रविवार, 27 अगस्त 2023

कहानी

 

   कहानी
     आज बाबूजी की तेरहवीं है। नाते-रिश्तेदार इकट्ठे हो रहे हैं पर उनकी बातचीत, हँसी मज़ाक देख-सुनकर उसका मन दुखी हो रहा है.."कोई किसी के दुख में भी कैसे हँसी मज़ाक कर सकता है? पर किससे कहे,किसे मना करे" इसीलिये वह बाबूजी की तस्वीर के सामने जाकर आँख बंद करके चुपचाप बैठ गई।

अभी बीस दिन पहले ही की तो बात है.. वह रक्षाबंधन पर मायके आई थी। तब बाबूजी कितने कमजोर लग रहे थे। सबके बीच होने के बावजूद उसे लगा कि जैसे वह कुछ कहना चाहते हों फिर मौका मिलते ही फुसफुसा कर धीरे से बोले भी थे .."बिट्टू... रमा तुम्हारी भाभी हमको भूखा मार देगी। आधा पेट ही खाना देती है, दोबारा माँगने पर कहती है कि परेशान ना करो ,जितना देते हैं उतना ही खा लिया करो। ज़्यादा खाओगे तो नुकसान करेगा फिर परेशान हम लोगों को करोगे " कहते-कहते उनका गला भर आया।
" पर कभी आपने बताया क्यों नही बाबूजी?"  सुनकर सन्न रह गई वह और तुरंत अपने साथ लाई मिठाई से चार पीस बर्फी के निकाल कर बाबूजी को दे दिये। वह लगभग झपट पड़े..और जल्दी-जल्दी खाने लगे.. ऐसा लग रहा था मानों बरसों से उन्होंने कुछ खाया ही ना हो।

"अरे,अरे,,,,इतना मत खिलाओ बिट्टू। तुम तो चली जाओगी पर अभी पेट ख़राब हो जायेगा तो हमको ही भुगतना पड़ेगा" तभी भाभी ने आकर ताना दिया।
तब मन मसोस कर वह रह गई थी और चलते-चलते दबे शब्दों में उसने भाभी से कुछ दिनों के लिए बाबूजी को अपने साथ ले जाने की बात कही तो भाभी तो कुछ न बोलीं पर भइया भड़क गये.."सारी उम्र किया है..तो अब भी कर लेंगें। वैसे तूने ये बात क्यों कही? कुछ कहा क्या बाबूजी ने ?"

"नही भइया, नही.." वह हड़बड़ा गई और बाकी के शब्द उसके मन में ही रह गए। बड़े भाई से जवाब-सवाल कर भी कैसे सकती थी ? बचपन से ही बेटियों को भाइयों से दबकर रहने का संस्कार जो कूट कूट कर भरा जाता है..पर जाते-जाते उसने एक बार पलटकर देखा तो उसके जन्मदाता तरसी निगाहों से उसे ही देख रहे थे। तब क्या पता था कि ये उनकी आख़िरी मुलाकात है।

इसके पाँच दिन बाद ही खब़र मिली कि "बाबूजी की हालत ठीक नहीं है,वो अस्पताल में हैं ..आकर मिल जाओ" सुनकर छटपटा उठी वह और दूसरे दिन ही उनके पास पहुँच गई।

बाबूजी अर्धमूर्छित से थे,उसको पहचान भी नही पाये! वह उनके कान में फुसफुसाई "बाबूजी, देखिये मैं आपकी बिट्टू"
कई बार आवाज़ देने पर बामुश्किल उनकी आँखें हिली.. "बि..ट्टू.. भू..ख.." उनकी अस्फुट सी आवाज़ सुनकर वह यूँ खुश हो गई मानो बरसों के प्यासे को जी भर के पानी पीने को मिल गया हो ..."बताइये,क्या खाना है बाबूजी..?" पूछते हुए उसकी आँखे भर आईं।

