साहब आगे बढे और उनके समीप गये।

"आप पाटील सर हैं ना? डी. एन. हाई स्कूल में शिक्षक थे।"

"हाँ। आप कैसे पहचानते हो मुझे?"

कुछ समझने के पहले ही चेयरमैन साहब ने शरदराव के चरण छूये। सभी अधिकारी और राहूल वो दृश्य देखकर अचंभित रह गये।

"सर, मैं अतिश अग्रवाल। आपका विद्यार्थी। आप मुझे घर पर पढ़ाने आते थे।"

" हाँ.. हाँ.. याद आया। बाप रे बहुत बडे व्यक्ति बन गये आप तो ..."

चेयरमैन हँस दिये। फिर बोले, "सर आप यहाँ धूप में क्या कर रहे हैं। आईये अंदर चलते हैं। बहुत बातें करनी हैं आपसे।

सिक्युरिटी तुमने इन्हें अन्दर क्यों नहीं बिठाया?"

गार्ड ने शर्म से सिर नीचे झुका लिया।

वो देखकर शरद राव ही बोले — "उनकी कोई गलती नहीं हैं। आपकी मिटिंग चल रही थी। आपको तकलीफ न हो, इसलिये मैं ही बाहर रूक गया।"

"ओके... ओके...!"

चेयरमैन साहब ने शरद राव का हाथ अपने हाथ में लिया और उनको अपने आलीशन चेम्बर में ले गये।

"बैठिये सर। अपनी कुर्सी की ओर इंगित करते हुए बोले।

"नहीं। नहीं। वो कुर्सी आपकी हैं।" शरद राव सकपकाते हुए बोले।

"सर, आपके कारण वो कुर्सी मुझे मिली हैं। इसलिए पहला हक आपका हैं।"

चेयरमैन साहब ने जबरदस्ती से उन्हें अपनी कुर्सी पर बिठाया।

"आपको मालूम नहीं होगा पवार सर.."  जनरल मैनेजर की ओर देखते हुए बोले,"पाटिल सर नहीं होते तो आज ये कम्पनी नहीं होती और मैं मेरे पिताजी की अनाज की दुकान संभालता रहता।"

राहूल और जी. एम. दोनों आश्चर्य से उनकी ओर देखते ही रहे।

"स्कूल समय में मैं बहुत ही डब्बू विद्यार्थी था। जैसे तैसे मुझे नवीं कक्षा तक पहूँचाया गया। शहर की सबसे अच्छी क्लासेस में मुझे एडमिशन दिलाया गया। परन्तु मेरा ध्यान कभी पढाई में नहीं लगा। उस पर अमीर बाप की औलाद। दिन भर स्कूल में मौज मस्ती और मारपीट करना। शाम की क्लासेस से बंक मार कर मुवी देखना यही मेरा शगल था। माँ को वो सहन नहीं होता। उस समय पाटिल सर कडे अनुशासन और उत्कृष्ट शिक्षक के रूप में प्रसिद्ध थे। माँ ने उनके पास मुझे पढ़ाने की विनती की। परन्तु सर के छोटे से घर में बैठने के लिए जगह ही नहीं थी। इसलिये सर ने पढ़ाने में असमर्थता दर्शाई। "

"माँ ने उनसे बहुत विनती की।और हमारे घर आकर पढ़ाने के लिये मुँह मांगी फीस का बोला। सर ने फीस के लिये तो मना कर दिया। परन्तु अनेक प्रकार की विनती करने पर घर आकर पढ़ाने को तैयार हो गये। पहिले दिन सर आये। हमेशा की तरह मैं शैतानी करने लगा। सर ने मेरी अच्छी तरह से धुनाई कर दी। उस धुनाई का असर ऐसा हुआ कि मैं चुपचाप बैठने लगा। तुम्हें कहता हूँ राहूल, पहले हफ्ते में ही मुझे पढ़ने में रूचि जागृत हो गई। तत्पश्चात मुझे पढ़ाई के अतिरिक्त कुछ भी सुझाई नहीं देता था। सर इतना अच्छा पढ़ाते थे, अंग्रेजी, गणित, विज्ञान जैसे विषय जो मुझे कठिन लगते थे वो अब सरल लगने लगे थे। सर कभी आते नहीं थे तो मैं व्यग्र हो जाता था। नवीं कक्षा में मैं दुसरे नम्बर पर आया। माँ-पिताजी को खुब खुशी हुई। मैं तो, जैसे हवा में उडने लगा था। दसवीं में मैंने सारी क्लासेस छोड दी और सिर्फ पाटिल सर से ही पढ़ने लगा था। और दसवीं में मेरीट में आकर मैंने सबको चौंका दिया था।"

