रविवार, 5 नवंबर 2023

कथा पलटूराम बाबा की

 

कथा
(पढ़ते पढ़ते मेरी आंखे छलक पड़ी) ।।

श्री अयोध्या जी में 'कनक भवन' एवं 'हनुमानगढ़ी' के बीच में एक आश्रम है जिसे 'बड़ी जगह' अथवा 'दशरथ महल' के नाम से जाना जाता है।

काफी पहले वहाँ एक सन्त रहा करते थे जिनका नाम था श्री रामप्रसाद जी। उस समय अयोध्या जी में इतनी भीड़ भाड़ नहीं होती थी। ज्यादा लोग नहीं आते थे।
श्री रामप्रसाद जी ही उस समय बड़ी जगह के कर्ता धर्ता थे। वहाँ बड़ी जगह में मन्दिर है जिसमें पत्नियों सहित चारों भाई (श्री राम, श्री लक्ष्मण, श्री भरत एवं श्री शत्रुघ्न जी) एवं हनुमान जी की सेवा होती है। चूंकि सब के सब फक्कड़ सन्त थे... तो नित्य मन्दिर में जो भी थोड़ा बहुत चढ़ावा आता था उसी से मन्दिर एवं आश्रम का खर्च चला करता था।

प्रतिदिन मन्दिर में आने वाला सारा चढ़ावा एक बनिए (जिसका नाम था पलटू बनिया) को भिजवाया जाता था। उसी धन से थोड़ा बहुत जो भी राशन आता था... उसी का भोग-प्रसाद बनकर भगवान को भोग लगता था और जो भी सन्त आश्रम में रहते थे वे खाते थे।
एक बार प्रभु की ऐसी लीला हुई कि मन्दिर में कुछ चढ़ावा आया ही नहीं। अब इन साधुओं के पास कुछ जोड़ा गांठा तो था नहीं... तो क्या किया जाए...? कोई उपाय ना देखकर श्री रामप्रसाद जी ने दो साधुओं को पलटू बनिया के पास भेज के कहलवाया कि भइया आज तो कुछ चढ़ावा आया नहीं है...
अतः
थोड़ा सा राशन उधार दे दो... कम से कम भगवान को भोग तो लग ही जाए। पलटू बनिया ने जब यह सुना तो उसने यह कहकर मना कर दिया कि मेरा और महन्त जी का लेना देना तो नकद का है... मैं उधार में कुछ नहीं दे पाऊँगा।
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श्री रामप्रसाद जी को जब यह पता चला तो "जैसी भगवान की इच्छा" कहकर उन्होंने भगवान को उस दिन जल का ही भोग लगा दिया। सारे साधु भी जल पी के रह गए। प्रभु की ऐसी परीक्षा थी कि रात्रि में भी जल का ही भोग लगा और सारे साधु भी जल पीकर भूखे ही सोए। वहाँ मन्दिर में नियम था कि शयन कराते समय भगवान को एक बड़ा सुन्दर पीताम्बर ओढ़ाया जाता था तथा शयन आरती के बाद श्री रामप्रसाद जी नित्य करीब एक घण्टा बैठकर भगवान को भजन सुनाते थे। पूरे दिन के भूखे रामप्रसाद जी बैठे भजन गाते रहे और नियम पूरा करके सोने चले गए।

धीरे-धीरे करके रात बीतने लगी। करीब आधी रात को पलटू बनिया के घर का दरवाजा किसी ने खटखटाया। वो बनिया घबरा गया कि इतनी रात को कौन आ गया। जब आवाज सुनी तो पता चला कुछ बच्चे दरवाजे पर शोर मचा रहे हैं, 'अरे पलटू... पलटू सेठ... अरे दरवाजा खोल...।'

उसने हड़बड़ा कर खीझते हुए दरवाजा खोला। सोचा कि जरूर ये बच्चे शरारत कर रहे होंगे... अभी इनकी अच्छे से डांट लगाऊँगा। जब उसने दरवाजा खोला तो देखता है कि चार लड़के जिनकी अवस्था बारह वर्ष से भी कम की होगी... एक पीताम्बर ओढ़ कर खड़े हैं।

