रविवार, 17 अप्रैल 2022

स्वभाव

 

पुराने जमाने में एक शहर में दो ब्राह्मण पुत्र रहते थे,एक गरीब था तो दूसरा अमीर..दोनों पड़ोसी थे..,,गरीब ब्राम्हण की पत्नी ,उसे रोज़ ताने देती , झगड़ती एक दिन ग्यारस के दिन गरीब ब्राह्मण पुत्र झगड़ों से तंग आ जंगल की ओर चल पड़ता है ,ये सोच कर कि जंगल में शेर या कोई मांसाहारी जीव उसे मार कर खा जायेगा उस जीव का पेट भर जायेगा और मरने से वो रोज की झिक झिक से मुक्त हो जायेगा..।

जंगल में जाते उसे एक गुफ़ा नज़र आती है...वो गुफ़ा की तरफ़ जाता है...। गुफ़ा में एक शेर सोया होता है और शेर की नींद में ख़लल न पड़े इसके लिये हंस का पहरा होता है..हंस ज़ब दूर से ब्राह्मण पुत्र को आता देखता है तो चिंता में पड़ सोचता है..ये ब्राह्मण आयेगा ,शेर जगेगा और इसे मार कर खा जायेगा... ग्यारस के दिन मुझे पाप लगेगा...इसे बचायें कैसे???

उसे उपाय सुझता है और वो शेर के भाग्य की तारीफ़ करते कहता है..ओ जंगल के राजा... उठो, जागो..आज आपके भाग खुले हैं, ग्यारस के दिन खुद विप्रदेव आपके घर पधारे हैं, जल्दी उठें और इन्हे दक्षिणा दें रवाना करें...आपका मोक्ष हो जायेगा.. ये दिन दुबारा आपकी जिंदगी में शायद ही आये,आपको पशु योनी से छुटकारा मिल जायेगा...।

शेर दहाड़ कर उठता है,हंस की बात उसे सही लगती है,और पूर्व में शिकार हुए मनुष्यों के गहने थे वे सब के सब उस ब्राह्मण के पैरों में रख ,शीश नवाता है,जीभ से उनके पैर चाटता है..।

हंस ब्राह्मण को इशारा करता है विप्रदेव ये सब गहने उठाओ और जितना जल्द हो सके वापस अपने घर जाओ...ये सिंह है.. कब मन बदल जाय..ब्राह्मण बात समझता है घर लौट जाता है.... पडौसी अमीर ब्राह्मण की पत्नी को जब सब पता चलता है तो वो भी अपने पति को जबरदस्ती अगली ग्यारस को जंगल में उसी शेर की गुफा की ओर भेजती है....अब शेर का पहेरादार बदल जाता है..नया पहरेदार होता है ""कौवा""

जैसे कौवे की प्रवृति होती है वो सोचता है ... बढीया है ..ब्राह्मण आया.. शेर को जगाऊं ...शेर की नींद में ख़लल पड़ेगी, गुस्साएगा, ब्राह्मण को मारेगा,तो कुछ मेरे भी हाथ लगेगा, मेरा पेट भर जायेगा...

ये सोच वो कांव.. कांव.. कांव...चिल्लाता है..शेर गुस्सा हो जगता है..दूसरे ब्राह्मण पर उसकी नज़र पड़ती है उसे हंस की बात याद आ जाती है.. वो समझ जाता है, कौवा क्यूं कांव..कांव कर रहा है..वो अपने, पूर्व में हंस के कहने पर किये गये धर्म को खत्म नहीं करना चाहता..पर फिर भी नहीं शेर,शेर होता है जंगल का राजा...

वो दहाड़ कर ब्राह्मण को कहता है..""हंस उड़ सरवर गये और अब काग भये प्रधान...थे तो विप्रा थांरे घरे जाओ,,,,मैं किनाइनी जिजमान...,

अर्थात हंस जो अच्छी सोच वाले अच्छी मनोवृत्ति वाले थे उड़ के सरोवर यानि तालाब को चले गये है और अब कौवा प्रधान पहरेदार है जो मुझे तुम्हें मारने के लिये उकसा रहा है..मेरी बुद्धि घूमें, उससे पहले ही, हे ब्राह्मण, यहां से चले जाओ..शेर किसी का जजमान नहीं हुआ है..वो तो हंस था जिसने मुझ शेर से भी पुण्य करवा दिया।

दूसरा ब्राह्मण सारी बात समझ जाता है और डर के मारे तुरंत प्राण बचाकर अपने घर की ओर भाग जाता है...

