रविवार, 3 दिसंबर 2023

खरगोश की कहानी

 

खरगोश की कहानी

सदियों से दुनिया को खरगोश और कछुए की कहानी सुनाई जा रही है ।
कछुए और खरगोश में दौड़ हुई । तेज़ दौड़ने वाला खरगोश हार गया । धीरे धीरे रेंगने वाला कछुआ जीत गया । दुनिया को सबक मिला कि Slow n Steady wins the race ....... चलते रहो चलते रहो .....
कभी मत रुको ...... चलते रहो ...... चरैवेति चरैवेति ......

पर आज तक किसी ने खरगोश से न पूछा कि उस दिन आखिर हुआ क्या था ?????
एक दिन मुझे मिल गया वो खरगोश .......एक पेड़ के नीचे लेटा ....... ऊँघता , अलसाता ।
मैंने पूछा , तुम वही हो न ???? जो उस दिन हार गया था कछुए से ?????

हाँ .......मैं वही हूँ ......

क्या हुआ था उस दिन ?

अरे कुछ नही यार । ये आलसी लापरवाह होने की कहानी झूठी है ।
मैं बेतहाशा दौड़ा चला जा रहा था । कछुआ बहुत बहुत पीछे छूट गया था । मुझे पता था मैं बहुत आगे हूँ ..... मैंने सोचा , इस पेड़ के नीचे दो घड़ी सुस्ता लेता हूँ ।
पिछली रात कायदे से सोया नही था ।
Competition की anxiety के कारण नींद ही न आई । बरसों से कछूए की कहानियां सुनाई जा रही थीं मुझे , वो बिना थके चल सकता है , सालों साल चल सकता है ......कभी नही थकता ...... ये ज़िन्दगी एक मैराथन रेस की तरह है ।
मैं उस कछुए को दिखाना चाहता था कि मैं भी तेज दौड़ सकता हूँ और बहुत दूर तक दौड़ सकता हूँ ।
इस पेड़ की छांव कितनी शीतल है ...... मैंने घास बिछा के एक नर्म गुदगुदा बिस्तर बनाया और उसपे लेट गया ....... लेटते ही आँख लग गई ।
स्वप्नलोक में पहुंच गया ।
वहां एक सन्यासी ध्यानमग्न बैठे थे ।
मुझे पास जान उन्होंने आँखें खोली ।
वो मुस्कुराए ।
कौन हो ?????
मैं खरगोश हूँ . दौड़ में हिस्सा ले रहा हूँ । दौड़ लगी हुई है ।
क्यों दौड़ रहे हो ?
जंगल को ये बताने के लिए कि मैं ही सबसे तेज़ दौड़ता हूँ .......
उससे क्या होगा ? तुम जंगल को क्यों बताना चाहते हो कि तुम बहुत तेज़ दौड़ते हो ??? इतना तेज दौड़ के क्या मिलेगा ???

सबसे तेज़ धावक का medal मिलेगा । इज़्ज़त शोहरत मिलेगी .....मान सम्मान होगा ....... पैसा मिलेगा । मैं अच्छा भोजन खाऊंगा ।

अच्छा भोजन तो आज भी है चारों ओर । देखो चारों तरफ कितनी हरियाली है । पेड़ पौधों पे फल फूल लदे हुए हैं ।

जंगल मुझे याद करेगा कि मैं सबसे तेज़ दौड़ने वाला खरगोश था ।

एक हज़ार साल पहले सबसे तेज़ दौड़ने वाले हिरण का नाम याद है तुम्हें ???? या सबसे बड़े हाथी का ??????
सबसे ताकतवर शेर का ?????

नही तो ......

आज तुम्हारा मुकाबला कछुए से है ।
कल हिरण से होगा
परसों घोड़े से .......
किस किस से दौड़ लगाओगे ?????
क्या सारी जिंदगी दौड़ते ही रहोगे ?????
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*शनि-रवि-सोम प्रेरक प्रसंग । यदा कदा तत्कालीन प्रसंग - स्वास्थ्य - हास्य ...*    👉🏼
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अच्छा आज की दौड़ जीतने के बाद क्या करोगे ?????