वे चारों लड़के एक ही पीताम्बर ओढ़े थे। उनकी छवि इतनी मोहक... ऐसी लुभावनी थी कि ना चाहते हुए भी पलटू का सारा क्रोध प्रेम में परिवर्तित हो गया और वह आश्चर्य से पूछने लगा,
'बच्चों...! तुम हो कौन और इतनी रात को क्यों शोर मचा रहे हो...?'
बिना कुछ कहे बच्चे घर में घुस आए और बोले, हमें रामप्रसाद बाबा ने भेजा है। ये जो पीताम्बर हम ओढ़े हैं... इसका कोना खोलो... इसमें सोलह सौ रुपए हैं... निकालो और गिनो।' ये वो समय था जब आना और पैसा चलता था। सोलह सौ उस समय बहुत बड़ी रकम हुआ करती थी।

     जल्दी जल्दी पलटू ने उस पीताम्बर का कोना खोला तो उसमें सचमुच चांदी के सोलह सौ सिक्के निकले। प्रश्न भरी दृष्टि से पलटू बनिया उन बच्चों को देखने लगा। तब बच्चों ने कहा, 'इन पैसों का राशन कल सुबह आश्रम भिजवा देना।'

अब पलटू बनिया को थोड़ी शर्म आई, 'हाय...! आज मैंने राशन नहीं दिया... लगता है महन्त जी नाराज हो गए हैं... इसीलिए रात में ही इतने सारे पैसे भिजवा दिए।' पश्चाताप, संकोच और प्रेम के साथ उसने हाथ जोड़कर कहा, 'बच्चों...! मेरी पूरी दुकान भी उठा कर मैं महन्त जी को दे दूँगा तो भी ये पैसे ज्यादा ही बैठेंगे। इतने मूल्य का सामान देते-देते तो मुझे पता नहीं कितना समय लग जाएगा।'

बच्चों ने कहा, 'ठीक है... आप एक साथ मत दीजिए... थोड़ा-थोड़ा करके अब से नित्य ही सुबह-सुबह आश्रम भिजवा दिया कीजिएगा... आज के बाद कभी भी राशन के लिए मना मत कीजिएगा।' पलटू बनिया तो मारे शर्म के जमीन में गड़ा जाए।

वो फिर हाथ जोड़कर बोला, 'जैसी महन्त जी की आज्ञा।' इतना कह सुन के वो बच्चे चले गए लेकिन जाते जाते पलटू बनिया का मन भी ले गए।

इधर सवेरे सवेरे मंगला आरती के लिए जब पुजारी जी ने मन्दिर के पट खोले तो देखा भगवान का पीताम्बर गायब है। उन्होंने ये बात रामप्रसाद जी को बताई और सबको लगा कि कोई रात में पीताम्बर चुरा के ले गया। जब थोड़ा दिन चढ़ा तो गाड़ी में ढेर सारा सामान लदवा के कृतज्ञता के साथ हाथ जोड़े हुए पलटू बनिया आया और सीधा रामप्रसाद जी के चरणों में गिरकर क्षमा माँगने लगा।

रामप्रसाद जी को तो कुछ पता ही नहीं था। वे पूछें, 'क्या हुआ... अरे किस बात की माफी मांग रहा है।' पर पलटू बनिया उठे ही ना और कहे, 'महाराज रात में पैसे भिजवाने की क्या आवश्यकता थी... मैं कान पकड़ता हूँ आज के बाद कभी भी राशन के लिए मना नहीं करूँगा और ये रहा आपका पीताम्बर... वो बच्चे मेरे यहाँ ही छोड़ गए थे... बड़े प्यारे बच्चे थे... इतनी रात को बेचारे पैसे लेकर आ भी गये...