"माय गुडनेस...! पर सर फिर भी आपने सर को फीस नहीं दी?" जनरल मैनेजर ने पुछा। 
        
"मेरे माँ - पिताजी के साथ मैं सर के घर पेडे लेकर गया। पिताजी ने सर को एक लाख रूपये का चेक दिया। सर ने वो नहीं लिया। उस समय सर क्या बोले वो मुझे आज भी याद हैं।

सर बोले — "मैंने कुछ भी नहीं किया। आपका लडका ही बुद्धिमान हैं। मैंने सिर्फ़ उसे रास्ता बताया। और मैं ज्ञान नहीं बेचता। मैं वो दान देता हूँ। बाद में मैं सर के मार्गदर्शन में ही बारहवीं मे पुनः मेरीट में आया। बाद में बी. ई. करने के बाद अमेरिका जाकर एम. एस. किया। और अपने शहर में ही यह कम्पनी शुरु की। एक पत्थर को तराशकर सर ने हीरा बना दिया। और मैं ही नहीं तो सर ने ऐसे अनेक असंख्य हीरे बनाये हैं। सर आपको कोटि कोटि प्रणाम...!!" चेयरमैन साहब ने अपनी आँखों में आये अश्रु रूमाल से पोंछे।

"परन्तु यह बात तो अदभूत ही हैं कि, बाहर शिक्षा का और ज्ञानदान का बाजार भरा पडा होकर भी सर ने एक रूपया भी न लेते हुए हजारों विद्यार्थियों को पढ़ाया, न केवल पढ़ाये पर उनमें पढ़ने की रूचि भी जगाई। वाह सर मान गये आपको और आपके आदर्श को।"
शरद राव की ओर देखकर जी. एम ने कहा।

"अरे सर! ये व्यक्ति तत्त्वनिष्ठ हैं। पैसों, और मान सम्मान के भूखे भी नहीं हैं। विद्यार्थी का भला हो यही एक मात्र उद्देश्य था।" चेयरमैन बोले।

"मेरे पिताजी भी उन्हीं मे से एक। एक समय भूखे रह लेंगे, पर अनाज में मिलावट करके बेचेंगे नहीं।"

ये उनके तत्व थे। जिन्दगी भर उसका पालन किया।ईमानदारी से व्यापार किया। उसका फायदा आज मेरे भाईयों को हो रहा हैं।"

बहुत देर तक कोई कुछ भी नहीं बोला।

फिर चेयरमैन ने शरद राव से पुछा, - "सर आपने मकान बदल लिया या उसी मकान में हैं रहते हैं।"

"उसी पुराने मकान में रहते हैं सर! "
शरदराव के बदले में राहूल ने ही उत्तर दिया।
   
उस उत्तर में पिताजी के प्रति छिपी नाराजगी तत्पर चेयरमैन साहब की समझ में आ गई ।

‌"तय रहा फिर। सर आज मैं आपको गुरू दक्षिणा दे रहा हूँ। इसी शहर में मैंने कुछ फ्लैट्स ले रखे हैं। उसमें का एक थ्री बी. एच. के. का मकान आपके नाम कर रहा हूँ....."

