रविवार, 2 अक्टूबर 2022

राम कथा

एक बार क्या हुआ कि शिव जी और सती जी टहल रहे थे। ऐसे ही घूमते-घामते पहुँच गए रामजी के आश्रम के पास। एक जगह राम जी बैठे थे। सीता जी अंदर खाना-वाना बना रही होंगी, लक्ष्मणजी गए होंगे जंगल में शिकार खेलने। तो राम जी बैठे थे। लम्बा सांवला शरीर, चौड़ा माथा, मजबूत कंधे, लम्बी भुजाएं, सुतवा नाक, गर्दन तक लहराते केश। सती जी को मजाक सूझा। शिवजी से कहने लगी कि सीता का भेष धरकर जाती हूँ, देखते हैं कि आपके राम पहचानते हैं कि नहीं। 

शिवजी मना किए। अरे, रामजी हैं वो। उनसे क्यों हँसी ठिठोली करनी। चलो, वापस चलो। पर पतियों की बात कहाँ सुनती हैं पत्नियां! सती जी मुस्कियाते हुए चल दी। सीता का रूप धर कर राम के सामने पहुँची और कुछ बोलने ही वाली थी कि रामजी हाथ जोड़कर खड़े हो गए और खुश होकर बोले कि माताजी आपके दर्शन हुए, धन्यभाग हमारे। बाकी शिव जी कहाँ हैं, आसेपास हैं का? 

सती तो भौचक्की। क्या कहती! झेंपते हुए वापस चली गईं। उधर शिव जी गुसियाए हुए थे। बताओ, जब मना किये रहे तो गई क्यों? और वेश भी माता सीता का बनाया? माता का रूप धरा तो बीवी कैसे मानूं अब? 

ले भैया, हुआ बवाल। मजाक भारी पड़ गया। बहुत मनाया, शिव जी माने ही न। भोला गुस्सा हुआ तो हो गया। अब पति नाराज हो तो पत्नी को मायके की याद आती है। बहाना भी मिल गया। पिताजी दक्ष महराज यज्ञ कर रहे थे। सती आई और बोली कि नहीं बोलते हो तो मत बोलो, जाती हूँ अपने मायके। शिवजी बोले कि देख, जाना है तो जा, पर सोच ले, बिना बुलाए जा रही है। सती बेचारी करती क्या, पति का मुँह सीधा ही नहीं हो रहा। चली गईं। 

जब दक्ष ने देखा कि बेटी आ रही है, पर दामाद का पता ही नहीं तो अपमान महसूस हुआ। समझता क्या है खुद को। सारे देवता आ रहे हैं, वो भी आ जाता। पत्नी को भेज दिया। अब दामाद को भी निमंत्रण भेजें क्या? और दामाद भी कैसा! राख मल ली,  बाल कभी धोए नहीं, जटाएं बन गईं। और नहीं तो साँप पाल लिया जो हमेशा गरदन में लटका रहता है। और दामादों को देखो, कितने सुंदर-सुंदर। चंद्रमा को ही देख लो, जी जुड़ा जाता है। एक ये महराज हैं, कोई देख ले तो जूड़ी चढ़ जाए। 

जितना मन में भरा था, सबके सामने लगे अपनी बेटी को सुनाने। बेटी भी कितना बर्दाश्त करे? जो बोलना हो मुझे बोलते, मेरे पति को काहें बोल रहे, वो भी सबके सामने। गुस्सा तो बड़ी तेज चढ़ा, पर करें क्या? पति से तो गुस्सा होकर मायके आई थी, अब पिता से गुस्सा होकर किधर जाएं? 

जब गुस्सा किसी और पर नहीं निकलता तो खुद पर निकलता है। आगा-पीछा सोचे बिना कूद गई आग में। बवाल पर बवाल। शिव जी को मालूम चला तो मारे गुस्से के लगे झोटा नोचने। झोटवा में से वीरभद्र निकला और जाकर दक्ष की गरदन उड़ा दिया।

इधर शिव जी बिलकुले बौरा गए। अपनी जान से प्यारी बीवी की देह लेकर बावलों की तरह घूमने लगे। कभी गुस्सा आता तो लगते तांडव करने। हाहाकार मच जाता। समय-कुसमय का ध्यान दिए बिना लोग पटापट मरने लगते। और कभी बिलकुल निराश होकर गुम टहलते रहते तो संसार चक्र ही रुक जाता। 

