गुरुवार, 6 अप्रैल 2023

सिन्दूर

 

महायुद्ध समाप्त हो चुका था। जगत को त्रास देने वाला रावण अपने कुटुंब सहित नष्ट हो चुका था। कौशलाधीश राम के नेतृत्व में चहुँओर शांति थी।

राम का राज्याभिषेक हुआ। राजा राम ने सभी वानर और राक्षस मित्रों को ससम्मान विदा किया। अंगद को विदा करते समय राम रो पड़े थे। हनुमान को विदा करने की शक्ति तो श्रीराम में भी नहीं थी। माता सीता भी उन्हें पुत्रवत मानती थी। हनुमान अयोध्या में ही रह गए।

राम दिन भर दरबार में, शासन व्यवस्था में व्यस्त रहे। संध्या जब शासकीय कार्यों से छूट मिली तो गुरु और माताओं का कुशलक्षेम पूछ अपने कक्ष में आए। हनुमान उनके पीछे-पीछे ही थे। राम के निजी कक्ष में उनके सारे अनुज अपनी-अपनी पत्नियों के साथ उपस्थित थे। वनवास, युद्ध, और फिर अंनत औपचारिकताओं के पश्चात यह प्रथम अवसर था जब पूरा परिवार एक साथ उपस्थित था। राम, सीता और लक्ष्मण को तो नहीं, कदाचित अन्य वधुओं को एक बाहरी, अर्थात हनुमान का वहाँ होना अनुचित प्रतीत हो रहा था। चूंकि शत्रुघ्न सबसे छोटे थे, अतः वे ही अपनी भाभियों और अपनी पत्नी की इच्छापूर्ति हेतु संकेतों में ही हनुमान को कक्ष से जाने के लिए कह रहे थे। पर आश्चर्य की बात कि हनुमान जैसा ज्ञाता भी यह मामूली संकेत समझने में असमर्थ हो रहा था।

अस्तु, उनकी उपस्थिति में ही बहुत देर तक सारे परिवार ने जी भर कर बातें की। फिर भरत को ध्यान आया कि भैया-भाभी को भी एकांत मिलना चाहिए। उर्मिला को देख उनके मन में हूक उठती थी। इस पतिव्रता को भी अपने पति का सानिध्य चाहिए। अतः उन्होंने राम से आज्ञा ली, और सबको जाकर विश्राम करने की सलाह दी। सब उठे और राम-जानकी का चरणस्पर्श कर जाने को हुए। परन्तु हनुमान वहीं बैठे रहे। उन्हें देख अन्य सभी उनके उठने की प्रतीक्षा करने लगे कि सब साथ ही निकले बाहर।

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राम ने मुस्कुराते हुए हनुमान से कहा, "क्यों वीर, तुम भी जाओ। तनिक विश्राम कर लो।"

हनुमान बोले, "प्रभु, आप सम्मुख हैं, इससे अधिक विश्रामदायक भला कुछ हो सकता है? मैं तो आपको छोड़कर नहीं जाने वाला।"

शत्रुघ्न तनिक क्रोध से बोले, "परन्तु भैया को विश्राम की आवश्यकता है कपीश्वर! उन्हें एकांत चाहिए।"

"हाँ तो मैं कौन सा प्रभु के विश्राम में बाधा डालता हूँ। मैं तो यहाँ पैताने बैठा हूँ।"

"आपने कदाचित सुना नहीं। भैया को एकांत की आवश्यकता है।"

"पर माता सीता तो यहीं हैं। वे भी तो नहीं जा रही। फिर मुझे ही क्यों निकालना चाहते हैं आप?"

"भाभी को भैया के एकांत में भी साथ रहने का अधिकार प्राप्त है। क्या उनके माथे पर आपको सिंदूर नहीं दिखता?

हनुमान आश्चर्यचकित रह गए। प्रभु श्रीराम से बोले, "प्रभु, क्या यह सिंदूर लगाने से किसी को आपके निकट रहने का अधिकार प्राप्त हो जाता है?"