चैन की बंसी बजाऊंगा । उस विशाल पेड़ की घनी छांव में आराम की नींद सोऊंगा । भंवरे मुझे लोरियां सुनाएंगे । तितलियां गुनगुनाएँगी । मैं उस तालाब में बतख के साथ खेलूंगा ।
चैन की नींद तो तुम अब भी सो रहे हो .......उस बतख के साथ तो तुम अब भी खेल सकते हो ।

मेरी नींद खुल गई ।
सामने देखा तो पक्षी चहचहा रहे थे । मैं तालाब में कूद गया । मुझे बत्तखों ने घेर लिया । मछलियां मेरे साथ अठखेलियाँ करने लगी ।
तभी एक बतख ने याद दिलाया ......हे , तुम्हारी तो दौड़ लगी है न कछुए के साथ ........ तुमको तो दौड़ना है अभी .......

छोड़ो , कुछ नही रखा इस बेकार की दौड़ में .......
मुझे किसी के सामने कुछ prove नही करना .......
मुझे किसी से मुकाबला नही करना .......….
चलो तैरने चलें .........
इस तरह मैंने वो दौड़ छोड़ दी ।

कछुए वाली दौड़ मैं बेशक हार गया , पर ज़िन्दगी की दौड़ में जीत गया हूँ ।

इस दुनिया मे 7 Billion लोग हैं ।
हम किसी को खुश नही रख सकते ।
इस भरी दुनिया मे आप सिर्फ एक आदमी को खुश रख सकते हैं .......खुद को ।

दुनिया को खुश करने के लिए नही , स्वयं को खुश रखने के लिये जियो ।

Fb पे पढ़ी एक पोस्ट का हिंदी रूपांतरण  है ।
मूल रचना अंग्रेज़ी में है ।

शनिवार, 2 दिसंबर 2023

राजा राजेन्द्र चोल प्रथम

 

   हमारा गौरवशाली इतिहास

    इतिहासकारों ने हमारे  इतिहास को केवल 200 वर्षों में ही समेट कर रख दिया है जबकि उन्होंने हमें कभी नहीं बताया कि एक  राजा ऐसा भी था जिसकी सेना में  महिलाएं  कमांडर थी और जिसने अपनी  विशाल  नौकाओं वाली  शक्तिशाली  नौसेना की मदद से पूरे दक्षिण-पूर्व  एशिया पर कब्जा कर लिया था

राजा राजेन्द्र चोल प्रथम (1012-1044) -- वामपंथी इतिहासकारों के साजिशों की भेंट चढ़ने वाला हमारे इतिहास का एक महान शासक

राजा_राजेन्द्र_चोल,  चोल राजवंश के सबसे महान शासक थे उन्होंने अपनी विजयों द्वारा चोल सम्राज्य का विस्तार कर उसे दक्षिण भारत का सर्व शक्तिशाली साम्राज्य बना दिया था । राजेंद्र चोल एकमात्र राजा थे जिन्होंने न केवल अन्य स्थानों पर अपनी विजय का पताका लहराया बल्कि उन स्थानों पर वास्तुकला और प्रशासन की अद्भुत प्रणाली का प्रसार किया जहां उन्होंने शासन किया।

सन 1017 ईसवी में हमारे इस शक्तिशाली नायक ने सिंहल (श्रीलंका) के प्रतापी राजा महेंद्र पंचम को बुरी तरह परास्त करके सम्पूर्ण सिंहल(श्रीलंका) पर कब्जा कर लिया था ।

जहाँ कई महान राजा नदियों के मुहाने पर पहुँचकर अपनी सेना के साथ आगे बढ़ पाने का हिम्मत नहीं कर पाते थे वहीं राजेन्द्र चोल ने एक शक्तिशाली नेवी का गठन किया था जिसकी सहायता से वह अपने मार्ग में आने वाली हर विशाल नदी को आसानी से पार कर लेते थे ।

अपनी इसी नौसेना की बदौलत राजेन्द्र चोल ने अरब सागर स्थित सदिमन्तीक नामक द्वीप पर भी अपना अधिकार स्थापित किया यहाँ तक कि अपने घातक युद्धपोतों की सहायता से कई राजाओं की सेना को तबाह करते हुए राजेन्द्र प्रथम ने जावा, सुमात्रा एवं मालदीव पर अधिकार कर लिया था ।

एक विशाल भूभाग पर अपना साम्राज्य स्थापित करने के बाद उन्होंने (गंगई कोड़ा) चोलपुरम नामक एक नई राजधानी का निर्माण किया था, वहाँ उन्होंने एक विशाल कृत्रिम झील का निर्माण कराया जो सोलह मील लंबी तथा तीन मील चौड़ी थी। यह झील भारत के इतिहास में मानव निर्मित सबसे बड़ी झीलों में से एक मानी जाती है। उस झील में बंगाल से गंगा का जल लाकर डाला गया।