     आप बुरा ना मानें तो मैं एक बार उन बालकों को फिर से देखना चाहता हूँ।' जब रामप्रसाद जी ने वो पीताम्बर देखा तो पता चला ये तो हमारे मन्दिर का ही है जो गायब हो गया था। अब वो पूछें कि, 'ये तुम्हारे पास कैसे आया?' तब उस बनिया ने रात वाली पूरी घटना सुनाई।
अब तो रामप्रसाद जी भागे जल्दी से और सीधा मन्दिर जाकर भगवान के पैरों में पड़कर रोने लगे कि, 'हे भक्तवत्सल...! मेरे कारण आपको आधी रात में इतना कष्ट उठाना पड़ा और कष्ट उठाया सो उठाया मैंने जीवन भर आपकी सेवा की... मुझे तो दर्शन ना हुआ... और इस बनिए को आधी रात में दर्शन देने पहुँच गए।'

जब पलटू बनिया को पूरी बात पता चली तो उसका हृदय भी धक् से होके रह गया कि जिन्हें मैं साधारण बालक समझ बैठा वे तो त्रिभुवन के नाथ थे... अरे मैं तो चरण भी न छू पाया। अब तो वे दोनों ही लोग बैठ कर रोएँ। इसके बाद कभी भी आश्रम में राशन की कमी नहीं हुई। आज तक वहाँ सन्त सेवा होती आ रही है। इस घटना के बाद ही पलटू बनिया को वैराग्य हो गया और यह पलटू बनिया ही बाद में श्री पलटूदास जी के नाम से विख्यात हुए।

श्री रामप्रसाद जी की व्याकुलता उस दिन हर क्षण के साथ बढ़ती ही जाए और रात में शयन के समय जब वे भजन गाने बैठे तो मूर्छित होकर गिर गए। संसार के लिए तो वे मूर्छित थे किन्तु मूर्च्छावस्था में ही उन्हें पत्नियों सहित चारों भाइयों का दर्शन हुआ और उसी दर्शन में श्री जानकी जी ने उनके आँसू पोंछे तथा अपनी ऊँगली से इनके माथे पर बिन्दी लगाई जिसे फिर सदैव इन्होंने अपने मस्तक पर धारण करके रखा। उसी के बाद से इनके आश्रम में बिन्दी वाले तिलक का प्रचलन हुआ।
वास्तव में प्रभु चाहें तो ये अभाव... ये कष्ट भक्तों के जीवन में कभी ना आए परन्तु प्रभु जानबूझकर इन्हें भेजते हैं ताकि इन लीलाओं के माध्यम से ही जो अविश्वासी जीव हैं... वे सतर्क हो जाएं... उनके हृदय में विश्वास उत्पन्न हो सके।जैसे प्रभु ने आकर उनके कष्ट का निवारण किया ऐसे ही हमारा भी कर दे..!!
‼️🙏जय सियाराम🙏‼️

शनिवार, 4 नवंबर 2023

राम फिर से आएंगे, आते रहेंगे

 

भगवान राम जानते थे कि उनकी मृत्यु का समय हो गया है। वह जानते थे कि जो जन्म लेता है उसे मरना ही पड़ता है। यही जीवन चक्र है। और मनुष्य देह की सीमा और विवशता भी यही है।

उन्होंने कहा...
“यम को मुझ तक आने दो। बैकुंठ धाम जाने का समय अब आ गया है”

मृत्यु के देवता यम स्वयं अयोध्या में घुसने से डरते थे। क्योंकि उनको राम के परम भक्त और उनके महल के मुख्य प्रहरी हनुमान से भय लगता था। उन्हें पता था कि हनुमानजी के रहते यह सब आसान नहीं।

भगवान श्रीराम इस बात को अच्छी तरह से समझ गए थे कि, उनकी मृत्यु को अंजनी पुत्र कभी स्वीकार नहीं कर पाएंगे, और वो रौद्र रूप में आ गए, तो समस्त धरती कांप उठेगी।

उन्होंने सृष्टि के रचयिता भगवान ब्रह्मा से इस विषय मे बात की। और अपने मृत्यु के सत्य से अवगत कराने के लिए राम जी ने अपनी अंगूठी को महल के फर्श के एक छेद में से गिरा दिया!