*हंस और कौवा कोई और नहीं ,,,हमारे ही चरित्र हैं...कोई किसी का दु:ख देख कर दु:खी होता है और उसका भला सोचता है ,,,वो हंस है...और जो किसी को दु:खी देखना चाहता है ,,,किसी का सुख जिसे सहन नहीं होता ...वो कौवा है...*
*जो आपस में मिलजुल, भाईचारे से रहना चाहते हैं, वे हंस प्रवृत्ति के हैं..जो झगड़े कर एक दूजे को मारने लूटने की प्रवृत्ति रखते हैं, वे कौवे की प्रवृति के हैं..*
*कार्यालय में, व्यवसाय में, समाज में या किसी संगठन में हो जो किसी सहयोगी साथी की गलती या कमियों को बढ़ा चढ़ा के बताते हैं, उसको हानि पहुंचाने के लिए उकसाते हैं...वे कौवे जैसे हैं..और जो किसी सहयोगी, साथी की गलती, कमियों  पर भी विशाल ह्रदय रख कर अनदेखी करते हुए क्षमा करने को कहते हैं, वे हंस प्रवृत्ति के है..*

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शनिवार, 16 अप्रैल 2022

नज़रिया

 

*छोटी छोटी ख़ुशी का आनन्द ले*

एक दिन एक प्रोफ़ेसर अपनी क्लास में आते ही बोला, *“चलिए, surprise test के लिए तैयार हो जाइये।*

सभी स्टूडेंट्स घबरा गए…कुछ किताबों के पन्ने पलटने लगे तो *कुछ सर के दिए नोट्स जल्दी-जल्दी पढने लगे।*

पेपर बाँट दिए गए। “ठीक है! अब आप पेपर देख सकते हैं!”, प्रोफेसर ने निर्देश दिया। अगले ही क्षण सभी question paper को निहार रहे थे, पर ये क्या *इसमें तो कोई प्रश्न ही नहीं था! था तो सिर्फ वाइट पेपर पर एक ब्लैक स्पॉट!*

ये क्या सर, इसमें तो कोई question ही नहीं है?, एक छात्र खड़ा होकर बोला। *प्रोफ़ेसर बोले, “जो कुछ भी है आपके सामने है, आपको बस इसी को एक्सप्लेन करना है*… और इस काम के लिए आपके पास सिर्फ 10 मिनट हैं…चलिए शुरू हो जाइए…”

स्टूडेंट्स के पास कोई चारा नहीं था…वे अपने-अपने answers लिखने लगे। *समय ख़त्म हुआ, प्रोफेसर ने answer sheets collect कीं और बारी-बारी से उन्हें पढने लगे।*

*लगभग सभी ने ब्लैक स्पॉट को अपनी-अपनी तरह से समझाने की कोशिश की थी लेकिन किसी ने भी उस स्पॉट के चारों ओर मौजूद white space के बारे में बात नहीं की थी।*

प्रोफ़ेसर गंभीर होते हुए बोले, “इस टेस्ट का आपके academics से कोई लेना-देना नहीं है और न ही मैं इसके कोई मार्क्स देने वाला हूँ…. इस टेस्ट के पीछे मेरा एक ही मकसद है….

*मैं आपको जीवन का सच बताना चाहता हूँ…देखिये…*

इस पूरे पेपर का 99% हिस्सा सफ़ेद है, लेकिन आप में से किसी ने भी इसके बारे में नहीं लिखा और *अपना 100% answer सिर्फ उस एक चीज को explain करने में लगा दिया जो मात्र 1% है और यही बात हमारे life में भी देखने को मिलती है ।*

*समस्याएँ, हमारे जीवन का एक छोटा सा हिस्सा होती हैं, लेकिन हम अपना पूरा ध्यान इन्ही पर लगा देते हैं…*

कोई दिन रात अपने looks को लेकर परेशान रहता है तो कोई अपने करियर को लेकर चिंता में डूबा रहता है तो कोई और बस पैसों का रोना रोता रहता है।

*हम क्यों नहीं अपनी blessings को count करके खुश होते हैं… क्यों नहीं हम पेट भर खाने के लिए भगवान को थैंक्स कहते हैं ?*

हम क्यों नहीं अपनी प्यारी सी फॅमिली के लिए शुक्रगुजार होते हैं….