ब्रह्मा, विष्णु को बड़ी चिंता हुई। खाली सृजन और पालन से तो काम चलेगा नहीं। तो तय हुआ कि इस सियापे को खत्म किया जाए। विष्णु जी ने अपना चक्र चलाया और मैया सती के शरीर के टुकड़े संसार भर में बिखर गए। 

शिव जी तो वैसे ही विरक्त मानसिकता के धनी थे। और विरक्त हो गए। आँख मूंदकर संसार से आँख फेर ली। देखिए, भगवान हो कि इंसान, बिना अर्धांगनी के काम नहीं चलता है। फिर यह तो शंकर थे। बिना शक्ति के पुरुष, पुरुष ही नहीं। तो शक्ति स्वरूपा माता सती ने गिरिराज के घर में जन्म लिया पार्वती के नाम से। 

पार्वती जी बड़ी हुई। अत्यंत सुंदर। युवा लड़की के मां-बाप की तरह गिरिराज और मैना जी को भी ब्याह की चिंता सताने लगी। दूल्हा खोजा जाने लगा। गिरिराज को तो विष्णुजी पसन्द थे, पर पार्वती तो शिवजी के लिए अवतरित हुई थी! आ गए अपने नारद जी, अगुआ बनकर। माँ-बाप को समझाया, फिर पार्वती जी को भी समझाया। पार्वती जी भी शिवमोहित थीं ही। समस्या बस यही थी कि शिव तो तपस्या में रत थे। 

जाने कितने सुर-असुर, राक्षस-मानव तपस्या कर कर के थक गए पर शिवजी प्रसन्न ही न हों। पार्वती जी ने भी ठान लिया कि चाहे जो हो जाएं, इन्हें तो प्रसन्न करके रहूंगी। भाई, स्त्री अगर कुछ ठान ले न, तो कुछ भी कर सकती है। शिवजी भी अंततः प्रसन्न हुए। वरदान मांगने को कहा तो पार्वती जी ने लिटरली वरदान, वर का दान ही मांग लिया। 

तय हुआ सब। शिवजी बोले कि जाओ अपने घर। अपने पिता से कहो कि हम बारात लेकर आते हैं। कुछ दिन बाद चली शिवजी की बारात। बारात में इंद्र, वरुण, यम, कुबेर जैसे देवता अपनी सुंदर सेनाओं के साथ चले, विष्णु जी भी पहुंच गए।

बाराती तो इतने सुंदर-सुंदर, और दूल्हा! उसका तो पूछो ही मत। 

जटा बढ़ी है, हाथ में त्रिशूल है, उस पर डमरू बंधा है, माथे और सीने पर राख की रेखाएं खिंची हैं, पूरे शरीर पर भभूत लगा है, और बैल पर चढ़कर चल दिए। कपड़ा-वपड़ा पहनने का तो होश ही नहीं। बस चल दिए तो चल दिए। उन्हें देख विष्णुजी खूब जोर से बोले, "भई यह बरात तो दूल्हे के लायक नहीं है" और उनके साथ-साथ सब देवता लोग बहुत पीछे खिसक लिए। 

शंकर जी बूझ गए कि देखो विष्णुजी को, शादी का मामला है तो लगे मजाक करने। शिवजी ने भी हांक लगाई और उनके सारे गण, भूत, प्रेत, पिशाच सब आगे आ गए। ये सब भी बारात में थे पर देवता लोग को देखकर पीछे हो गए थे। अब जब खुद भोले ने आगे बुलाया तो सब आगे आकर लगे नाचने। 

चली बारात। किसी भूत का सिर ही नहीं है, किसी के दो-दो, चार-चार सिर। किसी पिशाच की आंखें नहीं, तो किसी के शरीर पर बस आँखें ही आँखें। कोई गण लंगड़ा है तो किसी के घोड़े की तरह चार टांगे। प्रेतों का तो शरीर ही नहीं है। सब भांग-गाँजा पीकर मस्त होकर नाच रहे हैं। देवताओं ने देखा कि ये सब तो बाजी मार लिए, तो वे सब भी मधु, सुरा, सोम इत्यादि पीकर लगे झूमने। शायद पहली बार हुआ कि भूत-पिशाच, देवता-दानव, मानव-राक्षस सब एक साथ खुशी-खुशी नाचते-गाते चले जा रहे थे। 