और हनुमान से इसे खोजकर लाने के लिए कहा।  हनुमान ने स्वयं का स्वरुप छोटा करते हुए बिल्कुल भंवरे जैसा आकार बना लिया...और अंगूठी को तलाशने के लिये उस छोटे से छेद में प्रवेश कर गए। वह छेद केवल छेद नहीं था, बल्कि एक सुरंग का रास्ता था, जो पाताल लोक के नाग लोक तक जाता था। हनुमान नागों के राजा वासुकी से मिले और अपने आने का कारण बताया।

वासुकी हनुमान को नाग लोक के मध्य में ले गए,   जहाँ पर ढेर सारी अंगूठियों का ढेर लगा था। वहां पर अंगूठियों का जैसे पहाड़ लगा हुआ था।

“यहां देखिए, आपको श्री रामकी अंगूठी अवश्य ही मिल जाएगी” वासुकी ने कहा।

हनुमानजी सोच में पड़ गए कि वो कैसे उसे ढूंढ पाएंगे? यह भूसे में सुई ढूंढने जैसा था। लेकिन उन्हें राम जी की आज्ञा का पालन करना ही था। तो राम जी का नाम लेकर उन्होंने अंगूठी को ढूंढना शुरू किया।

सौभाग्य कहें या राम जी का आशीर्वाद या कहें हनुमान जी की भक्ति...उन्होंने जो पहली अंगूठी उठाई, वो राम जी की ही अंगूठी थी। उनकी खुशी का ठिकाना न रहा। वो अंगूठी लेकर जाने को हुए, तब उन्हें सामने दिख रही एक और अंगूठी जानी पहचानी सी लगी।

पास जाकर देखा तो वे आश्चर्य से भर गए! दूसरी भी अंगूठी जो उन्होंने उठाई वो भी राम जी की ही अंगूठी थी। इसके बाद तो वो एक के बाद एक अंगूठीयाँ उठाते गए, और हर अंगूठी श्री राम की ही निकलती रही।

उनकी आँखों से अश्रु धारा फूट पड़ी!

' वासुकी यह प्रभु की कैसी माया है ? यह क्या हो रहा है? प्रभु क्या चाहते हैं?

वासुकी मुस्कुराए और बोले,

“जिस संसार में हम रहते है, वो सृष्टि व विनाश के चक्र से गुजरती है। जो निश्चित है। जो अवश्यम्भावी है। इस संसार के प्रत्येक सृष्टि चक्र को एक कल्प कहा जाता है। हर कल्प के चार युग या चार भाग होते हैं।

हर बार कल्प के दूसरे युग मे अर्थात त्रेता युग में, राम अयोध्या में जन्म लेते हैं। एक वानर इस अंगूठी का पीछा करता है...यहाँ आता है और हर बार पृथ्वी पर राम मृत्यु को प्राप्त होते हैं।

इसलिए यह सैकड़ों हजारों कल्पों से चली आ रही अंगूठियों का ढेर है। सभी अंगूठियां वास्तविक हैं। सभी श्री राम की ही है। अंगूठियां गिरती रहीं है...और इनका ढेर बड़ा होता रहा।

भविष्य के रामों की अंगूठियों के लिए भी यहां पर्याप्त स्थान है”।

हनुमान एकदम शांत हो गए। और तुरन्त समझ गए कि, उनका नाग लोक में प्रवेश और अंगूठियों के पर्वत से साक्षात्कार कोई आकस्मिक घटी घटना नहीं थी। बल्कि यह प्रभु राम का उनको समझाने का मार्ग था कि, मृत्यु को आने से रोका नहीं जा सकता। राम मृत्यु को प्राप्त होंगे ही। पर राम वापस आएंगे...यह सब फिर दोहराया जाएगा।

यही सृष्टि का नियम है, हम सभी बंधे हैं इस नियम से। संसार समाप्त होगा। लेकिन हमेशा की तरह, संसार पुनः बनता है और राम भी पुनः जन्म लेंगे।