"आ,,लू  टमाटर की स,,ब्ज़ी रो,,टी .." लड़खड़ाती आवाज़ में उनके मुँह से बोल निकले। जल्दी से उसने इंतज़ाम भी किया..पर देर हो चुकी थी! बाबूजी बगैर खाये पिये,भूखे ही इस सँसार से चले गये।

"बिट्टू,,बिट्टू ,,,,चलो,खाना खा लो" अचानक भइया की आवाज़ सुनकर वह चौंक पड़ी।
"खाना?" वह धीरे से बोली "भूख नही है भइया"
बिट्टू थोड़ा सा खा लो भइया ने फिर कहा वह कुछ न बोली !

चुपचाप उठकर घरबालों वाले बिछे आसन पर बैठ गई। थाली में तरह-तरह के पकवान परोसे जा रहे थे। उसकी आँखों से आँसू बह निकले! कानों में बाबूजी के आख़िरी शब्द गूँज रहे थे..."आलू टमाटर की सब्जी,रोटी"

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गौरवशाली इतिहास

हमारा इतिहास - गौरवशाली इतिहास
   आज अगर कोई कहे कि घर में पूजा है, तो ये माना जा सकता है कि #सत्यनारायण_कथा होने वाली है। ऐसा हमेशा से नहीं था। दो सौ साल पहले के दौर में घरों में होने वाली पूजा में सत्यनारायण कथा सुनाया जाना उतना आम नहीं था। हरि विनायक ने कभी 1890 के आस पास #स्कन्द_पुराण में मौजूद इस संस्कृत कहानी का जिस रूप में अनुवाद किया, हमलोग लगभग वही सुनते हैं। हरि विनायक की आर्थिक स्थिति बहुत मजबूत नहीं थी। वो दरबारों और दूसरी जगहों पर कीर्तन गाकर आजीविका चलाते थे।

कुछ तो आर्थिक कारणों से और कुछ अपने बेटों को अपना काम सिखाने के लिए उन्होंने अपनी कीर्तन मंडली में अलग से कोई संगीत बजाने वाले नहीं रखे। उन्होंने अपने तीनों बेटों को इसी काम में लगा रखा था। दामोदर, बालकृष्ण और वासुदेव को इसी कारण कोई ख़ास स्कूल की शिक्षा नहीं मिली। हाँ ये कहा जा सकता है कि संस्कृत और मराठी जैसी भाषाएँ इनके लिए परिवार में ही सीख लेना बिलकुल आसान था। ऊपर से लगातार दरबार जैसी जगहों पर आने जाने के कारण अपने समय के बड़े पंडितों के साथ उनका उठना बैठना था। दामोदर हरि अपनी आत्मकथा में भी यही लिखते हैं कि दो चार परीक्षाएं पास करने से बेहतर शिक्षा उन्हें ज्ञानियों के साथ उठने बैठने के कारण मिल गयी थी।

आज अगर पूछा जाए तो हरि विनायक को उनके सत्यनारायण कथा के अनुवाद के लिए तो नहीं ही याद किया जाता। उन्हें उनके बेटों की वजह से याद किया जाता है। सर्टिफिकेट के आधार पर जो तीनों कम पढ़े-लिखे बेटे थे। अपनी पत्नी के साथ हरि विनायक पुणे के पास रहते थे। आज जिसे इंडस्ट्रियल एरिया माना जाता है, वो चिंचवाड़ उस दौर में पूरा ही गाँव हुआ करता था। 1896 के अंत में पुणे में प्लेग फैला और 1897 की फ़रवरी तक इस बीमारी ने भयावह रूप धारण कर लिया। ब्युबोनिक प्लेग से जितनी मौतें होती हैं, पुणे के उस प्लेग में उससे दोगुनी दर से मौतें हो रही थीं। तबतक भारत के अंतिम बड़े स्वतंत्रता संग्राम को चालीस साल हो चुके थे और फिरंगियों ने पूरे भारत पर अपना शिकंजा कस रखा था।