राम मुस्कुराते हुए बोले, "अवश्य। यह तो सनातन प्रथा है हनुमान।"

यह सुन हनुमान तनिक मायूस होते हुए उठे और राम-जानकी को प्रणाम कर बाहर चले गए।
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प्रातः राजा राम का दरबार लगा था। साधारण औपचारिक कार्य हो रहे थे कि नगर के प्रतिष्ठित व्यापारी न्याय मांगते दरबार में उपस्थित हुए। ज्ञात हुआ कि पूरी अयोध्या में रात भर व्यापारियों के भंडारों को तोड़-तोड़ कर हनुमान उत्पात मचाते रहे थे। राम ने यह सब सुना और सैनिकों को आदेश दिया कि हुनमान को राजसभा में उपस्थित किया जाए। रामाज्ञा का पालन करने सैनिक अभी निकले भी नहीं थे कि केसरिया रंग में रंगे-पुते हनुमान अपनी चौड़ी मुस्कान और हाथी जैसी मस्त चाल से चलते हुए सभा में उपस्थित हुए। उनका पूरा शरीर सिंदूर से पटा हुआ था। एक-एक पग धरने पर उनके शरीर से एक-एक सेर सिंदूर भूमि पर गिर जाता। उनकी चाल के साथ पीछे की ओर वायु के साथ सिंदूर उड़ता रहता।

राम के निकट आकर उन्होंने प्रणाम किया। अभी तक सन्न होकर देखती सभा, एकाएक जोर से हँसने लगी। अंततः बंदर ने बंदरों वाला ही काम किया। अपनी हँसी रोकते हुए सौमित्र लक्ष्मण बोले, "यह क्या किया कपिश्रेष्ठ? यह सिंदूर से स्नान क्यों? क्या यह आप वानरों की कोई प्रथा है?"

हनुमान प्रफुल्लित स्वर में बोले, "अरे नहीं भैया। यह तो आर्यों की प्रथा है। मुझे कल ही पता चला कि अगर एक चुटकी सिंदूर लगा लो तो प्रभु राम के निकट रहने का अधिकार मिल जाता है। तो मैंने सारी अयोध्या का सिंदूर लगा लिया। क्यों प्रभु, अब तो कोई मुझे आपसे दूर नहीं कर पाएगा न?"

सारी सभा हँस रही थी। और भरत हाथ जोड़े अश्रु बहा रहे थे। यह देख शत्रुघ्न बोले, "भैया, सब हँस रहे हैं और आप रो रहे हैं? क्या हुआ?"

भरत स्वयं को सम्भालते हुए बोले, "अनुज, तुम देख नहीं रहे! वानरों का एक श्रेष्ठ नेता, वानरराज का सबसे विद्वान मंत्री, कदाचित सम्पूर्ण मानवजाति का सर्वश्रेष्ठ वीर, सभी सिद्धियों, सभी निधियों का स्वामी, वेद पारंगत, शास्त्र मर्मज्ञ यह कपिश्रेष्ठ अपना सारा गर्व, सारा ज्ञान भूल कैसे रामभक्ति में लीन है। राम की निकटता प्राप्त करने की कैसी उत्कंठ इच्छा, जो यह स्वयं को भूल चुका है। ऐसी भक्ति का वरदान कदाचित ब्रह्मा भी किसी को न दे पाएं। मुझ भरत को राम का अनुज मान भले कोई याद कर ले, पर इस भक्त शिरोमणि हनुमान को संसार कभी भूल नहीं पाएगा। हनुमान को बारम्बार प्रणाम।"
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-अजीत प्रताप सिंह लेखनी

सोमवार, 3 अप्रैल 2023

रॉन्ग नम्बर

 

चिन्तन की धारा
एक कथा पढ़ने में आई । वाक़ई वर्तमान परिलक्षित रही, सोचने को भी मजबूर करती सी है । मिलते जुलते हादसों पर नज़रिया बनाती सी ....

एक घर के मोबाइल नम्बर पर “रॉंग नम्बर” से कॉल आई.. घर की एक औरत ने कॉल रिसीव की तो सामने से किसी अनजान शख्स की आवाज़ सुनकर उसने कहा ‘सॉरी रॉंग नम्बर’ और कॉल डिस्कनेक्ट कर दी.. उधर कॉल करने वाले ने जब आवाज़ सुनी तो वो समझ गया कि ये नम्बर किसी लड़की का है, अब तो कॉल करने वाला लगातार रिडाइल करता रहता है पर वो औरत कॉल रिसीव न करती। फिर मैसेज का सिलसिला शुरू हो गया, जानू बात करो न!! मोबाइल क्यूँ रिसीव नहीं करती..?
एक बार बात कर लो यार!