प्रभु राम आएंगे...उन्हें आना ही है...उन्हें आना ही होगा।
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रविवार, 29 अक्टूबर 2023

कहानी दाई मां की

 

कहानी

कानी दाई माँ

मिस्टर मेहरा बहुत बड़े बिजनिस मैन थे। उनका एक एक मिनिट कीमती था। वो इस वक्त बहुत इरिटेड हो रहे थे और झूंझल खा रहे थे। वो कैसी भी परिस्थिति में पेरिस से इंडिया नहीँ आना चाहते थे। एक तो पेरिस में उनकी बिजनिस मीटिंग्स का शिड्यूल इतना टाइट था कि उनके बीच में समय निकालने का मतलब था अपना ढेर सारा नुकसान करना। दूसरा कोई ऐसा कारण भी नहीँ था कि जिसके लिए इंडिया आया जाए। अब उनकी दाई माँ बीमार पड़ गयीं तो वो क्या करें ? कितने ही डॉक्टर हैं इंडिया में। अपना इलाज करवा लें। उनका फेमिली डॉक्टर ही बहुत काबिल है। उन्हें इंडिया बुलाने की क्या ज़रूरत है ? दाई माँ पिछले पंद्रह सालों में उन्हें पच्चीस बार इंडिया बुला चुकी, मगर व्यस्तता के कारण वो एक बार भी नहीं गए।

मिस्टर मेहरा को याद आया कि जब वो छह या सात साल के थे तब एक कार एक्सीडेंट में उनकी माँ और पिताजी दोनों की डेथ हो गयी थी। वो खुद भी बुरी तरह जख्मी हो गये थे। उनकी दाई माँ, जो उनके जन्म लेने के वक्त से ही उनकी देखभाल करती थीं, और कार में साथ थीं, की एक आंख पूरी खराब हो गयी थी। उनके मम्मी पापा के गुज़र जाने के बाद दाई माँ ने ही उन्हें पाला था। मगर एक आंख वाली दाई माँ से मिस्टर मेहरा को हमेशा डर लगता था। वो उसे देख कर चीख पड़ते थे और उससे दूर दूर ही रहते थे। एक बार स्कूल में किसी दिन दाई माँ उन्हें लेने गयी तो क्लास के और बच्चे भी उन्हें देख कर डर गये। तब मिस्टर मेहरा ने उन्हें कह दिया था कि वो उनके सामने कभी न आएं। एक आँख वाली दाई माँ उसके बाद उनके सामने कभी आयी भी नहीँ। वो दूर दूर से ही उनके सारे काम करती थी। टिफिन बनाना, स्कूल ड्रेस रखना, नहाने का पानी रखना, खाना बनाना, बना कर रखना ये सारे काम वो मिस्टर मेहरा को अपना चेहरा दिखाए बिना करती थीं। कभी अपने हाथों में पाले गए बच्चे से उन्हें प्यार करना होता था तो वो मिस्टर मेहरा की फोटो को ही कर लिया करती थी। मिस्टर मेहरा के मम्मी पापा के गुज़र जाने के 12 साल तक मिस्टर मेहरा को उनकी दाई माँ ने ऐसे ही पाला। मिस्टर मेहरा उन्हें कानी दाई माँ कहते थे। जब कभी भी गलती से वो कानी दाई माँ का चेहरा देख लेते थे तो चार पांच रातें डर के मारे उन्हें नींद नहीं आती थी।
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पापा के बैंक में छोड़े हुए पैसे से मिस्टर मेहरा बीस साल की उम्र में विदेश आ गए और एक सफल बिजनिस मैन बन गए। 20 साल की उम्र अब 35 साल हो गयी। इन पंद्रह सालों में पच्चीस बार कानी दाई माँ को मना करने वाले मिस्टर मेहरा आज भी इंडिया जाने के लिए मना करने वाले थे मगर उनके फैमिली डॉक्टर का फोन आया। उसने कहा, 'इस बार कुछ अर्जेंट है। इंडिया आना ही पड़ेगा।'