एक तरफ आगरा मे शांहजहाँ के शासन के दौरान भीषण अकाल के बावजूद इतिहासकार उसकी प्रशंसा में इतिहास के पन्नों को भरने में लगे रहे दूसरी तरफ जिस राजेन्द्र चोल के अधीन दक्षिण भारत एशिया में समृद्धि और वैभव का प्रतिनिधित्व कर रहा था उसके बारे में हमारे इतिहास की किताबें एक साजिश के तहत खामोश रहीं ।

यहाँ तक कि बंगाल की खाड़ी जो कि दुनिया की सबसे बड़ी खाड़ी है इसका प्राचीन नाम चोला झील था, यह सदियों तक अपने नाम से चोल की महानता को बयाँ करती रही, बाद में यह कलिंग सागर में बदल दिया गया गया और फिर ब्रिटिशर्स द्वारा बंगाल की खाड़ी में परिवर्तित कर दिया गया, वाम इतिहासकारों ने हमेशा हमारे नायकों के इतिहास को नष्ट करने की साजिश रची और हमारे मंदिरों और संस्कृति को नष्ट करने वाले मुगल आक्रांताओं के बारे में पढ़ाया, राजेन्द्र चोल की सेना में कमांडर के पद पर कुछ महिलाएं भी थी, सदियों बाद मुगलों का एक ऐसा वक्त आया जब महिलाएं पर्दे के पीछे चली गईं ।

हममें से बहुत से लोगों को चोल राजवंश और मातृभूमि के लिए उनके योगदान के बारे में नहीं पता है। मैंने इतिहास के अलग-अलग स्रोतों से अपने इस महान नायक के बारे में जाने की कोशिश की और मुझे महसूस हुआ कि अपने इस स्वर्णिम इतिहास के बारे में आपको भी जानने का हक है
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रविवार, 26 नवंबर 2023

कहानी नमक का धर्म


  कहानी

अम्मा नून कम है तरकारी में ।
चूल्हे के पास बैठा टुकुन खाने का पहला
निवाला मुंह में रखते हुए बोल पड़ा ।

"दे रहे हैं रुको ।
" अम्मा ने इतना कहते हुए नमक के डिब्बे में
हाथ लगाया तो टुकुन ने हाथ आगे कर दिया ।

"नहीं हाथ में नहीं देंगे ।
" इतना कह कर अम्मा ने थाली में नमक रख दिया ।

"हाथ में काहे नहीं ?
" खाने को छोड़ अम्मा की तरफ अपनी बड़ी बड़ी
आंखों से घूरता हुआ टुकुन बोला। 

"हाथ में नून देने से सब धरम चला जाता है ।
" रोटी सेकती हुई अम्मा ने जवाब दिया ।

"कहां चला जाता है ?
" वो अब भी अम्मा को घूर रहा था ।

"हम तुमको नून देंगे तो हमारा धरम
तुमको चला जाएगा ।"

"तो उससे का होगा ?
" टुकुन की तरफ देखते हुए मां के
हाथ पर सेक लग गया ।

वो तड़पते हुए बोली
"तुम्हारी बतकही में हाथ जल गया ।
चलो चुपचाप खाना खाओ ।
" टुकुन ने इसी के साथ अम्मा के हाथ से
मार भी खा ली ।

अब जब मां टुकुन को नमक देती वो जान बूझ कर
हाथ आगे करता और मां के हाथ पर नमक ना
रखने पर यही सवाल पूछता।
मां अब उसके इस सवाल से चिढ़ने लगी थी ।
लेकिन समय बीतने के साथ टुकुन ने ये
सवाल पूछना छोड़ दिया ।
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गरीब की ज़िंदगी सांप सीढ़ी के खेल जैसी है ।
कब ऊंचाई छूती खुशियों को मुसीबतों का सांप
डस ले और कब गरीब आसमान से सीधा ज़मीन पर
आ पहुंचे कह नहीं सकते ।

इधर भी यही हुआ ।
एक दिन अम्मा बीमार पड़ गयी ।
टुकुन का परिवार जो कम में ही खुश था
आज मुसीबतों के पहाड़ तले दब गया ।
टुकुन के पिता ने अपनी हैसीयत के हिसाब से
आसपास के सभी डॉक्टरों को दिखाया लेकिन
उसकी हालत में कुछ खास सुधार नहीं आ रहा था ।

टुकुन की अम्मा की बिगड़ती हालत और बढ़ रहे
कर्जे की मार उसके पिता की हिम्मत और
उसकी उम्मीदों को तोड़ रही थी ।

एक दिन टुकुन अपनी अम्मा के सिरहाने
जा कर बैठ गया ।

"अम्मा तुमको क्या हो गया ।
" अम्मा को एक टक देखता टुकुन बोला ।

"कुछो नहीं बबुआ, बस थोड़ा बीमार हैं ।
जल्दी ठीक हो जाएंगे ।
" टुकुन की तरफ देख कर जबरदस्ती
मुस्कुराते हुए अम्मा ने जवाब दिया ।

"बीमार कइसे होते हैं अम्मा ?"