उस औरत की सास बहुत मक्कार और झगड़ालू थी.. इस वाक़ये के अगले दिन जब मोबाइल की रिंग टोन बजी तो सास ने रिसीव कर लिया.. सामने से उस लड़के की आवाज़ सुनकर वो शॉक्ड रह गई, लड़का बार बार कहता रहा कि जानू! मुझसे बात क्यूँ नहीं कर रही, मेरी बात तो सुनो प्लीज़, तुम्हारी आवाज़ ने मुझे पागल कर दिया है, वगैरह वगैरह… सास ने ख़ामोशी से सुनकर मोबाइल बंद कर दिया जब रात को उसका बेटा घर आया तो उसे अकेले में बुलाकर बहू पर बदचलनी और अंजान लड़के से फोन पर बात करने का इलज़ाम लगाया..

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पति ने तुरन्त पत्नी को बुलाकर बुरी तरह मारना शुरू कर दिया, जब वो उसे बुरी तरह पीट चुका तो माँ ने मोबाइल उसके हाथ में दिया और कहा कि इसी में नम्बर है तुम्हारी बीवी के यार का.. पति ने कॉल डिटेल्स चेक की फिर एक एक करके सारे अनरीड मैसेज पढ़े तो वो गुस्से में बौखला गया.. उसने तुरन्त पत्नी को रस्सी से बाँधा और फिर से बेतहाशा पीटने लगा और उधर माँ ने लड़की के भाई को फोन किया और कहा कि हमने तुम्हारी बहन को अपने यार से मोबाइल पर बात करते और मैसेज करते हुवे पकड़ लिया है.. जिसने तुम्हारी इज़्ज़त की धज्जियां बिखेर दीं…

खबर सुनकर तुरन्त उस लड़की का भाई और उसकी माँ भी वहां पहुँच गये.. पति और सास ने इल्जाम लगाये और ताने मारे तो लड़की के भाई ने भी उसे बालों से पकड़कर खूब पीटा.. लड़की कसमें खाती रही, झूठे इलज़ाम के लिये चीखती चिल्लाती रही, अपनी सफाई देती रही जाहिल और शैतान सास और पति के आगे बेबस रही… लड़की की माँ ने अपनी बेटी से कहा कि भारतीय होकर गीता पर हाथ रखकर कसम खाओ, तो उसने नहाकर फ़ौरन सबके सामने गीता पर हाथ रखकर कसम भी खाई, मगर शैतान सास ने इसे भी नकार दिया और कहा कि जो अपने पति से गद्दारी कर सकती है तो उसके लिये गीता की कसम भी कोई मुश्किल काम नहीं है..

इसके साथ पति ने वो सारे मैसेजेस उसके भाई को दिखाये जो लड़के ने लड़की को करने के लिये किये थे.. सास ने मक्कार और चालाक कहकर आग पर घी डाल दिया.. लड़की के भाई को गुस्सा आई और उसका पारा सातवें आसमान पर जा पहुंचा, उसने तुरन्त पिस्तौल निकाली और लड़की के सर में चार गोलियां दाग दी और इस तरह एक “रॉंग नंबर” ने एक खानदान उजाड़ दिया.. 3 बच्चों को अनाथ कर दिया.. जब लड़की के दूसरे भाई को खबर हुई तो उसने अपने भाई भाभी और बहन के पति और सास के साथ उस अनजान नम्बर पर FIR दर्ज कर दी..

पुलिस साइबर ने जब मोबाइल की जांच की तो मालूम हुवा कि लड़की ने सिर्फ एक बार उस रॉंग नम्बर को रिसीव किया था, इसके बाद उस नम्बर से वो कॉल और मैसेजेस के जरिये लड़की को फंसाने के चक्कर में लगा रहा.. सारी बातें साफ़ होने के बाद जब दूसरे भाई को खबर हुई जिसने बहन को गोली मारी थी तो उसने उसी वक़्त जेल में ख़ुदकुशी कर ली और रॉंग नम्बर मिलाने वाले लड़के को पुलिस ने पकड़कर हवालात में डाल दिया और इस तरह एक “रॉंग नम्बर” ने सिर्फ तीन दिनों में एक  औरत को उसके 3 बच्चों से पूरी ज़िन्दगी के लिये दूर कर दिया और अगले 13 दिनों के अन्दर 3 बच्चे अनाथ और 2 खानदान तबाह और बर्बाद हो गये ।।

ज़रा सोचिये कि कसूरवार कौन..??
- रॉंग कॉल वाला../ सास../ शक्की  पति../गैरतमंद भाई..
/मोबाइल  ..