"क्या.?" शरद राव और राहूल दोनों आश्चर्य चकित रूप से बोलें।

"नहीं नहीं इतनी बडी गुरू दक्षिणा नहीं चाहिये मुझे।" शरद राव आग्रहपूर्वक बोले।

चेयरमैन साहब ने शरदराव के हाथ को अपने हाथ में लिया।  "सर, प्लीज....  ना मत करिये और मुझे माफ करें। काम की अधिकता में आपकी गुरू दक्षिणा देने में पहले ही बहुत देर हो चुकी हैं।"

फिर राहूल की ओर देखते हुए उन्होंने पुछ लिया, राहूल तुम्हारी शादी हो गई क्या?"

‌"नहीं सर, जम गई हैं। और जब तक रहने को अच्छा घर नहीं मिल जाता तब तक शादी नहीं हो सकती। ऐसी शर्त मेरे ससुरजी ने रखी होने से अभी तक शादी की डेट फिक्स नहीं की। तो फिर हाॅल भी बुक नहीं किया।"

चेयरमैन ने फोन उठाया और किसी से बात करने लगे।समाधान कारक चेहरे से फोन रखकर, धीरे से बोले "अब चिंता की कोई बात नहीं। तुम्हारे मेरीज गार्डन का काम हो गया। "सागर लान्स" तो मालूम ही होगा!"

"सर वह तो बहूत महंगा हैं..."

"अरे तुझे कहाँ पैसे चुकाने हैं। सर के सारे विद्यार्थी सर के लिये कुछ भी कर सकते हैं। सर के बस एक आवाज देने की बात हैं।

परन्तु सर तत्वनिष्ठ हैं, वैसा करेंगे भी नहीं। इस लान्स का मालिक भी सर का ही विद्यार्थी हैं। उसे मैंने सिर्फ बताया। सिर्फ हाॅल ही नहीं तो भोजन सहित संपूर्ण शादी का खर्चा भी उठाने की जिम्मेदारियाँ ली हैं उसने... वह भी स्वखुशी से। तुम केवल तारीख बताओ और सामान लेकर जाओ।

"बहूत बहूत धन्यवाद सर।"

राहूल अत्यधिक खुशी से हाथ जोडकर बोला। "धन्यवाद मुझे नहीं, तुम्हारे पिताश्री को दो राहूल!ये उनकी पुण्याई हैं। और मुझे एक वचन दो राहूल! सर के अंतिम सांस तक तुम उन्हें अलग नहीं करोगे और उन्हें कोई दुख भी नहीं होने दोगे।

मुझे जब भी मालूम चला कि, तुम उन्हें दुख दे रहे होतो, न केवल इस कम्पनी से  लात मारकर भगा दुंगा परन्तु पुरे महाराष्ट्र भर के किसी भी स्थान पर नौकरी करने लायक नहीं छोडूंगा। ऐसी व्यवस्था कर दूंगा।"चेयरमैन साहब कठोर शब्दों में बोले।

"नहीं सर। मैं वचन देता हूँ, वैसा कुछ भी नहीं होगा।" राहूल हाथ जोडकर बोला।

शाम को जब राहूल घर आया तब, शरद राव किताब पढ रहे थे। पुष्पाबाई पास ही सब्जी काट रही थी।

राहूल ने बैग रखी और शरद राव के पाँव पकडकर बोला — "पापा , मुझसे गलती हो गई। मैं आपको आज तक गलत समझता रहा। मुझे पता नहीं था पापा  आप इतने बडे व्यक्तित्व लिये हो।"

‌शरद राव ने उसे उठाकर अपने सीने से लगा लिया।

अपना लडका क्यों रो रहा हैं, पुष्पाबाई की समझ में नहीं आ रहा था। परन्तु कुछ अच्छा घटित हुआ हैं।

इसलिये पिता-पुत्र में प्यार उमड रहा हैं। ये देखकर उनके नयनों से भी कुछ बूंदे गाल पर लुढक आई।

सभी को जानना होगा कि अपने माता - पिता से कभी यह न कहे कि "आपने मेरे लिये किया ही क्या हैं?" जो भी कमाना हो वो स्वयं अर्जित करें। जो शिक्षा और संस्कार उन्होंने तुम्हें दिये हैं वही कमाने के लिए पथप्रदर्शक रहेंगे।