*क्यों नहीं हम लाइफ की उन 99% चीजों की तरफ ध्यान देते हैं, जो सचमुच हमारे जीवन को अच्छा बनाती हैं।*

*आज से हम जीवन की problems को ज़रुरत से ज्यादा seriously लेना छोडें और जीवन की छोटी-छोटी खुशियों को enjoy करना सीखें यही जीवन का सच है….तभी हम ज़िन्दगी को सही मायने में जी पायेंगे….।*

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शनिवार, 9 अप्रैल 2022

परनिन्दा

 

गाँव के बीच शिव मन्दिर में एक संन्यासी रहा करते थे। मंदिर के ठीक सामने ही एक वेश्या का मकान था। वेश्या के यहाँ रात−दिन लोग आते−जाते रहते थे। यह देखकर संन्यासी मन ही मन कुड़−कुड़ाया करता। एक दिन वह अपने को नहीं रोक सका और उस वेश्या को बुला भेजा। उसके आते ही फटकारते हुए कहा—‟तुझे शर्म नहीं आती पापिन, दिन रात पाप करती रहती है। मरने पर तेरी क्या गति होगी?”

संन्यासी की बात सुनकर वेश्या को बड़ा दुःख हुआ। वह मन ही मन पश्चाताप करती भगवान से प्रार्थना करती अपने पाप कर्मों के लिए क्षमा याचना करती।

बेचारी कुछ जानती नहीं थी। बेबस उसे पेट के लिए वेश्यावृत्ति करनी पड़ती किन्तु दिन रात पश्चाताप और ईश्वर से क्षमा याचना करती रहती।

उस संन्यासी ने यह हिसाब लगाने के लिए कि उसके यहाँ कितने लोग आते हैं एक−एक पत्थर गिनकर रखने शुरू कर दिये। जब कोई आता एक पत्थर उठाकर रख देता। इस प्रकार पत्थरों का बड़ा भारी ढेर लग गया तो संन्यासी ने एक दिन फिर उस वेश्या को बुलाया और कहा “पापिन? देख तेरे पापों का ढेर? यमराज के यहाँ तेरी क्या गति होगी, अब तो पाप छोड़।”

पत्थरों का ढेर देखकर अब तो वेश्या काँप गई और भगवान से क्षमा माँगते हुए रोने लगी। अपनी मुक्ति के लिए उसने वह पाप कर्म छोड़ दिया। कुछ जानती नहीं थी न किसी तरह से कमा सकती थी। कुछ दिनों में भूखी रहते हुए कष्ट झेलते हुए वह मर गई।

उधर वह संन्यासी भी उसी समय मरा। यमदूत उस संन्यासी को लेने आये और वेश्या को विष्णु दूत। तब संन्यासी ने बिगड़कर कहा “तुम कैसे भूलते हो। जानते नहीं हो मुझे विष्णु दूत लेने आये हैं और इस पापिन को यमदूत। मैंने कितनी तपस्या की है भजन किया है, जानते नहीं हो।”

यमदूत बोले “हम भूलते नहीं, सही है। वह वेश्या पापिन नहीं है पापी तुम हो। उसने तो अपने पाप का बोध होते ही पश्चाताप करके सच्चे हृदय से भगवान से क्षमा याचना करके अपने पाप धो डाले। अब वह मुक्ति की अधिकारिणी है और तुमने सारा जीवन दूसरे के पापों का हिसाब लगाने की पाप वृत्ति में, पाप भावना में जप तप छोड़ छाड़ दिए और पापों का अर्जन किया। भगवान के यहाँ मनुष्य की भावना के अनुसार न्याय होता है। बाहरी बाने या दूसरों को उपदेश देने से नहीं।

परनिन्दा,छिद्रान्वेषण, दूसरे के पापों को देखना उनका हिसाब करना, दोष दृष्टि रखना अपने मन को मलीन बनाना ही तो है।

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शुक्रवार, 8 अप्रैल 2022

 

राज शेखर तिवारी जी ने बताया कि
कोई डॉक्टर जितेंद्र कुमार हैं अलीगढ़ विश्वविद्यालय में ,  उन्होंने कुछ स्लाइड्स बनवा कर दिखायी है , उसमें बाक़ी बकवास जो उन्होंने करी है उस पर मैं स्पष्ट रूप से सनातन धर्म का दृष्टिकोण रख देता हूँ, आप लोग पोस्ट सुरक्षित रख कर यह उत्तर सोशल मीडिया के माध्यम से औरों को दें ..