बारात पहुंची द्वार पर। वहाँ सारे पर्वत, सारी नदियां, सारी झीलें शरीर धारण कर स्वागत हेतु तत्पर। बारात देखकर तो सब चकरा गए। कितने तो डर के मारे भाग गए। दूल्हा महराज बैल पर बैठे आगे बढ़े तो माता मैनाजी के तो होश ही उड़ गए। थाली छूट गई हाथ से। भाग कर अपनी बेटी के पास चली गईं। 

बेटी को अपनी गोद में बिठा कर बोलने लगी, "हाय हाय, हमारी इतनी सुन्नर बेटी। और इसका बियाह ऐसे बावरे से, जो अपनी शादी के दिन भी बिना कपड़ों के, राख मलकर आ गया। हे भगवान! और वो नारद कहाँ है? बड़का अगुआ बनते हो, मिलो तुम, बताते हैं तुम्हें। अरे, इतनी फूल सी लड़की के लिए और कोई नहीं मिला था।"

पार्वती जी तो सब बूझती ही थी। लगी समझाने कि जाए दो न अम्माजी। अब जिसके भाग में शिव जैसा बावला लिखा है, तो लिखा है। क्या कर सकते हैं? आप टेंशन मत लीजिए, हम बूझ लेंगे। काट लेंगे अपनी जिंदगी, इस औघड़ के साथ। 

तो हुआ बियाह। देवता लोग खाने बैठे तो खूब गारी भी सुने। बिदाई हुई और शिव जी अपनी पत्नी पार्वती को लेकर कैलाश वापस। 

एक दिन शिव जी बड़ी प्रसन्न मुद्रा में पेड़ के नीचे बैठे थे। पार्वती जी आई तो उन्हें अपने पास बिठा लिया। पूछे, "खुश तो हो?" 

माता पार्वती बोली, "जी, पर पुरानी बातें नहीं भूलती। अपनी गलती से रामजी को भ्रमित करने चली थी और आपको भी नाराज किया। बहुत व्याकुलता है। शांत ही नहीं होती।"

"कैसी भी व्याकुलता दूर करनी हो तो रामकथा सुनो। राम का नाम ही चित्त को शांत कर देता है, रामकथा सभी व्याकुलताओं को हर लेती है।"

"तो मुझपर कृपा करें और अपने श्रीमुख से रामकथा कहें।"

भोला बोला, "अवश्य, यह तो मेरा सबसे प्रिय कार्य है। सुनो, एक बार ... ... ..."।
     -अजीत प्रताप सिंह द्वारा 


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शनिवार, 1 अक्टूबर 2022

राम आएंगे

भगवान राम जानते थे कि उनकी मृत्यु का समय हो गया है। वह जानते थे कि जो जन्म लेता है उसे मरना ही पड़ता है। यही जीवन चक्र है। और मनुष्य देह की सीमा और विवशता भी यही है।

उन्होंने कहा...
“यम को मुझ तक आने दो। बैकुंठ धाम जाने का समय अब आ गया है”

मृत्यु के देवता यम स्वयं अयोध्या में घुसने से डरते थे। क्योंकि उनको राम के परम भक्त और उनके महल के मुख्य प्रहरी हनुमान से भय लगता था। उन्हें पता था कि हनुमानजी के रहते यह सब आसान नहीं।

भगवान श्रीराम इस बात को अच्छी तरह से समझ गए थे कि, उनकी मृत्यु को अंजनी पुत्र कभी स्वीकार नहीं कर पाएंगे, और वो रौद्र रूप में आ गए, तो समस्त धरती कांप उठेगी।

उन्होंने सृष्टि के रचयिता भगवान ब्रह्मा से इस विषय मे बात की। और अपने मृत्यु के सत्य से अवगत कराने के लिए राम जी ने अपनी अंगूठी को महल के फर्श के एक छेद में से गिरा दिया!