जैसे तैसे अपनी बिजनिस मीटिंग्स एडजस्ट करके मिस्टर मेहरा इंडिया आये। पता लगा उनकी कानी दाई माँ अब नहीं रही। शमशान घाट पर मुर्दा फूंकने की रस्म निभा कर वो जल्दी से अपने फेमिली डॉक्टर के पास आये और झल्लाये। 'ये मुर्दा जिस्म को आग देने का काम तो कोई भी कर सकता था फिर मुझे क्यों बुलाया ? मेरा कितना नुकसान हुआ होगा वहां, कुछ अंदाज़ा है आपको ? और जिस चेहरे को मैं देखता नहीँ था, जिससे मुझे डर लगता था उसे भी दिखवा दिया आपने। अब मुझे चार पांच रातों तक डर लगेगा। आप समझते नही हैं।' डॉक्टर मुस्कुराया। बोला, 'चार पांच रातों तक नहीँ मिस्टर मेहरा, अब आपको आजीवन डर लगेगा। आपको कानी दाई माँ से नहीँ, खुद अपने आप से डर लगेगा। आप अपना चेहरा नहीं देख पाएंगे आईने में।' मिस्टर मेहरा गुस्से में फट पड़े, 'ये क्या कह रहे हैं आप ?' फैमिली डॉक्टर ने अपनी टेबल की दराज से एक फाइल निकाली और मिस्टर मेहरा को पकड़ाई। बोले, 'कानी दाई माँ ने मुझे कसम दी थी कि ये फाइल मैं आपको न दिखाऊँ। पर अब वो ही नहीँ रहीं तो उनकी कसम भी नहीं रही। देख लीजिए।' मिस्टर मेहरा असमंजस से भरे फाइल देखने लगे।

फाइल में एक कार एक्सीडेंट की रिपोर्ट दर्ज थी। उस कार एक्सीडेंट में एक पति पत्नी की मृत्यु हो गयी थी और उनके 6 साल के बच्चे की एक आंख इंजर्ड हो गयी थी। बाद में एक जटिल ऑपरेशन कर के बच्चे की आंख लगाई गई और बच्चे को आँख देने वाली उस बच्चे की दाई माँ थी। रिपोर्ट पढ़ते पढ़ते मिस्टर मेहरा के हाथ पैर काँपने लगे। आँखों के आगे अंधेरा छा गया। उनका दिमाग सुन्न हो गया। पैर के नीचे से ज़मीन खिसक गई। उन्होंने अपना माथा थाम लिया और वहीं एक कुर्सी पर बैठ गए। फैमिली डॉक्टर ने उनके आगे पानी का ग्लास रख दिया। मिस्टर मेहरा कुछ पल यूंही बैठे रहे और फिर एकदम से सरपट शमशान घाट की ओर दौड़ गए।

शमशान घाट पर जहां उनकी कानी दाई माँ जली थीं वहां वो घँटों दाई माँ, दाई माँ चीखते रहे। चिता की राख को हाथों से हटा हटा देखते रहे और उससे लिपट कर रोते रहे। कानी दाई माँ उन्हें नहीं दिखनी थी, सो नहीं दिखीं। मिस्टर मेहरा सुबकते, हिचकियाँ भरते ये सोचते रहे कि दाई माँ कानी थी पर वो खुद इतने साल अंधे रहे, और अब आगे भी वो अंधे ही रहेंगे, क्योंकि जब जब वो आईना देखेंगे तो उस एक आँख से नज़र कैसे मिला पाएंगे जो उनकी नहीं है, कानी दाई माँ की है।
कथा - शोशल मीडिया द्वारा ।

शनिवार, 21 अक्टूबर 2023

रावण महान था ????