01. पहला प्वाइंट उस मुर्ख ने ब्रह्मा और सरस्वती का दिया है । यह दोनों अवतारी देवता न होकर केवल आध्यात्मिक देवता हैं । अध्यात्म अर्थात् शरीर के अंदर , आपके मन में । भौतिक रूप से नहीं बल्कि सूक्ष्म रूप से इसे समझें ।

थोड़ी देर के लिए ब्रह्मा सरस्वती भूल जाएँ ।

आपका अपना मन , आपकी अपनी बुद्धि, आपका अपना चित् और आपका अपना अहंकार ही आपका अंतःकरण है । यही चारों चार मुँह वाले ब्रह्मा हैं ।

अब आपकी मेरी या धूर्त जितेंद्र कुमार की वाणी कहाँ से उत्पन्न होती है ? मन से । अर्थात् वह वाणी ही सरस्वती है , और मन से उत्पन्न होने के कारण , वह वाणी आपकी बेटी है ।

अब वाणी रहती कहाँ है ? वह रहती है आपके साथ ? और जो जीवन भर आपके साथ रहे वह आपकी पत्नी ।

तो पुराणों की यह भाषा है , अंतःकरण और वाणी के समष्टि को समझाने की ।

ब्रह्मा की सृष्टि मानसिक सृष्टि थी । बाद में प्रजापति इत्यादि के द्वारा भौतिक सृष्टि सृजन हुयी । क्योंकि मानसिक सृष्टि से व्यवहार चल ही नहीं सकता ।

02. दूसरा प्वांइट जलंधर के वध संबंधित है । यहाँ पर सतीत्व की महिमा बतायी गयी है ।

जलंधर ने पूरे विश्व में आतंक मचा रखा था पर उसका वध केवल इसलिए नहीं हो पा रहा था क्योंकि उसकी पत्नी वृंदा ( तुलसी ) एक सती थी , और जब तक वृंदा का सतीत्व भंग नहीं होता तब तक जलंधर का न तो वध होता और न ही विश्व का कल्याण ।

अब बड़ी बात क्या थी तो विश्व के कल्याण के लिए वृंदा का सतीत्व भंग किया गया ..

पर क्या इससे वृंदा या तुलसी की निंदा हुयी सनातन धर्म में ? नहीं वह पूजनीय हो गयीं और आज भी वृंदावन में नित्य विहार कर रही हैं । वृंदा ने नारायण को पत्थर रूप में अपने समक्ष रहने को कहा और आज भी ठाकुर जी ( श्री शालिग्राम) पत्थर के जैसे जड़ बनकर रहते हैं । तुलसी के अतिरिक्त नारायण को पत्थर बनाने का सामर्थ्य किसी और में नहीं आया ।

03. और तीसरी कथा रामावतार की है । इंद्र सभी इंद्रियों ( ग्यारहों ) का राजा होता है और जैसे व्यष्टि में हम बहक जाते हैं वैसे ही समष्टि में वह बहक गया , और आपको पता ही है की रामावतार में राम नहीं चाहते थे की लोग उन्हें ईश्वर रूप में पहचानें पर एक काम उन्हें ऐसा करना था की बाद में लोग कह सकें ऐसा करना तो केवल ईश्वर के लिए ही संभव है ,

और वह था किसी स्त्री जिसका शील भंग हुआ हो उसे पुनः सती बना देना , अहनी लियते इति अहिल्या । और आज भी अहिल्या की गिनती सती अहिल्या के रूप में होती है । वहाँ , ईश्वरीय पहचान करायी गयी है न की इंद्र का कुकृत्य ।

अपेक्षा करता हूँ की आप लोग इन उत्तर को और भी लोगों तक पहुँचाएँगे ।

हमारे पुराणों में शास्त्रों में ऐसा कुछ भी नहीं है जिस पर आपको ग्लानि करनी है बस उन कथाओं के उद्देश्य को समझना है ।
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