"ई सब करम का खेल है बाबू ।
किए होंगे कोनो पाप जिसका सजा भोग रहे हैं ।"

हम भारतीयों के लिए हमारी पीड़ा का कारण हमेशा हमारे किये गये पापों को ही माना जाता है।
शायद गरीबी ही सबसे बड़ा पाप है
इसीलिए गरीब को ही सबसे ज़्यादा
सज़ा भी मिलती है ।

"जाओ देखो पपा खाना बना लिए हों तो
ले के खा लो ।
" अम्मा टुकुन के सामने रोना नहीं चाहती थी ।
टुकुन एकदम शांत था ।
शायद कुछ सोच रहा था ।
वो अक्सर यही करता था ।
जब कोई बात उसके मन में गड़ जाती तो
वो तब तक सोचता जब तक उसका
नन्हा दिमाग कोई निष्कर्ष ना निकाल ले ।

शायद टुकुन ने सोच लिया था इसीलिए
भागता हुआ चूल्हे के पास गया और
जब तक उसके पिता उसे खाना खाने को
कहते तब तक भागता हुआ फिर अम्मा के पास
पहुंच गया ।

"अम्मा हाथ दो।"

"क्या हुआ ?"

"हाथ दो ना ।"

"क्यों तंग कर रहा है टुकुन ।
जा के खाना खा ले।
" कमज़ोरी की वजह से चिढ़चिढ़ी हो चुकी
अम्मा ने थोड़ा चिढ़ कर कहा ।

"अम्मा एक बार हाथ दो ना ।"

"ये ले ।
" अम्मा जानती थी कि टुकुन बहुत ज़िदी है
जब तक वो हाथ ना आगे करेगी तब तक
वो कहीं नहीं जाएगा ।
इसीलिए उसने हाथ आगे कर दिए ।
अम्मा की खुली हथेली पर टुकुन ने अपनी
नन्हीं सी मुट्ठी खोल दी ।
मुट्ठी में समाया सारा नमक अम्मा की
हथेली पर जमा हो गया ।

"अम्मा अब हम तुमको अपना सारा धरम दे दिए हैं। तुम्हारा सारा पाप कट जाएगा और तुम बहुत जल्दी
ठीक हो जाओगी ।
" टुकुन के चेहरे पर संतोष था और मां की
आंखों में हैरानी, करुणा, स्नेह मिले आंसू ।

अम्मा समझ नहीं पा रही थी इस पर टुकुन से क्या कहे । उसने टुकुन को करीब बुलाया और सीने से लगा लिया । टुकुन के पिता दूर से ये सब देख कर मुस्कुराते रहे थे ।

नमक से कुछ हो ना हो लेकिन अपने लिए
बेटे के मन में ये इतना स्नेह और फिक्र देख कर
अम्मा के अंदर की आधी बीमारी तो क्षण भर में
ठीक हो गयी थी ।

बच्चे सच में आधा दुःख हर लेते हैं 😊

रविवार, 19 नवंबर 2023

कहानी उस्ताद की

 

कहानी

वह बड़े इत्मीनान से गुरु के सामने खड़ा था। गुरु अपनी पारखी नजर से उसका परीक्षण कर रहे थे। नौ दस साल का छोकरा। बच्चा ही समझो। उसे बांया हाथ नहीं था। किसी बैल से लड़ाई में टूट गया था।

"तुझे क्या चाहिए मुझसे?" गुरु ने उस बच्चे से पूछा।

उस बच्चे ने गला साफ किया। हिम्मत जुटाई और कहा, " मुझे आप से कुश्ती सीखनी है।

एक हाथ नहीं और कुश्ती लड़नी है ? अजीब बात है।

"क्यूं ?"