रविवार, 2 अप्रैल 2023

शिष्य

 

*गूरू के पास अज्ञानी बनकर जाना चाहिए !!!*

*👉🏿ज्ञान हमेशा झुककर हासिल किया जा सकता है।*

*🗣एक शिष्य गुरू के पास आया। शिष्य पंडित था और मशहूर भी, गुरू से भी ज्यादा। सारे शास्त्र उसे कंठस्थ थे। समस्या यह थी कि सभी शास्त्र कंठस्थ होने के बाद भी वह सत्य की खोज नहीं कर सका था। ऐसे में जीवन के अंतिम क्षणों में उसने गुरू की तलाश शुरू की। संयोग से गुरू मिल गए। वह उनकी शरण में पहुंचा।*
*🗣गुरू ने पंडित की तरफ देखा और कहा, 'तुम लिख लाओ कि तुम क्या-क्या जानते हो। तुम जो जानते हो, फिर उसकी क्या बात करनी है। तुम जो नहीं जानते हो, वह तुम्हें बता दूंगा।' शिष्य को वापस आने में सालभर लग गया, क्योंकि उसे तो बहुत शास्त्र याद थे। वह सब लिखता ही रहा, लिखता ही रहा। कई हजार पृष्ठ भर गए। पोथी लेकर आया। गुरू ने फिर कहा, 'यह बहुत ज्यादा है। मैं बूढ़ा हो गया। मेरी मृत्यु करीब है। इतना न पढ़ सकूंगा। तुम इसे संक्षिप्त कर लाओ, सार लिख लाओ।'*
*🗣पंडित फिर चला गया। तीन महीने लग गए। अब केवल सौ पृष्ठ थे। गुरू ने कहा, मैं 'यह भी ज्यादा है। इसे और संक्षिप्त कर लाओ।' कुछ समय बाद शिष्य लौटा। एक ही पन्ने पर सार-सूत्र लिख लाया था, लेकिन गुरू बिल्कुल मरने के करीब थे। कहा, 'तुम्हारे लिए ही रूका हूं। तुम्हें समझ कब आएगी? और संक्षिप्त कर लाओ।' शिष्य को होश आया। भागा दूसरे कमरे से एक खाली कागज ले आया। गुरू के हाथ में खाली कागज दिया। गुरू ने कहा, 'अब तुम शिष्य हुए। मुझसे तुम्हारा संबंध बना रहेगा।' कोरा कागज लाने का अर्थ हुआ, मुझे कुछ भी पता नहीं, मैं अज्ञानी हूं। जो ऐसे भाव रख सके गुरू के पास, वही शिष्य है।*
    

*🗣गुरू तो ज्ञान-प्राप्ति का प्रमुख स्त्रोत है, उसे अज्ञानी बनकर ही हासिल किया जा सकता है। पंडित बनने से गुरू नहीं मिलते।।*

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शनिवार, 1 अप्रैल 2023

प्रस्थान

 

सुमंत हाथ जोड़े खड़े थे। यह देख राम ने भी हाथ जोड़ लिए। राम प्रतीक्षा कर रहे थे कि सुमंत रथ पर चढ़कर विदा हो लें तो वे पैदल अपनी यात्रा जारी रखें। पर सुमंत थे कि जैसे सब भूल बस राम-सीता और लक्ष्मण को देखे जा रहे थे। भक्त अपने भगवन को साक्षात देख कैसे मुख फेर कर चला जाये, और भगवान भी कैसे अपने हठीले भक्त से मुँह फेर ले।

पर अंततः राम ही बोले, "तात, अब आप प्रस्थान करें। महाराज आपकी प्रतीक्षा कर रहे होंगे।"

"जैसी आज्ञा कुमार! परन्तु क्या आप, भैया लक्ष्मण और देवी सीता कोई अंतिम संदेश नहीं देना चाहते?"