अंग्रेजों को दहेज़ में मिले मुंबई (तब बॉम्बे) के इतने पास प्लेग के भयावह स्वरूप को देखते हुए आईसीएस अधिकारी वाल्टर चार्ल्स रैंड को नियुक्त किया गया। उसे प्लेग के नियंत्रण के तरीके दमनकारी थे। उसके साथ के फौजी अफसर घरों में जबरन घुसकर लोगों में प्लेग के लक्षण ढूँढ़ते और उन्हें अलग कैंप में ले जाते। इस काम के लिए वो घरों में घुसकर औरतों-मर्दों सभी को नंगा करके जांच करते। तीनों भाइयों को साफ़ समझ में आ रहा था कि महिलाओं के साथ होते इस दुर्व्यवहार के लिए वाल्टर रैंड ही जिम्मेदार है। उन्होंने देशवासियों के साथ हो रहे इस दमन के विरोध में वाल्टर रैंड का वध करने की ठान ली।

थोड़े समय बाद (22 जून 1887 को) रानी विक्टोरिया के राज्याभिषेक की डायमंड जुबली मनाई जाने वाली थी। दामोदर, बालकृष्ण और वासुदेव ने इसी दिन वाल्टर रैंड का वध करने की ठानी। हरेक भाई एक तलवार और एक बन्दूक/पिस्तौल से लैस होकर निकले। आज जिसे सेनापति बापत मार्ग कहा जाता है, वो वहीँ वाल्टर रैंड का इन्तजार करने वाले थे मगर ढकी हुई सवारी की वजह से वो जाते वक्त वाल्टर रैंड की सवारी पहचान नहीं पाए। लिहाजा अपने हथियार छुपाकर दामोदर हरि ने लौटते वक्त वाल्टर रैंड का इंतजार किया। जैसे ही वाल्टर रवाना हुआ, दामोदर हरि उसकी सवारी के पीछे दौड़े और चिल्लाकर अपने भाइयों से कहा “गुंडया आला रे!”
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सवारी का पर्दा खींचकर दामोदर हरि ने गोली दाग दी। उसके ठीक पीछे की सवारी में आय्रेस्ट नाम का वाल्टर का ही फौजी एस्कॉर्ट था। बालकृष्ण हरि ने उसके सर में गोली मार दी, उसकी फ़ौरन मौत हो गयी। वाल्टर फ़ौरन नहीं मरा था, उसे ससून हॉस्पिटल ले जाया गया, 3 जुलाई 1897 को उसकी मौत हुई। इस घटना की गवाही द्रविड़ बंधुओं ने दी थी। उनकी पहचान पर दामोदर हरि गिरफ्तार हुए और उन्हें 18 अप्रैल 1898 को फांसी दी गयी। बालकृष्ण हरि भागने में कामयाब तो हुए मगर जनवरी 1899 को किसी साथी की गद्दारी की वजह से पकड़े गए। बालकृष्ण हरि को 12 मई 1899 को फांसी दी गयी।

भाई के खिलाफ गवाही देने वाले द्रविड़ बंधुओं का वासुदेव हरि ने वध कर दिया था। अपने साथियों महादेव विनायक रानाडे और खांडो विष्णु साठे के साथ उन्होंने उसी शाम (9 फ़रवरी 1899) को पुलिस के चीफ कांस्टेबल रामा पांडू को भी मारने की कोशिश की मगर पकड़े गए। वासुदेव हरि को 8 मई 1899 और महादेव रानाडे को 10 मई 1899 को फांसी दी गयी। खांडो विष्णु साठे उस वक्त नाबालिग थे इसलिए उन्हें दस साल कैद-ए-बामुशक्कत सुनाई गयी।