"स्कूल में बाकी लड़के सताते है मुझे और मेरी बहन को। टुंडा कहते है मुझे। हर किसी की दया की नजर ने मेरा जीना हराम कर दिया है गुरुजी। मुझे अपनी हिम्मत पर जीना है। किसी की दया नहीं चाहिए। मुझे खुद की और मेरे परिवार की रक्षा करनी आनी चाहिए।"

"ठीक बात। पर अब मै बूढ़ा हो चुका हूं और किसी को नहीं सिखाता। तुझे किसने भेजा मेरे पास?"

"कई शिक्षकों के पास गया मैं। कोई भी मुझे सिखाने तैयार नहीं। एक बड़े शिक्षक ने आपका नाम बताया और कहा 'वे ही सीखा सकते है क्योंकि उनके पास वक्त ही वक्त है और कोई सीखने वाला भी नहीं है ऐसा बोले वे मुझे।"

गुरूर से भरा जवाब किसने दिया होगा यह उस्ताद समझ गए। ऐसे अहंकारी लोगो की वजह से ही खल प्रवृत्ति के लोग इस खेल में आ गए यह बात उस्ताद जानते थे।

"ठीक है। कल सुबह पौ फटने से पहले अखाड़े में पहुंच जा। मुझसे सीखना आसान नहीं है यह पहले ही बोल देता हूं। कुश्ती एक जानलेवा खेल है। इसका इस्तेमाल अपनी रक्षा के लिए करना। मैं जो सिखाऊं उस पर पूरा भरोसा रखना। और इस खेल का नशा चढ़ जाता है आदमी को। तो सिर ठंडा रखना। समझा?"

"जी उस्ताद। समझ गया। आपकी हर बात का पालन करूंगा। मुझे आपका चेला बना लीजिए।" मन की मुराद पूरी हो जाने के आंसू उस बच्चे की आंखो में छलक गए। उसने गुरु के पांव छू कर आशीष लिया।

अपने एक ही चेले को सिखाना उस्ताद ने शुरू किया। मिट्टी रोंदी, मुगदर से धूल झड़कायी और इस एक हाथ के बच्चे को कैसे विद्या देनी है इसका सोचते सोचते उस्ताद की आंख लग गई।
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*आप भी कम्यूनिटी में परिचित को जोड़ सकते हैं ।।*
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एक ही दांव उस्ताद ने उसे सिखाया और रोज़ उसकी ही तालीम बच्चे से करवाते रहे। छह महीने तक रोज बस एक ही दांव। एक दिन चेले ने उस्ताद के जन्मदिन पर पांव दबाते हुए हौले से बात को छेड़ा।

"गुरुजी, छह महीने बीत गए, इस दांव की बारीकियां अच्छे से समझ गया हूं और कुछ नए दांव पेंच भी सिखाइए ना। "

उस्ताद वहां से उठकर चल दिए। बच्चा परेशान हो गया कि गुरु को उसने नाराज़ कर दिया।

फिर उस्ताद की बात पर भरोसा करके वह सीखता रहा। उसने कभी नहीं पूछा कि और कुछ सीखना है।

गांव में कुश्ती की प्रतियोगिता आयोजित की गई। बड़े बड़े इनाम थे उसमें। हरेक अखाड़े के चुने हुए पहलवान प्रतियोगिता में शिरकत करने आए। उस्ताद ने चेले को बुलाया। "कल सुबह बैल जोत के रख गाड़ी को। पास के गांव जाना है। सुबह कुश्ती लड़नी है तुझे।"

पहली दो कुश्ती इस बिना हाथ के बच्चे ने यूं ही जीत ली। जिस घोड़े के आखिरी नंबर पर आने की उम्मीद हो और वह रेस जीत जाए तो रंग उतरता है वैसा सारे विरोधी उस्तादों का मुंह उतर गया। देखने वाले अचरज में पड़ गए। एक हाथ का बच्चा कुश्ती में जीत ही कैसे सकता है? किसने सिखाया इसे?"

अब तीसरी कुश्ती में सामने वाला खिलाड़ी नौसिखिया नहीं था। पुराना जांबाज़। पर अपने साफ सुथरे हथकंडों से और दांव का सही तोड़ देने से यह कुश्ती भी बच्चा जीत गया।

अब इस बच्चे का आत्मविश्वास बढ़ गया। पूरा मैदान भी अब उसके साथ हो गया था। मैं भी जीत सकता हूं, यह भावना उसे मजबूत बना रही थी।

देखते ही देखते वह अंतिम बाज़ी तक पहुंच गया।

जिस अखाड़े वाले ने उस बच्चे को इस बूढ़े उस्ताद के पास भेजा था, उस अहंकारी पहलवान का चेला ही इस बच्चे का आखिरी कुश्ती में प्रतिस्पर्धी था।