"अंतिम संदेश जैसी क्या बात है तात! हम सदैव के लिए ही अयोध्या का त्याग तो कर नहीं रहे। अस्तु, आप पूज्य पिता को ढाँढस दीजिएगा। कहिएगा कि वे तो धर्मावतार हैं। ऐसे पुरुषों को अपने व्यक्तिगत सुख-दुख को न देख प्रजाहित में मग्न रहना चाहिए। उनके मात्र दो पुत्र ही तो वन में नहीं हैं! प्रजा राजा की संतान होती है। ये वनवासी भी उनके पुत्र हैं। जिनके साथ उनके दो पुत्र और आ मिले तो इसमें शोक की क्या बात है? पुरुजन भी उनके पुत्र हैं। कृपया सभी को अपना पुत्र मान, इस पुत्रशोक को मन से निकाल दें।

"माता कौशल्या से कहिएगा कि वे पटरानी होने के अहम भाव को मन में न लाएं और माता कैकई के सम्मान में कोई कमी न करें। भैया भरत अब युवराज हैं, कल को राजा होंगें। राजा वय में छोटा हो तो भी उससे सम्मानजनक व्यवहार, राजोचित व्यवहार करना चाहिए।

"भैया भरत से कहिएगा कि मेरा प्रेम सदैव उनके साथ है और मैं अपने युवराज और राजा भरत का अनुगामी हूँ। शत्रुघ्न को कहिएगा कि जैसे लक्ष्मण मेरे बल हैं, वे भरत के बल बनें।"

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राम के चुप हो जाने पर सुमंत ने लक्ष्मण की ओर देखा। लक्ष्मण बोले, "हे तात, मुझे अयोध्यानरेश को कोई भी संदेश नहीं देना। वह अब नरेश कहलाने के योग्य नहीं रहे। जो राजा एक स्त्री के बहकावे में आकर प्रजा की इच्छा की अवहेलना करे, अपने व्यक्तिगत वचन को राष्ट्र से ऊपर मान दे, न्याय को बिसार कर अपनी इच्छा से राज्य किसी को भी दे दे, वह राजा कहलाने के योग्य नहीं है। यदि किसी को यह लगता है कि वनवास देकर वह मेरे बड़े भाई का अधिकार छीन सकता है और चौदह वर्षों में पर्याप्त शक्ति जुटाकर श्रीराम के अधिकार का हनन कर सकता है तो उसे यह नहीं भूलना चाहिए कि कौशल्यानन्दन के साथ सुमित्रानन्दन लक्ष्मण खड़ा है। वह तो भ्राता ने मेरे हाथ रोक लिए, अन्यथा मैं अकेला ही सभी बाधाओं को पार कर अपने हाथों श्रीराम को अयोध्यापति ही नहीं समस्त भूमिपति बनाने की सामर्थ्य रखता हूँ। मेरे बड़े भाई के साथ ..."। लक्ष्मण अभी न जाने क्या-क्या बोलने वाले थे, पर उनका गला रुध गया था। यह देख श्रीराम ने उनके कंधे पर हाथ रख उन्हें सांत्वना दी और नेत्रों से ही शांत रह जाने का आदेश सुनाया।

सुमंत जब सीता की ओर मुड़े तो सीता कुछ बोल नहीं पाई। पति के भाग्य और देवर के दुख से दुखी बस अश्रु बहाती चुपचाप खड़ी रही। सुमंत ने अंतिम प्रमाण किया और रथ की वल्गा खींच विदा लेकर पीछे लौट चले।

उधर श्रीराम अपनी भार्या और भाई के साथ एक दिन मुनि भारद्वाज के आश्रम में बिताकर चित्रकूट की ओर बढ़े।

मार्ग में यमुना नदी को देख दोनों भाइयों ने जंगल से सूखे काठ जमाकर एक बेड़ा बनाया और नदी में उतार दिया। पहले राम चढ़े और सीता की ओर हाथ बढ़ाया। सीता लजाती हुई अपने पति का हाथ थाम नाव पर चढ़ गई। नदी में घुटनों तक उतर लक्ष्मण ने नाव को धक्का दिया और उचककर चढ़ गए। इस प्रक्रिया में नदी के जल की बौछार राम और सीता के ऊपर आ पड़ी। यह देख लक्ष्मण की जीभ दांतों तले आ गई और यकायक पानी से गीले हो चुके पति-पत्नी खिलखिलाकर हँस पड़े। गम्भीरता, दुख, क्षोभ पल भर में हवा हो गए।

सीता ने यमुना को प्रणाम किया और सकुशल पार उतार देने की प्रार्थना की। नदी पार कर आगे बढे तो भरद्वाज मुनि के निर्देशानुसार सामने खड़े विशाल पीपल के पेड़ को प्रणाम कर कुछ आगे बढ़ वहीं नदी तट पर रात्रिविश्राम किया।