मैंने स्कूल के इतिहास में भारत का स्वतंत्रता संग्राम पढ़ते वक्त दामोदर चापेकर, बालकृष्ण चापेकर और वासुदेव चापेकर की कहानी नहीं पढ़ी थी। जैसे पटना में सात शहीदों की प्रतिमा दिखती है वैसे ही चापेकर बंधुओं की मूर्तियाँ पुणे के चिंचवाड में लगी हैं। उनकी पुरानी किस्म की बंदूकें देखकर जब हमने पूछा कि ये क्या 1857 के सेनानी थे? तब चापेकर बंधुओं का नाम और उनकी कहानी मालूम पड़ी। भारत के स्वतंत्रता संग्राम को अहिंसक साबित करने की जिद में शायद इनका नाम किताबों में शामिल करना उपन्यासकारों को जरूरी नहीं लगा होगा। काफी बाद में (2018) भारत सरकार ने दामोदर हरि चापेकर का डाक टिकट जारी किया है।

बाकी इतिहास खंगालियेगा तो चापेकर के किये अनुवाद से पहले, सत्यनारायण कथा के पूरे भारत में प्रचलित होने का कोई पुराना इतिहास नहीं निकलेगा। चापेकर बंधुओं को किताबों और फिल्मों आदि में भले कम जगह मिली हो, धर्म अपने बलिदानियों को कैसे याद रखता है, ये अगली बार सत्यनारायण की कथा सुनते वक्त जरूर याद कर लीजियेगा। धर्म है, तो राष्ट्र भी है!
।।।

रविवार, 20 अगस्त 2023

कहानी मां का आशीर्वाद

 

कहानी

माँ का आशीर्वाद
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दुकान बंद करने का समय हो आया था। तभी दो औरतें और आ गईं। तभी उनमें से एक बोली "भैया साड़ियां दिखाना कॉटन की, चुनरी प्रिंट में"

आज मेरी खुशी का ठिकाना नहीं है। आज पाँच महीने हो गए हैं, अपनी ये छोटी सी दुकान खोले, आज से पहले कभी ऐसा नहीं हुआ। आज सुबह से दस पंद्रह कस्टमर आ चुके हैं। और बिक्री भी ठीक ठाक हो गई है। सच बोलूं तो इस दुकान का किराया निकालना भी बहुत मुश्किल हो रहा था। रोज एक या दो साड़ी तो कभी एक सूट ही बेच पाता था। या कभी सिर्फ एक दो दुपट्टे ही।

मैंने माँ की सारी जमा पूंजी लगा दिया है। सोचा था, माल ठीक रखूंगा तो लोग आएंगे ही। लेकिन लोग आते ही नहीं थे। दुकान भी मेन रोड से सटे एक पतली सी गली में मिली है। लोगों को तो ठीक से दिखता भी नहीं होगा। पर एक बोर्ड मेन रोड पर लगा रखा है मैंने।

सामने मेन रोड पर ही एक सरदार जी की साड़ियों की दुकान है। इस छोटे शहर के ज्यादातर लोग उन्हीं की बड़ी दुकान से कपड़े लेते हैं। रोज सैकड़ों कस्टमर उनके दुकान पर आते हैं। पर लगता है, माँ के आशीर्वाद से उनके दुकान की रौनक मैं अब कुछ कम कर दूँगा।

आज खुशी के साथ हैरानी भी हो रही है। कल ही तो माँ से मैं फोन पर दुकान बंद कर गली से निकलते हुए बातें कर रहा था।

"माँ चाचा ने ठीक ही कहा था कोई छोटी मोटी नौकरी कर ले। दुकान चलाना तेरे बस की बात नहीं। और इतनी पगड़ी देकर दुकान भी मिली तो एक गली में जहां ग्राहक ही नहीं पहुंच पाते। सारे ग्राहक तो मेन रोड पर बड़ी दुकान पर चले जाते हैं। किराया निकालना भी मुश्किल हो रहा है। परिवार कैसे चलेगा माँ, और बच्चों को कहां से पढ़ा पाऊंगा" 

मैं कल बहुत मायूस था। और परेशान भी। सच बताऊँ तो कल मैं रो पड़ा था माँ से ये सब कहते हुए।

