शनिवार, 13 अगस्त 2022

मधुर व्यवहार

 

एक राजा था। उसने एक सपना देखा। सपने में उससे एक परोपकारी साधु कह रहा था कि, बेटा! कल रात को तुम्हें एक विषैला सांप काटेगा और उसके काटने से तुम्हारी मृत्यु हो जाएगी। वह सर्प अमुक पेड़ की जड़ में रहता है। वह तुमसे पूर्व जन्म की शत्रुता का बदला लेना चाहता है।
सुबह हुई। राजा सोकर उठा। और सपने की बात अपनी आत्मरक्षा के लिए क्या उपाय करना चाहिए? इसे लेकर विचार करने लगा।
सोचते- सोचते राजा इस निर्णय पर पहुंचा कि मधुर व्यवहार से बढ़कर शत्रु को जीतने वाला और कोई हथियार इस पृथ्वी पर नहीं है। उसने सर्प के साथ मधुर व्यवहार करके उसका मन बदल देने का निश्चय किया।
शाम होते ही राजा ने उस पेड़ की जड़ से लेकर अपनी शय्या तक फूलों का बिछौना बिछवा दिया, सुगन्धित जलों का छिड़काव करवाया, मीठे दूध के कटोरे जगह जगह रखवा दिये और सेवकों से कह दिया कि रात को जब सर्प निकले तो कोई उसे किसी प्रकार कष्ट पहुंचाने की कोशिश न करें।
रात को सांप अपनी बांबी में से बाहर निकला और राजा के महल की तरफ चल दिया। वह जैसे आगे बढ़ता गया, अपने लिए की गई स्वागत व्यवस्था को देख देखकर आनन्दित होता गया। कोमल बिछौने पर लेटता हुआ मनभावनी सुगन्ध का रसास्वादन करता हुआ, जगह-जगह पर मीठा दूध पीता हुआ आगे बढ़ता था।
इस तरह क्रोध के स्थान पर सन्तोष और प्रसन्नता के भाव उसमें बढ़ने लगे। जैसे-जैसे वह आगे चलता गया, वैसे ही वैसे उसका क्रोध कम होता गया। राजमहल में जब वह प्रवेश करने लगा तो देखा कि प्रहरी और द्वारपाल सशस्त्र खड़े हैं, परन्तु उसे जरा भी हानि पहुंचाने की चेष्टा नहीं करते।
यह असाधारण सी लगने वाले दृश्य देखकर सांप के मन में स्नेह उमड़ आया। सद्व्यवहार, नम्रता, मधुरता के जादू ने उसे मंत्रमुग्ध कर लिया था। कहां वह राजा को काटने चला था, परन्तु अब उसके लिए अपना कार्य असंभव हो गया। हानि पहुंचाने के लिए आने वाले शत्रु के साथ जिसका ऐसा मधुर व्यवहार है, उस धर्मात्मा राजा को काटूं तो किस प्रकार काटूं? यह प्रश्न के चलते वह दुविधा में पड़ गया।
राजा के पलंग तक जाने तक सांप का निश्चय पूरी तरह से बदल गया। उधर समय से कुछ देर बाद सांप राजा के शयन कक्ष में पहुंचा। सांप ने राजा से कहा, राजन! मैं तुम्हें काटकर अपने पूर्व जन्म का बदला चुकाने आया था, परन्तु तुम्हारे सौजन्य और सदव्यवहार  ने मुझे परास्त कर दिया।
अब मैं तुम्हारा शत्रु नहीं मित्र हूं। मित्रता के उपहार स्वरूप अपनी बहुमूल्य मणि मैं तुम्हें दे रहा हूं। लो इसे अपने पास रखो। इतना कहकर और मणि राजा के सामने रखकर सांप चला गया।
*संक्षेप*
*यह महज कहानी नहीं जीवन की सच्चाई है। अच्छा व्यवहार कठिन से कठिन कार्यों को सरल बनाने का माद्दा रखता है। यदि व्यक्ति व्यवहार कुशल है तो वो सब कुछ पा सकता है जो पाने की वो हार्दिक इच्छा रखता है।*

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सोमवार, 8 अगस्त 2022

थोड़े में बहुत

 

चिन्तन की धारा

कछुए औसतन 300 से 500 साल जीते हैं ।
हाथी 100 से 160 साल ।
कुत्ते मात्र 10 - 12 साल ।

कछुए की लंबी ज़िन्दगी का राज़ छिपा है उसकी सांस लेने की गति और तीव्रता में ।
कछुए अपने सामान्य जीवन मे जमीन पर हवा में एक मिनट में आधे से भी कम बार सांस लेते हैं या यूं कहें कि दो तीन मिनट में एक बार सांस लेते हैं । वही कछुआ जब पानी मे चला जाता है तो आधे घंटे तक भी सिर्फ एक सांस में आराम से रहता है ।
पर वही कछुआ जब Hibernation अर्थात शीत निद्रा में चला जाता है तो 6 महीने तक बिना सांस लिये रह लेता है ।