और हनुमान से इसे खोजकर लाने के लिए कहा।  हनुमान ने स्वयं का स्वरुप छोटा करते हुए बिल्कुल भंवरे जैसा आकार बना लिया...और अंगूठी को तलाशने के लिये उस छोटे से छेद में प्रवेश कर गए। वह छेद केवल छेद नहीं था, बल्कि एक सुरंग का रास्ता था, जो पाताल लोक के नाग लोक तक जाता था। हनुमान नागों के राजा वासुकी से मिले और अपने आने का कारण बताया।

वासुकी हनुमान को नाग लोक के मध्य में ले गए,   जहाँ पर ढेर सारी अंगूठियों का ढेर लगा था। वहां पर अंगूठियों का जैसे पहाड़ लगा हुआ था।

“यहां देखिए, आपको श्री रामकी अंगूठी अवश्य ही मिल जाएगी” वासुकी ने कहा।

हनुमानजी सोच में पड़ गए कि वो कैसे उसे ढूंढ पाएंगे? यह भूसे में सुई ढूंढने जैसा था। लेकिन उन्हें राम जी की आज्ञा का पालन करना ही था। तो राम जी का नाम लेकर उन्होंने अंगूठी को ढूंढना शुरू किया।

सौभाग्य कहें या राम जी का आशीर्वाद या कहें हनुमान जी की भक्ति...उन्होंने जो पहली अंगूठी उठाई, वो राम जी की ही अंगूठी थी। उनकी खुशी का ठिकाना न रहा। वो अंगूठी लेकर जाने को हुए, तब उन्हें सामने दिख रही एक और अंगूठी जानी पहचानी सी लगी।

पास जाकर देखा तो वे आश्चर्य से भर गए! दूसरी भी अंगूठी जो उन्होंने उठाई वो भी राम जी की ही अंगूठी थी। इसके बाद तो वो एक के बाद एक अंगूठीयाँ उठाते गए, और हर अंगूठी श्री राम की ही निकलती रही।

उनकी आँखों से अश्रु धारा फूट पड़ी!

' वासुकी यह प्रभु की कैसी माया है ? यह क्या हो रहा है? प्रभु क्या चाहते हैं?

वासुकी मुस्कुराए और बोले,

“जिस संसार में हम रहते है, वो सृष्टि व विनाश के चक्र से गुजरती है। जो निश्चित है। जो अवश्यम्भावी है। इस संसार के प्रत्येक सृष्टि चक्र को एक कल्प कहा जाता है। हर कल्प के चार युग या चार भाग होते हैं।

हर बार कल्प के दूसरे युग मे अर्थात त्रेता युग में, राम अयोध्या में जन्म लेते हैं। एक वानर इस अंगूठी का पीछा करता है...यहाँ आता है और हर बार पृथ्वी पर राम मृत्यु को प्राप्त होते हैं।

इसलिए यह सैकड़ों हजारों कल्पों से चली आ रही अंगूठियों का ढेर है। सभी अंगूठियां वास्तविक हैं। सभी श्री राम की ही है। अंगूठियां गिरती रहीं है...और इनका ढेर बड़ा होता रहा।

भविष्य के रामों की अंगूठियों के लिए भी यहां पर्याप्त स्थान है”।

हनुमान एकदम शांत हो गए। और तुरन्त समझ गए कि, उनका नाग लोक में प्रवेश और अंगूठियों के पर्वत से साक्षात्कार कोई आकस्मिक घटी घटना नहीं थी। बल्कि यह प्रभु राम का उनको समझाने का मार्ग था कि, मृत्यु को आने से रोका नहीं जा सकता। राम मृत्यु को प्राप्त होंगे ही। पर राम वापस आएंगे...यह सब फिर दोहराया जाएगा।

यही सृष्टि का नियम है, हम सभी बंधे हैं इस नियम से। संसार समाप्त होगा। लेकिन हमेशा की तरह, संसार पुनः बनता है और राम भी पुनः जन्म लेंगे।

प्रभु राम आएंगे...उन्हें आना ही है...उन्हें आना ही होगा।
जय श्रीराम - टीशा अग्रवाल

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शून्य की यात्रा

 

 

जब मैंने बैंगलोर यूनिवर्सिटी में टेक्निकल एजुकेशन के लिए एडमिशन लिया था तो उस समय कॉलेजों में नए स्टूडेंट की रैगिंग बैन नहीं हुआ करती थी.

इसीलिए वहाँ सीनियरों का राज हुआ करता था.

तो, एक बार सीनियरों ने मुझे नया देख कर मुझे अपने पास बुलाया..
और, पूछा.. नए आए हो क्या बे ?

मैंने भी मासूमियत से जबाब दिया.. जी सर.

तो, उन्होंने कहा कि यहाँ इतनी भास्ट (कठिन) पढ़ाई पढ़ने आये हो तो देखें कि तुम्हें अकल-उकल है कि नहीं.