 

"रावण तो महान था। उसने सीता का अपहरण अपनी बहन के अपमान का बदला लेने के लिए किया था। और उसने सीता को ससम्मान लंका में रखा, कोई जबरदस्ती नहीं की।"

बस दो-चार दिन में आपको कई जगहों पर ऊपर लिखी बातें पढ़ने को मिलेंगी। और विश्वास जानिए, हममें से अधिकांश ऐसे हैं जो इन बातों पर कहते मिल जाते हैं, बल्कि उनका दृढ़ विश्वास है कि ऐसे लोगों और ऐसे लेखों को इग्नोर कर देना चाहिए।

जबकि होता यह है कि आम जनता जो अपने दैनिक कामों में, रोजमर्रा की जिंदगी में उलझी है, वह इतनी सरल और स्पष्टता से लिखी बात को, इस लॉजिक को सही मान लेती हैं।

पर क्या यह सब सही है? सच में रामायण में ऐसा है?

रामायण के अनुसार, शूर्पणखा बहुत ही गंदी, घिनौनी दिखने वाली, गंदी सोच और व्यवहार वाली स्त्री है। वह वन में सुंदर शरीर के स्वामी राम को देखती है तो उनपर मोहित हो जाती है। माया से (मतलब मेकअप वगैरह करके) राम के पास आती है और उन्हें प्रपोज करती है। यहाँ तक कोई बुराई नहीं है। किसी को कोई पसन्द आ जाये तो प्रपोज करना गलत नहीं है। पर राम द्वारा यह बताने पर कि वे अयोध्या के राजकुमार हैं और वनवास मिलने के कारण अपनी पत्नी और भाई के साथ वन में आए हैं, शूर्पणखा सीता और लक्ष्मण को मार देने की बात कहती है, ताकि राम इत्मीनान से उसके साथ मौज कर सकें। वो सीता को चिपके पेट वाली, कमजोर, बदसूरत वगैरह भी कहती है।
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ऐसी बातों को सुनकर, मतलब कोई आपकी पत्नी की बेइज्जती करे, उसे और आपके भाई को मारने की बात करे, तो किसी को भी गुस्सा आएगा। पर समझदार लोग इन बातों को किसी पागल का प्रलाप मानकर हँसी में उड़ा देते हैं।

ऐसी बातों को सुनकर राम परिहास में कहते हैं कि वे तो अपनी पत्नी के साथ हैं, लक्ष्मण नहीं हैं, अतः वो लक्ष्मण से पूछ ले। लक्ष्मण की सहमति हो तो उनसे विवाह कर लें। फिर वो लक्ष्मण के पास जाती है और उन्हें प्रपोज करती है। लक्ष्मण उत्तर देते हैं कि वे तो राम और सीता की सेवा करते हैं, अगर शूर्पणखा को अपना लेंगे तो उसे भी राम और सीता की सेवा करनी पड़ेगी।

दोनों पुरुषों द्वारा नकारे जाने पर वह गुस्से में आकर सीता को मारने दौड़ती है, जिसपर राम शूर्पणखा को दंड देने के लिए लक्ष्मण को आदेश देते हैं और लक्ष्मण उसके कान और नाक काट लेते हैं।  (अरण्यकाण्ड, 17वाँ और 18वाँ सर्ग)

बताइए। प्रपोजल पर कोई दिक्कत नहीं थी किसी को, धमकी तक तो बर्दाश्त कर लिया, पर अटेम्प टू मर्डर पर सजा तो मिलेगी न?

फिर शूर्पणखा दंडकारण्य के गवर्नर (रावण के ऑक्युपाइड साम्राज्य के उस क्षेत्र के गवर्नर) खर के पास जाती है। खर अपने सेनापतियों दूषण और त्रिशरा तथा चौदह हजार सेना के साथ राम-लक्ष्मण को मारने आता है, जिन्हें अकेले राम लगभग सवा घण्टे (तीन घड़ी) में निपटा देते हैं। [एक मुहूर्त = दो घड़ी, एक घड़ी = 24 मिनट]