"कोई नहीं बेटा। अब दुकान खोल ही लिया है तो धैर्य रख। किसी चीज़ में सफलता अचानक नहीं मिलती। देखना भगवान सब ठीक करेंगे"

माँ का आशीर्वाद ही है। कल ही उन्होंने कहा और आज दुकान पर थोड़ी रौनक हो आई है।

"ये दोनों पैक कर दीजिए"

उन्हें साड़ियां पसंद आ गई थीं। मैं उनका बिल बनाने लगा। तभी एक औरत बोल पड़ी "सरदार जी ने ठीक ही कहा था कि कॉटन की साड़ियां भी अच्छी मिल जाएगी यहां पर और दाम भी ठीक लगाते हैं"

"जी कौन सरदार जी?" मैं पूछ पड़ा।

"यही अपने बूटा जी साड़ी वाले। उनके पास चुनरी प्रिंट की साड़ियां नहीं थीं।"

मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ। बूटा जी अपने कस्टमर यहां क्यों भेज रहे हैं। उनके यहां तो खुद सारे कलेक्शन होते हैं। मैंने पैसे लेकर गल्ले में रख लिया। दुकान को बंद करके सरदार जी के दुकान पर पहुंचा। वे भी दुकान बंद ही कर रहे थे।

"बूटा सिंह जी, आपने अपने ग्राहकों को मेरी दुकान पर भेजा?"

"ओए नहीं जी! बस उन्हें जो चाहिए था वो मेरी दुकान पर नहीं था तो आपकी दुकान बता दिया।"

मैं जानता हूँ। इनके दुकान पर सब सामान होता है। उनके वर्कर साड़ियां समेट रहे थे। उनमें कुछ वैसी ही साड़ियां भी थी जैसी साड़ियां मैंने अभी अभी बेची थी। मैं ये देख फिर उनकी तरफ देखा।

"इसमें आपका नुकसान नहीं होगा बूटा सिंह जी?"

"नुकसान की क्या बात है जी, सबकी गृहस्थी चलनी चाहिए। तुम्हारा भी तो परिवार है।"

शायद इन्होंने कल फोन पर माँ से मेरी बात सुन ली थी।

"मैं इस बात पर खुश हो रहा था कि ये सब माँ के आशीर्वाद से हो रहा है पर ये सब तो आप..?"

"ओए नहीं पुत्तर! ये सब माँ का ही आशीर्वाद है, हम सब की माएँ तो एक सी ही होती हैं ना!"

उन्हें देख, मैं खुद अपनी सोच पर शर्मिंदा था। मेरी आँखें नम हो आईं। वे मेरे कंधे पर हाथ रख ये कहते हुए निकल गए।

"मेरी माँ ने मुझसे ये कहा था, अपने साथ साथ दूसरों के पेट का भी थोड़ा ख्याल रखना।"

मुझे इस कॉम्पटीशन के दौर में ऐसी बातों की, कतई उम्मीद नहीं थी।
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शनिवार, 12 अगस्त 2023

बात गौरवशाली इतिहास की - हमारे आसपास की

 

मुग़ल बादशाह शाहजहाँ लाल किले में तख्त-ए-ताऊस पर बैठा हुआ था ।

दरबार का अपना सम्मोहन होता है और इस सम्मोहन को राजपूत वीर अमर सिंह राठौर ने अपनी पद चापों से भंग कर दिया । अमर सिंह राठौर शाहजहां के तख्त की तरफ आगे बढ़ रहे थे । तभी मुगलों के सेनापति सलावत खां ने उन्हें रोक दिया ।

सलावत खां - ठहर जाओ अमर सिंह जी, आप 8 दिन की छुट्टी पर गए थे और आज 16वें दिन तशरीफ़ लाए हैं ।