कछुए की लंबी और सुखी ज़िन्दगी का राज़ है -- कम से कम में जीवित रह लेना ।
किसी भी परिस्थिति में सुख से जीवित रह लेना ।

कुत्ता इसलिये इतना कम जीता है क्योंकि उसे प्रति मिनट 30 बार सांस लेनी है । दौड़ने भागने भौंकने लगा तो 200 बार प्रति मिनट । कुत्ते भी अगर 5 मिनट में एक बार सांस लेकर जीना सीख जाते तो वो भी 100 बरस सुख से जीते ।

सुखी जीवन का मूल मंत्र -- न्यूनतम में जीना सीखो।
किसी भी परिस्थिति में जीना सीखो ।
अपनी जरूरतों को कम से कम करते जाओ ।
यहां तक कि Zero पे ले आओ ।

जीवन मे कछुआ बन जाओ ।
कछुआ कभी हड़बड़ी में नही जीता ।

सुख से जीना है तो ज़रूरतें घटानी शुरू करो ।
कम से कम कपड़े , घर और जीवन मे कम से कम सामान accesories , Baggage .....
कम से कम रिश्ते नाते , कम से कम न्योता हँकारी ......
कम से कम /  न्यूनतम Formalities ......
न्यूनतम भोजन ......

सुखी रहना है तो धीरे धीरे आदमी से कछुआ बन जाओ ।
-अजित सिंह का की प्रेरणा, जो अब वानप्रस्थी हुवे ।

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रविवार, 7 अगस्त 2022

मूर्ख दिखना

 

एक गाँव में एक अर्थविद रहता था, उसकी ख्याति दूर दूर तक फैली थी। एक बार वहाँ के राजा ने उसे चर्चा पर बुलाया।

काफी देर चर्चा के बाद उसने कहा "महाशय, आप बहुत बडे अर्थ ज्ञानी है, पर आपका लडका इतना मूर्ख क्यों है? उसे भी कुछ सिखायें। उसे तो सोने चांदी तक में मूल्यवान क्या है यह भी नही पता॥"
यह कहकर वह जोर से हंस पडा।

अर्थविद को बुरा लगा, वह घर गया व लडके से पूछा "सोना व चांदी में अधिक मूल्यवान क्या है?"

"सोना", बिना एक पल भी गंवाए उसके लडके ने कहा।

"तुम्हारा उत्तर तो ठीक है, फिर राजा ने ऐसा क्यूं  कहा? सभी के बीच मेरी खिल्ली भी उठाई।"

लडके को समझ मे आ गया । वह बोला "राजा गाँव के पास एक खुला दरबार लगाते हैं, जिसमें सभी प्रतिष्ठित व्यक्ति भी शामिल होते हैं। यह दरबार मेरे स्कूल जाने के मार्ग में ही पड़ता है।

मुझे देखते ही बुलवा लेते हैं, अपने एक हाथ मे सोने का व दूसरे मे चांदी का सिक्का रखकर, जो अधिक मूल्यवान है वह ले लेने को कहते हैं और मैं चांदी का सिक्का ले लेता हूं।
सभी ठहाका लगाकर हंसते हैं व मजा लेते हैं।
ऐसा तकरीबन हर दूसरे दिन होता है।"

"फिर तुम सोने का सिक्का क्यों नही उठाते, चार लोगों के बीच क्यों अपनी फजीहत कराते हो व साथ में मेरी भी।"

लडका हंसा व हाथ पकडकर अर्थविद को अंदर ले गया ऒर कपाट से एक पेटी निकालकर दिखाई जो चांदी के सिक्कों से भरी हुई थी।

यह देख अर्थविद हतप्रभ रह गया।

लडका बोला "जिस दिन मैंने सोने का सिक्का उठा लिया उस दिन से यह खेल बंद हो जाएगा। वो मुझे मूर्ख समझकर मजा लेते हैं तो लेने दें, यदि मैं बुद्धिमानी दिखाउंगा तो कुछ नही मिलेगा।"
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*मूर्ख होना अलग बात है व समझा जाना अलग। स्वर्णिम मौक़े का फायदा उठाने से बेहतर है हर मौक़े को स्वर्ण में तब्दील करना।*

*जैसे समुद्र सबके लिए समान होता है, कुछ लोग पानी के अंदर टहलकर आ जाते हैं, कुछ मछलियाँ ढूंढ पकड लाते हैं व कुछ मोती चुन कर आते हैं।*

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शनिवार, 6 अगस्त 2022

जैसा बोया

 