उन राक्षसों में से एक अकम्पन जान बचाकर निकल जाता है और लंका पहुँचकर इस युद्ध के बारे में रावण को बताता है। रावण राम-लक्ष्मण को मारने और सीता को उठा लाने की तैयारी करता है। वह मारीच के पास जाता है। मारीच उसे राम की ताकत बताता है, बताता है कि राम से लड़कर क्यों अपनी जान खामख्वाह गंवाना चाहते हो, बेमौत मरोगे, इत्यादि। यह सब सुनकर रावण ठंडा हो जाता है और अपने महल लौट जाता है। (अरण्यकाण्ड, 31वाँ सर्ग)

कुछ समय (दिन, या हफ्ते) बाद शूर्पणखा रावण के पास आती है और सीता जी के अद्भुत सौंदर्य का वर्णन करती है। ऐसा वर्णन कि मैं उसे यहाँ लिख नहीं सकता। कहती है कि उसने सोचा कि ऐसी सुंदर स्त्री तो उसके भाई रावण के पास होनी चाहिए, तो वह अपने भाई के लिए उस स्त्री को उठाने गई, और दुष्ट लक्ष्मण ने इस बात पर उसके कान-नाक काट लिए। (अरण्यकाण्ड, सर्ग 34, श्लोक 21)

बताइए, वह अपनी बात, अपनी कामपिपासा छुपा ले गई, सीता को मारने चली थी, और रावण को बता रही है कि वो तो रावण के लिए सीता को उठा रही थी। ऐसी तो सत्यवादी बहन थी वह।

रावण शूर्पणखा का बदला लेने के लिए नहीं, बल्कि स्त्रियों के प्रति अपनी भूख के कारण सीता को किडनैप करने गया था।

वह पहले भी कई स्त्रियों का हरण कर चुका था। वो यह बात खुद कहता है कि मैं इधर-उधर से बहुत सारी सुंदर स्त्रियों को हर लाया हूँ (अरण्यकाण्ड, 48वां सर्ग, श्लोक 28)। क्या इन बहुत सारी सुंदर स्त्रियों के पतियों ने भी उसकी बहन का अपमान किया था?

उसने भोगवती नगरी में नागराज वासुकी को हराया था। तक्षक को हराकर उसकी पत्नी को उठा लाया था। पर सीता के मामले में, अपने समान बलशाली खर, दूषण और त्रिशरा, और चौदह हजार राक्षसों का राम द्वारा बस सवा घण्टे में वध कर दिए जाने के कारण, फिर मारीच के समझाने के कारण उसकी हिम्मत नहीं हुई कि वह राम से लड़कर सीता को उठा सके। तो उस तथाकथित महान रावण ने चोरों की भाँति सीता का हरण किया। बेचारे मारीच की बलि चढ़ा दी, जो पहले भी राम से दो बार पिट चुका था।

किडनैप कर लिया, फिर भी सीता के साथ कोई जबरदस्ती नहीं की, तो इसपर भी सुन लीजिए।

जब रावण सीता जी का हरण कर लंका लाया और अपने महल के ऐश्वर्य को दिखा-दिखाकर उन्हें ललचाने का, बात मान जाने का प्रलोभन दे रहा था, तब माता सीता उसे खूब खरीखोटी सुनाने के बाद कहती हैं कि तू इस संज्ञाशून्य शरीर को बांधकर रख या काट, मैं खुद ही इस शरीर और जीवन को नहीं रखना चाहती। (अरण्यकाण्ड, 56वां सर्ग, श्लोक 21)

मतलब क्या हुआ इस बात का? यही न कि तू मेरे निकट आएगा उससे पहले ही मैं मर जाऊंगी।

इसपर 'स्त्री को ससम्मान रखने वाला महान रावण' कहता है कि ठीक है, मैं तुझे 12 महीने का समय देता हूँ। इतने समय में तू अपनी मर्जी से मेरे पास आ जाना। और अगर 12 महीने बाद भी तू मेरे पास नहीं आई तो मेरे सुबह के भोजन के लिए रसोइए तुझे काटकर पका देंगे। (अरण्यकाण्ड, 56वां सर्ग, श्लोक 24, 25)

कितना महान था न रावण?
----------अजीत प्रताप सिंह जी का लेखन

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