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रविवार, 2 अक्टूबर 2022
राम कथा
शनिवार, 1 अक्टूबर 2022
राम आएंगे
भगवान राम जानते थे कि उनकी मृत्यु का समय हो गया है। वह जानते थे कि जो जन्म लेता है उसे मरना ही पड़ता है। यही जीवन चक्र है। और मनुष्य देह की सीमा और विवशता भी यही है।
उन्होंने कहा...
“यम को मुझ तक आने दो। बैकुंठ धाम जाने का समय अब आ गया है”
मृत्यु के देवता यम स्वयं अयोध्या में घुसने से डरते थे। क्योंकि उनको राम के परम भक्त और उनके महल के मुख्य प्रहरी हनुमान से भय लगता था। उन्हें पता था कि हनुमानजी के रहते यह सब आसान नहीं।
भगवान श्रीराम इस बात को अच्छी तरह से समझ गए थे कि, उनकी मृत्यु को अंजनी पुत्र कभी स्वीकार नहीं कर पाएंगे, और वो रौद्र रूप में आ गए, तो समस्त धरती कांप उठेगी।
उन्होंने सृष्टि के रचयिता भगवान ब्रह्मा से इस विषय मे बात की। और अपने मृत्यु के सत्य से अवगत कराने के लिए राम जी ने अपनी अंगूठी को महल के फर्श के एक छेद में से गिरा दिया!
और हनुमान से इसे खोजकर लाने के लिए कहा। हनुमान ने स्वयं का स्वरुप छोटा करते हुए बिल्कुल भंवरे जैसा आकार बना लिया...और अंगूठी को तलाशने के लिये उस छोटे से छेद में प्रवेश कर गए। वह छेद केवल छेद नहीं था, बल्कि एक सुरंग का रास्ता था, जो पाताल लोक के नाग लोक तक जाता था। हनुमान नागों के राजा वासुकी से मिले और अपने आने का कारण बताया।
वासुकी हनुमान को नाग लोक के मध्य में ले गए, जहाँ पर ढेर सारी अंगूठियों का ढेर लगा था। वहां पर अंगूठियों का जैसे पहाड़ लगा हुआ था।
“यहां देखिए, आपको श्री रामकी अंगूठी अवश्य ही मिल जाएगी” वासुकी ने कहा।
हनुमानजी सोच में पड़ गए कि वो कैसे उसे ढूंढ पाएंगे? यह भूसे में सुई ढूंढने जैसा था। लेकिन उन्हें राम जी की आज्ञा का पालन करना ही था। तो राम जी का नाम लेकर उन्होंने अंगूठी को ढूंढना शुरू किया।
सौभाग्य कहें या राम जी का आशीर्वाद या कहें हनुमान जी की भक्ति...उन्होंने जो पहली अंगूठी उठाई, वो राम जी की ही अंगूठी थी। उनकी खुशी का ठिकाना न रहा। वो अंगूठी लेकर जाने को हुए, तब उन्हें सामने दिख रही एक और अंगूठी जानी पहचानी सी लगी।
पास जाकर देखा तो वे आश्चर्य से भर गए! दूसरी भी अंगूठी जो उन्होंने उठाई वो भी राम जी की ही अंगूठी थी। इसके बाद तो वो एक के बाद एक अंगूठीयाँ उठाते गए, और हर अंगूठी श्री राम की ही निकलती रही।
उनकी आँखों से अश्रु धारा फूट पड़ी!
' वासुकी यह प्रभु की कैसी माया है ? यह क्या हो रहा है? प्रभु क्या चाहते हैं?
वासुकी मुस्कुराए और बोले,
“जिस संसार में हम रहते है, वो सृष्टि व विनाश के चक्र से गुजरती है। जो निश्चित है। जो अवश्यम्भावी है। इस संसार के प्रत्येक सृष्टि चक्र को एक कल्प कहा जाता है। हर कल्प के चार युग या चार भाग होते हैं।
हर बार कल्प के दूसरे युग मे अर्थात त्रेता युग में, राम अयोध्या में जन्म लेते हैं। एक वानर इस अंगूठी का पीछा करता है...यहाँ आता है और हर बार पृथ्वी पर राम मृत्यु को प्राप्त होते हैं।
इसलिए यह सैकड़ों हजारों कल्पों से चली आ रही अंगूठियों का ढेर है। सभी अंगूठियां वास्तविक हैं। सभी श्री राम की ही है। अंगूठियां गिरती रहीं है...और इनका ढेर बड़ा होता रहा।
भविष्य के रामों की अंगूठियों के लिए भी यहां पर्याप्त स्थान है”।
हनुमान एकदम शांत हो गए। और तुरन्त समझ गए कि, उनका नाग लोक में प्रवेश और अंगूठियों के पर्वत से साक्षात्कार कोई आकस्मिक घटी घटना नहीं थी। बल्कि यह प्रभु राम का उनको समझाने का मार्ग था कि, मृत्यु को आने से रोका नहीं जा सकता। राम मृत्यु को प्राप्त होंगे ही। पर राम वापस आएंगे...यह सब फिर दोहराया जाएगा।
यही सृष्टि का नियम है, हम सभी बंधे हैं इस नियम से। संसार समाप्त होगा। लेकिन हमेशा की तरह, संसार पुनः बनता है और राम भी पुनः जन्म लेंगे।
प्रभु राम आएंगे...उन्हें आना ही है...उन्हें आना ही होगा।
जय श्रीराम - टीशा अग्रवाल
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शून्य की यात्रा
जब मैंने बैंगलोर यूनिवर्सिटी में टेक्निकल एजुकेशन के लिए एडमिशन लिया था तो उस समय कॉलेजों में नए स्टूडेंट की रैगिंग बैन नहीं हुआ करती थी.