एक बार एक सर्वगुणी राजा घोड़े के तबेलें में घुमनें में व्यस्त थे तभी एक साधु भिक्षा मांगने के लिए तबेलें में ही आए और राजा से बोले  "मम् भिक्षाम् देहि..!!" राजा ने बिना विचारे तबेले से घोडें की लीद उठाई और उसके पात्र में डाल दी। राजा ने यह भी नहीं विचारा कि इसका परिणाम कितना दुखदायी होगा। साधु भी शांत स्वभाव होने के कारण भिक्षा ले वहाँ से चले गए। और कुटिया के बाहर एक कोने में डाल दी।
   कुछ समय उपरान्त राजा उसी जंगल में शिकार वास्ते गए। राजा ने जब जंगल में देखा एक कुटिया के बाहर घोड़े की लीद का ढेर लगा था। उसने देखा कि यहाँ तो न कोई तबेला है और न ही दूर-दूर तक कोई घोडे दिखाई दे रहे हैं। वह आश्चर्यचकित हो कुटिया में गए और साधु से बोले "महाराज! आप हमें एक बात बताइए यहाँ कोई घोड़ा भी नहीं न ही तबेला है तो यह इतनी सारी घोड़े की लीद कहा से आई !" साधु ने कहा " राजन्! लगता है आपने हमें पहचाना नही! यह लीद तो आपकी ही दी हुई है!" यह सुन राजा ने उस साधु को ध्यान से देखा और बोले हाँ  महाराज! आपको हमने पहचान लिया। पर आप हमें एक बात का जवाब दीजिए हमने तो थोड़ी-सी लीद दी थी पर यह तो बहुत सारी हो गयी है इतनी सारी कैसे हो गयी कृपया कर हमें विस्तार से समझाइए।
   साधु ने कहा "आप जितनी भी भिक्षा देते है और जो भी देते है वह दिन-प्रतिदिन प्रफुल्लित हो जाती है यह उसी का परिणाम है। और जब हम यह शरीर छोड़ते है तो आपको यह सब खानी पड़ेगी।" राजा यह सब सुनकर दंग रह गया और नासमझी के कारण आँखों में अश्रु भर चरणों में नतमस्तक हो साधु महाराज से विनती कर बोले "महाराज! मुझे क्षमा कर दीजिए मैं तो एक रत्ती भर लीद नहीं खा सकूँगा।आइन्दा मैं ऐसी गलती कभी नहीं करूँगा।" कृपया कोई ऐसा उपाय बता दीजिए! जिससे मैं अपने कर्मों को वजन हल्का कर सकूँ!"
   साधु ने जब राजा की ऐसी दुखमयी हालात देखी तो उन्होंने कहा "राजन्! एक उपाय है जिसमें आपको ऐसा कारज करना है जिससे सभी प्रजाजन आपकी निंदा करें आपको ऐसा कोई कारज नहीं करना है जो गलत हो! आपको अपने को दूसरों की नज़र में गलत दर्शाना है बस!! और अपनी नजर में वह कारज आपने न किया हो।" यह सुन राजा ने महल में आ काफी सोच-विचार कर जिससे कि उनकी निंदा हो ।
   वह उसी रात एक वैश्या के कोठे पर बाहर ही चारपाई पर रात भर बैठ रात बिता जब सब प्रजाजन उठ गए तो वापिस आये तो सब लोग आपस में राजा की निंदा करने लगे कि कैसा राजा है कितना निंदनीय कृत्य कर रहा है क्या यह शोभनीय है ??  बगैरा-बगैरा!! इसप्रकार की निंदा से राजा के पाप की गठरी हल्की होने लगी। अब राजा दोबारा उसी साधु के पास गए तो घोड़े की लीद के ढेर को मुट्ठी भर में परवर्तित देख बोले "महाराज! यह कैसे हुआ? ढेर में इतना बड़ा परिवर्तन!!" साधू ने कहा "यह निंदा के कारण हुआ है राजन् आपकी निंदा करने के कारण सब प्रजाजनों में बराबर-बराबर लीद आप बँट गयी है जब हम किसी की बेवजह निंदा करते है तो हमें उसके पाप का बोझ उठाना होता है अब जो तुमने घोड़े की लीद हमें दी थी वह ही पड़ी ही वह तो आपको ही थाली में दी जायेगी। अब इसको तुम चूर्ण बना के खाओ, सब्जी में डाल के खाओ या पानी में घोलकर पीओ यह तो आपको ही खानी पड़ेगी राजन्! अपना किया कर्म तो हमें ही भुगतना है जी चाहे हँस के भुगतो या रो कर सब आप ही भोगना है।
"जैसा दोगे वैसा ही लौट कर थाली में वापिस आएगा!"

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