तुम ये बताओ कि दिल्ली कहाँ है ?
मैंने कहा... सर, भारत में.

उन्होंने फिर पूछा ... तो फिर, भारत कहाँ है ?
मैं : सर, एशिया में .

सीनियर : एशिया कहाँ है ?
मैं : पृथ्वी पर

सीनियर : पृथ्वी कहाँ है ?
मैं : गैलेक्सी अर्थात आकाशगंगा में.

सीनियर : फिर, आकाशगंगा कहाँ है ?
मैं : ब्रह्मांड में.

सीनियर : ब्रह्मांड कहाँ है ?
मैं : अंतरिक्ष में .

सीनियर : अंतरिक्ष कहाँ है ?
मैं : शून्य में.

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सीनियर : शून्य कहाँ है फिर ?
मैं : मैथेमेटिक्स की किताब में.

सीनियर : किताब कहाँ है ?
मैं : दिल्ली में.

इस पर एक सीनियर ने कहा कि ... साले का मूंछ का भी रेघा नहीं आया है... लेकिन, काबिल कुछ ज्यादा ही है.

उस समय सोशल मीडिया का उतना चलन नहीं था... लेकिन, मेरा ये उत्तर कॉलेज में बहुत वाइरल हुआ था.

अब मैं ये तो नहीं जानता कि मेरी जानकारी का स्रोत क्या था... लेकिन, इतना जरूर जानता हूँ कि...
हमारे अनेकों धर्मग्रंथ... ब्रह्मांड एवं अंतरिक्ष को शून्य बताते हैं.

और... जो मैने बताया था वो लगभग सभी सनातनी हिन्दू को मालूम रहता है.

लेकिन... कोई ये नहीं जानता कि आखिर हमारे धर्मग्रंथ...  अंतरिक्ष और ब्रह्मांड को "शून्य" क्यों कहते हैं...
जबकि, अंतरिक्ष में तो अरबों खरबों तारे और ग्रह-नक्षत्र आदि मौजूद हैं और वे हमें दिखते भी हैं.

असल में हमारे धर्मग्रंथ... अंतरिक्ष में मौजूद तारों और ग्रह-नक्षत्रों की "संख्या को शून्य नहीं" बताते हैं...

बल्कि, उनके "वैल्यूएशन को शून्य" बताते हैं.

👉 आप ये बात भली-भांति जानते हैं कि.... 6 अगस्त, 1945 को विश्व ने पहली परमाणु विस्फ़ोट त्रासदी को देखा... क्योंकि, इसी दिन अमेरिका ने जापान पर परमाणु बम गिराया था.

और, अमेरिका द्वारा जापान पर गिराए गए "लिटिल बॉय" नामक परमाणु हथियार में 64 किलो यूरेनियम का इस्तेमाल किया गया था.

लेकिन... इस 64 किलो का महज 900 ग्राम हिस्सा ही बम की प्रक्रिया में इस्तेमाल हो सका था और उस 900 ग्राम में भी... महज 0.7 ग्राम यूरेनियम ही पूरी तरह विशुद्ध ऊर्जा में तब्दील हो पाया था.

इस तरह, देखा जाए तो, लिटिल बॉय बेहद ही फिसड्डी बम था.

फिर भी.... महज 0.7 ग्राम यूरेनियम से मतलब कि ... एक कागज के नोट से भी हल्की सामग्री का विस्फोट एक झटके में सवा लाख लोगों के लिए काल का पर्याय बन गया.
अब विचारणीय तथ्य है कि... जब महज 0.7 ग्राम यूरेनियम में इतनी ऊर्जा है तो...

पूरे ब्रह्मांड में टोटल कितनी ऊर्जा होगी ????

आपका जबाब होगा... अकल्पनीय.

लेकिन.... सच तो यह है कि... ब्रह्मांड में कोई ऊर्जा है ही नहीं...
और, ब्रह्मांड में ऊर्जा की मात्रा "शून्य" है.

असल में..... जहाँ, मैटर पार्टिकल्स, एन्टीमैटर तथा प्रकाश कणों में निहित ऊर्जा "पॉजिटिव" होती है.
वहीं, यह पॉजिटिव ऊर्जा अपने चारों ओर ग्रेविटी की शक्ति से निर्मित एक ऐसा "कुआं" (Gravity well) निर्मित करती है जो "नेगेटिव एनर्जी" से बना होता है.