इसीलिए वहाँ सीनियरों का राज हुआ करता था.
तो, एक बार सीनियरों ने मुझे नया देख कर मुझे अपने पास बुलाया..
और, पूछा.. नए आए हो क्या बे ?
मैंने भी मासूमियत से जबाब दिया.. जी सर.
तो, उन्होंने कहा कि यहाँ इतनी भास्ट (कठिन) पढ़ाई पढ़ने आये हो तो देखें कि तुम्हें अकल-उकल है कि नहीं.
तुम ये बताओ कि दिल्ली कहाँ है ?
मैंने कहा... सर, भारत में.
उन्होंने फिर पूछा ... तो फिर, भारत कहाँ है ?
मैं : सर, एशिया में .
सीनियर : एशिया कहाँ है ?
मैं : पृथ्वी पर
सीनियर : पृथ्वी कहाँ है ?
मैं : गैलेक्सी अर्थात आकाशगंगा में.
सीनियर : फिर, आकाशगंगा कहाँ है ?
मैं : ब्रह्मांड में.
सीनियर : ब्रह्मांड कहाँ है ?
मैं : अंतरिक्ष में .
सीनियर : अंतरिक्ष कहाँ है ?
मैं : शून्य में.
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सीनियर : शून्य कहाँ है फिर ?
मैं : मैथेमेटिक्स की किताब में.
सीनियर : किताब कहाँ है ?
मैं : दिल्ली में.
इस पर एक सीनियर ने कहा कि ... साले का मूंछ का भी रेघा नहीं आया है... लेकिन, काबिल कुछ ज्यादा ही है.
उस समय सोशल मीडिया का उतना चलन नहीं था... लेकिन, मेरा ये उत्तर कॉलेज में बहुत वाइरल हुआ था.
अब मैं ये तो नहीं जानता कि मेरी जानकारी का स्रोत क्या था... लेकिन, इतना जरूर जानता हूँ कि...
हमारे अनेकों धर्मग्रंथ... ब्रह्मांड एवं अंतरिक्ष को शून्य बताते हैं.
और... जो मैने बताया था वो लगभग सभी सनातनी हिन्दू को मालूम रहता है.
लेकिन... कोई ये नहीं जानता कि आखिर हमारे धर्मग्रंथ... अंतरिक्ष और ब्रह्मांड को "शून्य" क्यों कहते हैं...
जबकि, अंतरिक्ष में तो अरबों खरबों तारे और ग्रह-नक्षत्र आदि मौजूद हैं और वे हमें दिखते भी हैं.
असल में हमारे धर्मग्रंथ... अंतरिक्ष में मौजूद तारों और ग्रह-नक्षत्रों की "संख्या को शून्य नहीं" बताते हैं...
बल्कि, उनके "वैल्यूएशन को शून्य" बताते हैं.
👉 आप ये बात भली-भांति जानते हैं कि.... 6 अगस्त, 1945 को विश्व ने पहली परमाणु विस्फ़ोट त्रासदी को देखा... क्योंकि, इसी दिन अमेरिका ने जापान पर परमाणु बम गिराया था.
और, अमेरिका द्वारा जापान पर गिराए गए "लिटिल बॉय" नामक परमाणु हथियार में 64 किलो यूरेनियम का इस्तेमाल किया गया था.
लेकिन... इस 64 किलो का महज 900 ग्राम हिस्सा ही बम की प्रक्रिया में इस्तेमाल हो सका था और उस 900 ग्राम में भी... महज 0.7 ग्राम यूरेनियम ही पूरी तरह विशुद्ध ऊर्जा में तब्दील हो पाया था.
इस तरह, देखा जाए तो, लिटिल बॉय बेहद ही फिसड्डी बम था.
फिर भी.... महज 0.7 ग्राम यूरेनियम से मतलब कि ... एक कागज के नोट से भी हल्की सामग्री का विस्फोट एक झटके में सवा लाख लोगों के लिए काल का पर्याय बन गया.
अब विचारणीय तथ्य है कि... जब महज 0.7 ग्राम यूरेनियम में इतनी ऊर्जा है तो...