सुबह राम ने उठकर लक्ष्मण को उठाया और फिर स्नान-ध्यान पश्चात तीनों वन में प्रवेश कर गए। लक्ष्मण और सीता को आगे कर धनुष पर बाण रख श्रीराम चले। दोनों भाई तो पहले भी वन आ चुके थे, वन के सौंदर्य से परिचित थे। परन्तु राजरानी सीता का यह प्रथम ही अवसर था। राजमहलों की मर्यादा के विपरीत यहाँ सब कितना खुला, कितना उन्मुक्त था। विचित्र लताएं, विचित पुष्प। सीता हाथ दिखाकर संकेत करती। लक्ष्मण उसे तोड़कर उनके हाथों में रख देते। फिर सीता बच्चों जैसी उत्सुकता से उस लता अथवा पुष्प को अपने पति को दिखाती, और वे उस लता-पुष्प का विवरण सुनाते।

अहिंसक वन्यपशुओं की क्रीड़ाएं देख सीता मोहित हो उठती और यदि कोई हिंसक पशु आक्रमण की अवस्था में दिख जाता तो उसे सीता तक पहुंचने से पहले ही लक्ष्मण के खड्ग या राम के बाण का भोग बनना पड़ता।

चलते-चलते चित्रकूट आ गया। पर्वत पर वनस्पति और शाकाहारी वन्यजीवों की भरमार देख तीनों के मन प्रसन्न हो उठे। राम ने लक्ष्मण को दिखाते हुए कहा, "देखो भाई, उधर देखो। पेड़ों पर बेल और बेर कैसे फले हैं। कितनी उर्वरा भूमि है कि पग की ठोकर से कंदमूल भूमि से बाहर आ रहे हैं। निकट ही जलस्रोत भी है। हिंसक वन्यपशु कम दिखते हैं। कैसा हो कि हम यहीं कुटी बना लें?"

राम के प्रश्न को ही आज्ञा मान लक्ष्मण झटपट स्थान साफ कर लकड़ी प्राप्त करने वन में घुस गए और प्रहर भर में ही साफ-सुथरी कुटी का निर्माण हो गया। तीनों ने एक साथ कुटी में प्रवेश किया।

संध्या समय जब लक्ष्मण भोजन पकाने में सीता की सहायता कर, नदी में पैर डाले मंद-मंद मुस्कुराते अपने बड़े भाई के पास आ बैठे तो श्रीराम बोले, "तो लक्ष्मण! क्या तुम्हें अब भी अयोध्या के वो महल, वो राजसिंहासन इत्यादि स्मरण हैं? क्या तुम अभी भी मुझे राजा बनाने के हठ पर टिके हुए हो? क्या तुम हमारे पिता और माता कैकई को क्षमा नहीं करोगे? "

लक्ष्मण अपने भाई के पैरों में अठखेलियाँ करती मछलियों को देखते हुए बोले, "भैया, आपका कर्तव्य है राजा बनना। आज नहीं कल, राजा तो आप ही होंगे। रही मेरी बात, तो मेरा कर्तव्य आपकी सेवा है। नगर हो या वन, इहलोक हो या परलोक, मैं सदा ही आपका सेवक हूँ। मैं जानता हूँ कि आप पिता और माता कैकई से कितना प्रेम करते हैं। परन्तु मेरा निश्चित मत जान लें। मुझे इससे अंतर नहीं पड़ता कि आप किससे प्रेम करते हैं, अपितु मेरे मन में उसके प्रति अधिक सम्मान है जो आपको प्रेम करता है। मेरा धर्म आप हैं, मात्र आप। आपके लिए जो स्वयं को, प्राण को, वचन को, स्वार्थ को त्याग दे, वह मुझे प्रिय है, अन्य कोई नहीं।"

राम मुस्कुरा उठे और भोजन हेतु सीता की पुकार सुन लक्ष्मण को साथ लेकर भोजन करने बैठे। सोने-चांदी की थाल के स्थान पर पत्तल पर खाना परोसते हुए सीता की आंखों में अश्रु थे, और विचित्र दिख रहे भोजन को देख लक्ष्मण खिलखिलाकर हँस पड़े।
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रामनवमी पर श्री अजीत प्रताप सिंह का आलेख

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