यह पहलवान उसकी उम्र का होने के बावजूद शक्ति और अनुभव में इस बच्चे से श्रेष्ठ था। कई मैदान मार लिए थे उसने। इस बच्चे को वह मिनटों में चित कर देगा यह स्पष्ट था। पंचों ने राय मशवरा किया।

"यह कुश्ती कराना सही नहीं होगा। कुश्ती बराबरी वालों में होती है। यह कुश्ती मानवता और समानता के अनुसार रद्द किया जाता है। इनाम दोनों में बराबरी से बांटा जाएगा।" पंचों ने अपना मंतव्य प्रकट किया।

"मैं इस कल के छोकरे से कई ज्यादा अनुभवी हूं और ताकतवर भी। मैं ही ये कुश्ती जीतूंगा यह बात सोलह आने सच है। तो इस कुश्ती का विजेता मुझे बनाया जाए।" वह प्रतिस्पर्धी अहंकार में बोला।

"मैं नया हूं और बड़े भैया से अनुभव में छोटा भी। मेरे उस्ताद ने मुझे ईमानदारी से खेलना सिखाया है। बिना खेले जीत जाना मेरे उस्ताद की तौहीन है। मुझे खेल कर मेरे हक का जो है उसे दीजिए। मुझे ये भीख नहीं चाहिये।" उस बांके जवान की स्वाभिमान भरी बात सुन कर जनता ने तालियों की बौछार कर दी।

ऐसी बातें सुनने को अच्छी पर नुकसानदेह होती है। पंच हतोत्साहित हो गए। कुछ कम ज्यादा हो गया तो? पहले ही एक हाथ खो चुका है अपना और कुछ नुकसान ना हो जाए? मूर्ख कहीं का!

लड़ाई शुरू हुई।

और सभी उपस्थित अचंभित रह गए। सफाई से किए हुए वार और मौके की तलाश में बच्चे का फेंका हुआ दांव उस बलाढ्य प्रतिस्पर्धी को झेलते नहीं बना। वह मैदान के बाहर औंधे मुंह पड़ा था। कम से कम परिश्रम में उस नौसिखिए बच्चे ने उस पुराने महारथी को धूल चटा दी थी।

अखाड़े में पहुंच कर चेले ने अपना मेडल निकाल कर उस्ताद के पैरो में रख दिया। अपना सिर उस्ताद के पैरों की धूल माथे लगा कर मिट्टी से सना लिया।

"उस्ताद, एक बात पूछनी थी। "

"पूछ।"

"मुझे सिर्फ एक ही दांव आता है। फिर भी मैं कैसे जीता?"

"तू दो दांव सीख चुका था। इस लिए जीत गया।"

"कौन से दो दांव उस्ताद?"

पहली बात, तू यह दांव इतनी अच्छी तरह से सीख चुका था कि उसमे गलती होने की गुंजाइश ही नहीं थी। तुझे नींद में भी लड़ाता तब भी तू इस दांव में गलती नहीं करता। तुझे यह दांव आता है यह बात तेरा प्रतिद्वंदी जान चुका था, पर तुझे सिर्फ यही दांव आता है यह बात थोड़ी उसे मालूम थी?"

"और दूसरी बात क्या थी उस्ताद? "

"दूसरी बात ज्यादा महत्व रखती है। हरेक दांव का एक प्रतिदांव होता है। ऐसा कोई दांव नहीं है जिसका तोड़ ना हो। वैसे ही इस दांव का भी एक तोड़ था।"

"तो क्या मेरे प्रतिस्पर्धी को वह दांव मालूम नहीं होगा?"

"उसे मालूम था। पर वह कुछ नहीं कर सका। जानते हो क्यूं ?… क्योंकि उस तोड़ में दांव देने वाले का दूसरा हाथ पकड़ना पड़ता है। तेरे दूसरा हाथ था ही नहीं, जिसे वह पकड़ सकता।

अब आपके समझ में आया होगा कि एक बिना हाथ का साधारण सा लड़का विजेता कैसे बना?

जिस बात को हम अपनी कमजोरी समझते हैं, उसी को जो हमारी शक्ति बना कर जीना सिखाता है, विजयी बनाता है, वही सच्चा गुरु है।

अंदर से हम कहीं ना कहीं कमजोर होते है, दिव्यांग होते है। उस कमजोरी को मात दे कर जीने की कला सिखाने वाला गुरु हमें चाहिए।

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