अमर सिंह - मैं राजा हूँ । मेरे पास रियासत है फौज है, मैं किसी का गुलाम नहीं ।

सलावत खां - आप राजा थे ।अब सिर्फ आप हमारे सेनापति हैं, आप मेरे मातहत हैं । आप पर जुर्माना लगाया जाता है । शाम तक जुर्माने के सात लाख रुपए भिजवा दीजिएगा ।

अमर सिंह - अगर मैं जुर्माना ना दूँ ।

सलावत खां- (तख्त की तरफ देखते हुए) हुज़ूर, ये काफि़र आपके सामने हुकूम उदूली कर रहा है ।

अमर सिंह के कानों ने काफि़र शब्द सुना । उनका हाथ तलवार की मूंठ पर गया, तलवार बिजली की तरह निकली और सलावत खां की गर्दन पर गिरी ।

मुगलों के सेनापति सलावत खां का सिर जमीन पर आ गिरा । अकड़ कर बैठा सलावत खां का धड़ धम्म से नीचे गिर गया । दरबार में हड़कंप मच गया । वज़ीर फ़ौरन हरकत में आया और शाहजहां का हाथ पकड़कर उन्हें सीधे तख्त-ए-ताऊस के पीछे मौजूद कोठरीनुमा कमरे में ले गया । उसी कमरे में दुबक कर वहां मौजूद खिड़की की दरार से वज़ीर और बादशाह दरबार का मंज़र देखने लगे ।

दरबार की हिफ़ाज़त में तैनात ढाई सौ सिपाहियों का पूरा दस्ता अमर सिंह पर टूट पड़ा था । देखते ही देखते अमर सिंह ने शेर की तरह सारे भेड़ियों का सफ़ाया कर दिया ।

बादशाह - हमारी 300 की फौज का सफ़ाया हो गया्, या खुदा ।

वज़ीर - जी जहाँपनाह ।

बादशाह - अमर सिंह बहुत बहादुर है, उसे किसी तरह समझा बुझाकर ले आओ । कहना, हमने माफ किया ।

वज़ीर - जी जहाँपनाह ।

हुजूर, लेकिन आँखों पर यक़ीन नहीं होता । समझ में नहीं आता, अगर हिंदू इतना बहादुर है तो फिर गुलाम कैसे हो गया ?

बादशाह - सवाल वाजिब है, जवाब कल पता चल जाएगा ।

अगले दिन फिर बादशाह का दरबार सजा ।

शाहजहां - अमर सिंह का कुछ पता चला ।

वजीर- नहीं जहाँपनाह, अमर सिंह के पास जाने का जोखिम कोई नहीं उठाना चाहता है।

शाहजहां - क्या कोई नहीं है जो अमर सिंह को यहां ला सके ?

दरबार में अफ़ग़ानी, ईरानी, तुर्की, बड़े बड़े रुस्तम -ए- जमां मौजूद थे, लेकिन कल अमर सिंह के शौर्य को देखकर सबकी हिम्मत जवाब दे रही थी।

आखिर में एक राजपूत वीर आगे बढ़ा, नाम था अर्जुन सिंह।

अर्जुन सिंह - हुज़ूर आप हुक्म दें, मैं अभी अमर सिंह को ले आता हूँ।

बादशाह ने वज़ीर को अपने पास बुलाया और कान में कहा, यही तुम्हारे कल के सवाल का जवाब है।

हिंदू बहादुर है लेकिन वह इसीलिए गुलाम हुआ। देखो, यही वजह है।

अर्जुन सिंह अमर सिंह के रिश्तेदार थे। अर्जुन सिंह ने अमर सिंह को धोखा देकर उनकी हत्या कर दी। अमर सिंह नहीं रहे लेकिन उनका स्वाभिमान इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में प्रकाशित है। इतिहास में ऐसी बहुत सी कथाएँ हैं जिनसे सबक़ लेना आज भी बाकी है ।

*~शाहजहाँ के दरबारी, इतिहासकार और यात्री अब्दुल हमीद लाहौरी की किताब बादशाहनामा से ली गईं ऐतिहासिक कथा।*
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