पूरे ब्रह्मांड में टोटल कितनी ऊर्जा होगी ????
आपका जबाब होगा... अकल्पनीय.
लेकिन.... सच तो यह है कि... ब्रह्मांड में कोई ऊर्जा है ही नहीं...
और, ब्रह्मांड में ऊर्जा की मात्रा "शून्य" है.
असल में..... जहाँ, मैटर पार्टिकल्स, एन्टीमैटर तथा प्रकाश कणों में निहित ऊर्जा "पॉजिटिव" होती है.
वहीं, यह पॉजिटिव ऊर्जा अपने चारों ओर ग्रेविटी की शक्ति से निर्मित एक ऐसा "कुआं" (Gravity well) निर्मित करती है जो "नेगेटिव एनर्जी" से बना होता है.
तथा.... पृथ्वी समेत आकाशीय पिंड नेगेटिव एनर्जी के इसी गड्ढे में फंसे हुए सूर्य की परिक्रमा करने पर बाध्य हैं.
इस तरह..... इस ब्रह्मांड में जितनी पॉजिटिव एनर्जी है.... ठीक उतनी ही, बिना किसी अंतर के, उसी मात्रा में ग्रेविटेशनल ऊर्जा के रूप में नेगेटिव एनर्जी भी मौजूद है.
ब्रह्मांड का अस्तित्व इस पॉजिटिव-नेगेटिव एनर्जी की कशमकश पर ही टिका हुआ है.
पॉजिटिव और नेगेटिव एक-दूसरे को कैंसिल आउट करते हैं.
जब आप इनदोनों को मिलाएंगे तो उत्पन्न परिणाम शून्य होगा.
इसे बेहतर समझने के लिए आप एक मैदान की कल्पना कीजिये.
आप मैदान से मिट्टी निकालते जाइए और मिट्टी के इस्तेमाल से एक गगनचुंबी ईमारत बनाते जाइए...
जितनी ऊंची इमारत होगी, गड्ढा भी उतना ही गहरा होता जाएगा.
फिर आप .... इमारत को तोड़ कर मिट्टी गड्ढे में भर दीजिये, पॉजिटिव एनर्जी यानी इमारत गायब और साथ ही साथ नेगेटिव एनर्जी यानी गड्ढा भी गायब...
शेष रह जाएगा सपाट मैदान .... यानि.. शून्य...
यह कुछ ऐसा ही है.... मानों आप जीरो बैलेंस के साथ क्रेडिट कार्ड के सहारे शॉपिंग कर रहे हैं.
आप जितना सामान खरीदेंगे, उतना ही बैलेंस नेगेटिव होता जाएगा.
लेकिन, सामान बेच के लोन भर दीजिये तो क्रेडिट कार्ड का बैलेंस फिर से शून्य हो जाएगा.
.
तो, इस पूरे लेख का सारांश यह है कि....
ब्रह्मांड में प्रत्येक पॉजिटिव एनर्जी अपने चारों ओर नेगेटिव एनर्जी का आवरण निर्मित करती है.
ब्रह्मांड का अस्तित्व इसी रस्साकशी पर टिका है.
पॉजिटिव का अस्तित्व नेगेटिव पर आधारित है.
पॉजिटिव-नेगेटिव को मिला दीजिये तो अस्तित्व का भ्रम टूट जाएगा..
और.... रह जायेगा सिर्फ़.... "शून्य"
इस तरह.... ब्रह्मांड को बनाने के लिए तकनीकी तौर पर कोई ऊर्जा कभी खर्च ही नहीं हुई.
क्योंकि.... सब कुछ शून्य है.
🚩🚩🚩 आश्चर्य इस बात का नहीं है कि.... ब्रह्मांड की ऊर्जा वैल्यूएशन शून्य है.
आश्चर्य इस बात का है कि.... जब आज से हजारों-लाखों साल पहले.... तथाकथित एडवांस कहे जाने वाले पश्चिमी सभ्यता के लोग ... जंगलों में नंग-धड़ंग, गुफाओं में रहते थे और कौतूहल से चाँद-तारे को देखा करते थे.
उस समय भी हमारे ऋषि-महर्षियों को ब्रह्मांड से लेकर ब्रह्मांड में मौजूद समस्त ऊर्जा का ज्ञान था और उन्होंने आज से लाखों साल पहले ही इसे ... "शून्य" बता दिया था.
आखिर... ऐसी उन्नत सभ्यता-संस्कृति, पूर्वजों के ज्ञान एवं धार्मिक ग्रंथ पर हमें गर्व क्यों नहीं होना चाहिए ???
मुझे तो खुद पर बेहद गर्व है कि मैं महान सनातन हिन्दू धर्म का एक हिस्सा हूँ.
जय सनातन...!!
जय महाकाल...!!!
आदरणीय Kumar satish वाकई पठनीय है, मननीय है, आचरणीय है !! इन्हें पढें, समझें, जाने तब फिर माने । आग्रह रहेगा । उन्ही की लेखनी ।