मातृ देवो भवः, पितृ देवो भवः

🙏

शनिवार, 26 फ़रवरी 2022

परमात्मा की नज़र

 

पुरानी बात है - कलकत्ते में सर कैलासचन्द्र वसु प्रसिद्ध डॉक्टर हो गये हैं। उनकी माता बीमार थीं। एक दिन श्रीवसु महोदय ने देखा—माता की बीमारी बढ़ गयी है, कब प्राण चले जायँ, कुछ पता नहीं। रात्रि का समय था। कैलास बाबू ने बड़ी नम्रता के साथ माताजी से पूछा- 'माँ, तुम्हारे मन में किसी चीज की इच्छा हो तो बताओ, मैं उसे पूरी कर दूँ।' माता कुछ देर चुप रहकर बोलीं- 'बेटा! उस दिन मैंने बम्बई के अंजीर खाये थे। मेरी इच्छा है अंजीर मिल जायँ तो मैं खा लूँ।' उन दिनों कलकत्ते के बाजार में हरे अंजीर नहीं मिलते थे। बम्बई से मँगाने में समय अपेक्षित था । हवाई जहाज थे नहीं। रेल के मार्ग से भी आजकल की अपेक्षा अधिक लगता था। कैलास बाबू बड़े दुखी हो गये - माँ ने अन्तिम समय में एक चीज माँगी और मैं माँ की उस माँग को पूरी नहीं कर सका, इससे बढ़कर मेरे लिये दु:ख की बात और क्या होगी ? पर कुछ भी उपाय नहीं सूझा । रुपयों से मिलने वाली चीज होती तो कोई बात नहीं थी । कलकत्ते या बंगाल में कहीं अंजीर होते नहीं, बाजार में मिलते नहीं। बम्बई से आने में तीन दिन लगते हैं। टेलीफोन भी नहीं, जो सूचना दे दें। तब तक पता नहीं - माता जी जीवित रहें या नहीं, अथवा जीवित भी रहें तो खा सकें या नहीं। कैलास बाबू निराश होकर पड़ गये और मन-ही-मन रोते हुए कहने लगे—'हे भगवन्! क्या मैं इतना अभागा हूँ कि माँ की अन्तिम चाह को पूरी होते नहीं देखूँगा।'

रात के लगभग ग्यारह बजे किसी ने दरवाजा खोलने के लिये बाहर से आवाज दी। डॉक्टर वसु ने समझा, किसी रोगी के यहाँ से बुलावा आया होगा। उनका चित्त बहुत खिन्न था। उन्होंने कह दिया-'इस समय मैं नहीं जा सकूँगा।' बाहर खड़े आदमी ने कहा- 'मैं बुलाने नहीं आया हूँ, एक चीज लेकर आया हूँ-दरवाजा खोलिये।' दरवाजा खोला गया। सुन्दर टोकरी हाथ में लिये एक दरवान ने भीतर आकर कहा-'डॉक्टर साहब! हमारे बाबूजी अभी बम्बई से आये हैं, वे सबेरे ही रंगून चले जायँगे, उन्होंने यह अंजीर की टोकरी भेजी है, वे बम्बई से लाये हैं। मुझसे कहा है कि मैं सबेरे चला जाऊँगा अभी अंजीर दे आओ । इसीलिये मैं अभी लेकर आ गया। कष्ट के लिये क्षमा कीजियेगा ।'

कैलास बाबू अंजीर का नाम सुनते ही उछल पड़े। उन्हें उस समय कितना और कैसा अभूतपूर्व आनन्द हुआ, इसका अनुमान कोई नहीं लगा सकता। उनकी आँखों में हर्षके आँसू आ गये, शरीर में आनन्द से रोमांच हो आया। अंजीर की टोकरी को लेकर वे माताजी के पास पहुँचे और बोले—‘माँ! लो - भगवान् ने अंजीर तुम्हारे लिये भेजे हैं।' उस समय माता का प्रसन्न मुख देखकर कैलास बाबू इतने प्रसन्न हुए, मानो उन्हें जीवन का परम दुर्लभ महान् फल प्राप्त हो गया हो ।