तथा.... पृथ्वी समेत आकाशीय पिंड नेगेटिव एनर्जी के इसी गड्ढे में फंसे हुए सूर्य की परिक्रमा करने पर बाध्य हैं.

इस तरह..... इस ब्रह्मांड में जितनी पॉजिटिव एनर्जी है.... ठीक उतनी ही, बिना किसी अंतर के, उसी मात्रा में ग्रेविटेशनल ऊर्जा के रूप में नेगेटिव एनर्जी भी मौजूद है.

ब्रह्मांड का अस्तित्व इस पॉजिटिव-नेगेटिव एनर्जी की कशमकश पर ही टिका हुआ है.

पॉजिटिव और नेगेटिव एक-दूसरे को कैंसिल आउट करते हैं.

जब आप इनदोनों को मिलाएंगे तो उत्पन्न परिणाम शून्य होगा.

इसे बेहतर समझने के लिए आप एक मैदान की कल्पना कीजिये.

आप मैदान से मिट्टी निकालते जाइए और मिट्टी के इस्तेमाल से एक गगनचुंबी ईमारत बनाते जाइए...

जितनी ऊंची इमारत होगी, गड्ढा भी उतना ही गहरा होता जाएगा.

फिर आप .... इमारत को तोड़ कर मिट्टी गड्ढे में भर दीजिये, पॉजिटिव एनर्जी यानी इमारत गायब और साथ ही साथ नेगेटिव एनर्जी यानी गड्ढा भी गायब...

शेष रह जाएगा सपाट मैदान .... यानि.. शून्य...

यह कुछ ऐसा ही है....  मानों आप जीरो बैलेंस के साथ क्रेडिट कार्ड के सहारे शॉपिंग कर रहे हैं.

आप जितना सामान खरीदेंगे, उतना ही बैलेंस नेगेटिव होता जाएगा.

लेकिन, सामान बेच के लोन भर दीजिये तो क्रेडिट कार्ड का बैलेंस फिर से शून्य हो जाएगा.
.
तो, इस पूरे लेख का सारांश यह है कि....

ब्रह्मांड में प्रत्येक पॉजिटिव एनर्जी अपने चारों ओर नेगेटिव एनर्जी का आवरण निर्मित करती है.

ब्रह्मांड का अस्तित्व इसी रस्साकशी पर टिका है.

पॉजिटिव का अस्तित्व नेगेटिव पर आधारित है.

पॉजिटिव-नेगेटिव को मिला दीजिये तो अस्तित्व का भ्रम टूट जाएगा..

और.... रह जायेगा सिर्फ़.... "शून्य"

इस तरह.... ब्रह्मांड को बनाने के लिए तकनीकी तौर पर कोई ऊर्जा कभी खर्च ही नहीं हुई.

क्योंकि.... सब कुछ शून्य है.

🚩🚩🚩 आश्चर्य इस बात का नहीं है कि.... ब्रह्मांड की ऊर्जा वैल्यूएशन शून्य है.

आश्चर्य इस बात का है कि.... जब आज से हजारों-लाखों साल पहले.... तथाकथित एडवांस कहे जाने वाले पश्चिमी सभ्यता के लोग ... जंगलों में नंग-धड़ंग, गुफाओं में रहते थे और कौतूहल से चाँद-तारे को देखा करते थे.

उस समय भी हमारे ऋषि-महर्षियों को ब्रह्मांड से लेकर ब्रह्मांड में मौजूद समस्त ऊर्जा का ज्ञान था और उन्होंने आज से लाखों साल पहले ही इसे ... "शून्य"  बता दिया था.

आखिर... ऐसी उन्नत सभ्यता-संस्कृति, पूर्वजों के ज्ञान एवं धार्मिक ग्रंथ पर हमें गर्व क्यों नहीं होना चाहिए ???

मुझे तो खुद पर बेहद गर्व है कि मैं महान सनातन हिन्दू धर्म का एक हिस्सा हूँ.

जय सनातन...!!
जय महाकाल...!!!

आदरणीय Kumar satish वाकई पठनीय है, मननीय है, आचरणीय है !! इन्हें पढें, समझें, जाने तब फिर माने । आग्रह रहेगा । उन्ही की लेखनी ।

मा की पहचान

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