बात यह थी, एक गुजराती सज्जन, जिनका फार्म कलकत्ते और रंगून में भी था, डॉक्टर कैलास बाबू के बड़े प्रेमी थे। वे जब-जब बम्बई से आते, तब अंजीर लाया करते थे। भगवान्‌ के मंगल विधान का आश्चर्य देखिये, कैलास बाबू की मरणासन्न माता आज रात को अंजीर चाहती है और उसकी चाह को पूर्ण करने की व्यवस्था बम्बईमें चार दिन पहले ही हो जाती है और ठीक समय पर में अंजीर कलकत्ते उनके पास आ पहुँचते हैं! एक दिन पीछे भी नहीं, पहले भी नहीं।
           ~~
*इसे कहते हैं कि परमात्मा जिसको जो चीज देना चाहते हैं उसके लिए किसी न किसी को निमित्त बना ही देते हैं।*
*इसलिए यदि कभी किसी की मदद करने को मिल जाये तो अहंकार न कीजियेगा। बस इतना समझ लीजियेगा कि परमात्मा आपको निमित्त बनाकर किसी की सहायता करना चाह रहे हैं।*
*इसका अर्थ ये हुआ कि आप परमात्मा की नजर में हैं।*

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सोमवार, 21 फ़रवरी 2022

चिल्लाओ खुलकर


चिन्तन के पल...
आक्रोश निकाल लो...
शेर को देखिये, आराम से बैठा है लेकिन अचानक ही दहाड़ उठता है। हाथी भी कब चिंघाड़ उठे, पता नहीं चलता। यहाँ तक की कुत्ता भी सोता-सोता भौंकने लगता है! कहने का तात्पर्य यह है कि दुनिया का प्रत्येक प्राणी अपने अन्दर के आक्रोश को प्रतिदिन बाहर निकालता है। लेकिन मनुष्य को हमने सभ्यता का ऐसा पाठ पढ़ाया है कि वह शान्त हो गया है। उसका आक्रोश स्वाभाविक रूप से बाहर निकलना चाहिये था लेकिन उसका दम घोट दिया गया है।

पुरुष तो फिर भी यदा-कदा आक्रोश बाहर निकाल लेता है लेकिन महिला को तो इजाज़त नहीं है। वह तो एक बात अच्छी है कि पति-पत्नी के रिश्ते में यह सहूलियत है कि वह बिना बात के भी झगड़ा कर ले और अपना आक्रोश निकाल ले। श्रीमति अजित गुप्ता के शब्दों में - मैं अक्सर कहती हूँ कि वह पीढ़ी ज़्यादा खुश थी जिसमें मनुष्य बीच चौराहे पर खड़ा होकर ताण्डव कर लेता था। महिला भी गाँव-क़स्बों में पनघट पर झगड़ती हुई मिल ही जाती थी। अब तो सभ्य बनो और मौन रहो। फिर दिल पकड़कर बैठ जाओ।

सभ्यता ने मनुष्य को कुछ भी खुलकर करने की आज़ादी नहीं दी है। वह प्रकृति के विरूद्ध आचरण कर रहा है। प्रकृति में झंझावात भी है, गर्जन-तर्जन भी है, तभी शान्ति आती है। आज मनुष्य दम घोंटे बैठा है, यहाँ तक की बच्चों के सामने भी कुछ बोलने की हिम्मत नहीं जुटा पाता है। टीवी का रिमोट तक वह बच्चों से नहीं ले सकता। पहले बड़े-बूढ़े चिल्लाते ही रहते थे और आज दम साधे चुप बैठे हैं।

कभी हम चिल्ला नहीं पाते और कभी खुलकर हँस भी नहीं सकते! अजीब दुनिया बना डाली है हमने! माना कि प्रकृति भी नियमों से बँधी है लेकिन स्वाभाविक क्रियाएँ कभी रुकती नहीं। हम केवल नियमों से बँधते चले गये और हमने स्वाभाविक क्रियाएँ भी छोड़ दी है। केवल आक्रोश को बाहर नहीं निकाल पाए और कितने रोग अपने अंदर समाहित कर लिये! मेरा मन करता है कि मैं भी शेर की तरह दहाड़ सकूँ या हाथी की तरह चिंघाड़ लूँ। ज्यादा भी नहीं कर सकूँ तो कुत्ते की तरह गुर्रा ही लूँ!
कभी कर के देखिये शायद दिल को थोड़ा आराम मिले।

लेकिन नहीं कर पाते हैं हम! एक मिनट में लड़ाका घोषित हो जाएंगे। सभ्य समाज धिक्कार करेगा। अपनी साख बचाने के लिये सभ्यता का झूठा खोल पहनकर रखना ही पड़ेगा। बस पति-पत्नी कभी एक दूसरे पर गुर्रा लेते हैं, यही अच्छी बात है। यहाँ पर ही थोड़ा मन का गुबार बाहर निकलता है और मन को कुछ राहत मिलती है नहीं तो सारे ही रिश्तों को सभ्यता की आड़ में मौन कहना सिखा दिया है। कभी-कभी लड़ लिया करो मित्रों, मन के द्वार खुल जाते हैं, नहीं तो हम घुटकर रह जाएंगे।

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रविवार, 20 फ़रवरी 2022

दो घड़ी

 

एक नगर में एक धनवान सेठ रहता था। अपने व्यापार के सिलसिले में उसका बाहर आना-जाना लगा रहता था।

एक बार वह परदेस से लौट रहा था। साथ में धन था, इसलिए तीन-चार पहरेदार भी साथ ले लिए।

लेकिन जब वह अपने नगर के नजदीक पहुंचा, तो सोचा कि अब क्या डर। इन पहरेदारों को यदि घर ले जाऊंगा तो भोजन कराना पड़ेगा।

अच्छा होगा, यहीं से विदा कर दूं। उसने पहरेदारों को वापस भेज दिया।

दुर्भाग्य देखिए कि वह कुछ ही कदम आगे बढ़ा कि अचानक डाकुओं ने उसे घेर लिया।

डाकुओं को देखकर सेठ का कलेजा हाथ में आ गया। सोचने लगा, ऐसा अंदेशा होता तो पहरेदारों को क्यों छोड़ता? आज तो बिना मौत मरना पड़ेगा।

डाकू सेठ से उसका धन आदि छीनने लगे।

तभी उन डाकुओं में से दो को सेठ ने पहचान लिया। वे दोनों कभी सेठ की दुकान पर काम कर चुके थे।

उनका नाम लेकर सेठ बोला, अरे! तुम फलां-फलां हो क्या?

अपना नाम सुन कर उन दोनों ने भी सेठ को ध्यानपूर्वक देखा। उन्होंने भी सेठ को पहचान लिया।

उन्हें लगा, इनके यहां पहले नौकरी की थी, इनका नमक खाया है। इनको लूटना ठीक नहीं है।

उन्होंने अपने बाकी साथियों से कहा, भाई इन्हें मत लूटो, ये हमारे पुराने सेठ जी हैं।

यह सुनकर डाकुओं ने सेठ को लूटना बंद कर दिया।

दोनों डाकुओं ने कहा, सेठ जी, अब आप आराम से घर जाइए, आप पर कोई हाथ नहीं डालेगा।

सेठ सुरक्षित घर पहुंच गया। लेकिन मन ही मन सोचने लगा, दो लोगों की पहचान से साठ डाकुओं का खतरा टल गया। धन भी बच गया, जान भी बच गई।
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इस रात और दिन में भी साठ घड़ी होती हैं, अगर दो घड़ी भी अच्छे काम किए जाएं, तो अठावन घड़ियों का दुष्प्रभाव दूर हो सकता है।

इसलिए अठावन घड़ी कर्म की और दो घड़ी धर्म की..!!

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